
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक गतिविधियों से अगर सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होती है, तो राज्य सरकार इसमें दखल दे सकती है। अदालत ने बुधवार को कहा कि पूजा-पाठ के नाम पर सड़कें जाम करने जैसे कार्यों को धार्मिक प्रथा का हिस्सा बताकर सही नहीं ठहराया जा सकता है।
सबरीमाला मामले की सुनवाई के नौवें दिन जस्टिस नागरत्ना ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पूजा के मामलों में धार्मिक समूहों को स्वतंत्रता जरूर मिली हुई है, लेकिन उनके ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन आते हैं। अदालत के अनुसार, केवल वे ही गतिविधियां इस सुरक्षा के दायरे में आती हैं जो मूल रूप से धार्मिक प्रकृति की हों।
जस्टिस नागरत्ना ने जोर देकर कहा कि अगर किसी धार्मिक कार्य की वजह से कोई धर्मनिरपेक्ष गतिविधि प्रभावित हो रही है, तो वहां राज्य का हस्तक्षेप करना जरूरी हो जाता है, क्योंकि दोनों के बीच एक संतुलन होना चाहिए।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े अहम मामले की सुनवाई कर रहा है।
सुनवाई के पिछले दिन वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने राजनेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया था, जो एक प्रमुख समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' से मिली जानकारी साझा करने को लेकर सावधानी बरतने की हिदायत दी थी। जब कौल ने कहा कि विनम्रता में कोई बुराई नहीं है और ज्ञान किसी भी स्रोत या देश से आए, उसका स्वागत होना चाहिए, तो चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि अदालत सभी गणमान्य व्यक्तियों का सम्मान करती है, लेकिन निजी राय आखिर निजी ही होती है।
इससे पहले सुनवाई के सातवें दिन अदालत ने टिप्पणी की थी कि हिंदुओं को एकजुट होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मंदिर संप्रदाय के आधार पर दूसरों को बाहर नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने से अंततः वह संप्रदाय ही कमजोर होगा। यह बात जस्टिस नागरत्ना ने वरिष्ठ वकील द्विवेदी के उस तर्क के जवाब में कही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि धार्मिक संप्रदाय एक बंद और अनुशासित समूह है जिसे अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षण प्राप्त है।
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई नौ जजों की संविधान पीठ कर रही है। इसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत कर रहे हैं। इस पीठ में जस्टिस बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
अदालत के समक्ष विचार के लिए मुख्य रूप से सात सवाल रखे गए हैं।
पहला सवाल यह है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा क्या है।
दूसरा सवाल अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच के आपसी संबंध से जुड़ा है।
तीसरे सवाल में यह पूछा गया है कि क्या अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदाय के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा संविधान के भाग तीन के अन्य प्रावधानों के भी अधीन हैं।
चौथे सवाल का उद्देश्य अनुच्छेद 25 और 26 के तहत 'नैतिकता' शब्द के दायरे को समझना है और यह तय करना है कि क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता शामिल है।
पांचवां सवाल अनुच्छेद 25 के तहत किसी धार्मिक प्रथा की न्यायिक समीक्षा के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है।
छठा सवाल संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (बी) में उल्लिखित "हिंदुओं के वर्गों" अभिव्यक्ति के अर्थ को स्पष्ट करने से जुड़ा है।
सातवां और अंतिम सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह का हिस्सा नहीं है, वह जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करके उस समूह की प्रथा पर सवाल उठा सकता है।
एक हस्तक्षेपकर्ता बॉम्बे पारसी पंचायत की ओर से पेश वकील गौरी ने अदालत में अपना पक्ष रखा। उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भों को दोहराने के बजाय तीन संक्षिप्त और अहम बिंदु सामने रखे।
उनका पहला बिंदु पारसी मामलों के संदर्भ में सहानुभूति से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में भावनात्मक कीमत चुकानी पड़ रही है, लेकिन यह धर्म, नियमन और धार्मिक स्वायत्तता के बीच की संवैधानिक सीमा को धुंधला नहीं कर सकता।
दूसरे बिंदु में उन्होंने चेतावनी दी कि जो आज एक छोटी सी व्यवस्था लग रही है, वह भविष्य में संवैधानिक क्षरण का एक खाका बन सकती है।
तीसरे बिंदु के तहत उन्होंने तर्क दिया कि यदि किसी व्यक्ति या समूह की कठिनाई को ही मुख्य आधार मान लिया जाए, तो संप्रदाय की हर सीमा से समझौता होने लगेगा और अनुच्छेद 26 केवल मामले-दर-मामले के आधार पर एक अपवाद बनकर रह जाएगा। उनकी इस सटीक प्रस्तुति की चीफ जस्टिस ने भी सराहना की।
इसके बाद एक अन्य वकील ने जनहित याचिका की प्रकृति पर बात करते हुए कहा कि यह सीधे तौर पर अटॉर्नी जनरल की भूमिका निभाने जैसा है, जो जनता की आत्मा का एकमात्र प्रतिनिधि होता है।
संविधान निर्माताओं के दृष्टिकोण पर एक और वकील ने तर्क दिया कि हमारे संविधान में धर्म या धार्मिक संप्रदाय की कोई परिभाषा तय नहीं की गई है। इसके तीन मुख्य कारण बताए गए। पहला, धर्म सीमाओं में नहीं बंधा है, जैसे इस्लाम और ईसाई धर्म विदेशों से आए हैं, तो उन पर कोई एक स्थानीय परीक्षण कैसे लागू किया जा सकता है। दूसरा, संविधान निर्माता जानते थे कि हिंदू धर्म विभिन्न संप्रदायों, देवी-देवताओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं का एक विशाल संकलन है। तीसरा कारण यह था कि भविष्य में नास्तिक लोग किसी धर्म की परंपराओं को नष्ट करने का प्रयास कर सकते हैं।
सड़कें जाम करने के मुद्दे पर जस्टिस नागरत्ना ने एक उदाहरण देकर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि यदि किसी मंदिर का वार्षिक उत्सव हो रहा है, तो धार्मिक गतिविधि के नाम पर मंदिर के आसपास की सभी सड़कें बंद नहीं की जा सकतीं। यह सीधे तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था का मामला है। अनुच्छेद 26 (बी) के तहत धर्म के मामलों और पूजा के तरीके में स्वायत्तता दी गई है, जिस पर अदालत अपना फैसला नहीं थोप सकती। लेकिन अगर इन धार्मिक गतिविधियों की आड़ में आम जनजीवन और धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां प्रभावित होती हैं, तो संतुलन बनाए रखने के लिए राज्य को हस्तक्षेप करना ही होगा।
हिंदू धार्मिक समूहों को लेकर एक वकील ने तर्क दिया कि किसी भी हिंदू धार्मिक समूह को विशेषाधिकार नहीं मिल सकता क्योंकि हर हिंदू कई देवी-देवताओं की पूजा करता है। भगवान गणेश या भगवान विष्णु के लिए कोई विशिष्टता नहीं है, जैसा कि गुरुवायुर मंदिर के फैसले में भी देखा गया था। इस पर जस्टिस सुंदरेश ने जोड़ा कि एक ही आस्था और प्रथा के भीतर कई संप्रदाय हो सकते हैं।
वहीं, वकील अरविंद श्रीवत्स ने कहा कि अनुच्छेद 25(1) और 26 अलग-अलग संवैधानिक क्षेत्रों से आते हैं। एक का संबंध व्यक्ति के अधिकार से है, तो दूसरा संस्था के स्वयं के प्रबंधन से जुड़ा है।
धार्मिक संप्रदाय और बहिष्कार के मुद्दे पर एक वकील ने अनुच्छेद 25 (2) (बी) के बाद वाले हिस्से का ध्यान आकर्षित किया, जो सार्वजनिक स्वरूप वाले हिंदू धार्मिक संस्थानों को सभी के लिए खोलने की बात करता है। वकील ने तर्क दिया कि ऐतिहासिक रूप से कई धार्मिक संप्रदाय एक बंद समूह रहे हैं। अगर इस अनुच्छेद को लागू किया जाता है, तो यह स्पष्टीकरण के आधार पर हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धार्मिक संस्थानों को कवर करेगा, लेकिन इस्लामी, पारसी और ईसाई संप्रदायों को इससे बाहर रखा जाएगा, जिससे इसका प्रभाव भेदभावपूर्ण हो सकता है।
इस तर्क पर जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि अन्य धर्मों में बहिष्कार जैसी कोई व्यवस्था नहीं है, यह विशेष रूप से केवल हिंदू धर्म में रहा है। संविधान निर्माता हिंदू समाज की इस कड़वी सच्चाई से भली-भांति वाकिफ थे कि हिंदू मंदिरों में विशेष रूप से उन वर्गों को बाहर रखा जाता था, जिन्हें पहले 'दलित' या वंचित वर्ग कहा जाता था। उन्होंने कहा कि चूंकि अन्य धर्मों की व्यवस्था में ऐसा कोई जातिगत या वर्गीय बहिष्कार नहीं है, इसलिए संविधान में उनके बारे में अलग से लिखने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
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