मणिपुर राहत शिविरों में 640 मौतें और सिर्फ 20 का पोस्टमार्टम! सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव से 25 अप्राकृतिक मौतों पर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर राहत शिविरों में बिना पोस्टमार्टम के हुई 640 मौतों पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है, 25 अप्राकृतिक मौतों पर मुख्य सचिव से विस्तृत रिपोर्ट तलब की गई है।
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मणिपुर राहत शिविरफोटो- द मूकनायक
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नई दिल्ली: गुरुवार, 17 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के मुख्य सचिव को एक सख्त आदेश जारी किया है। अदालत ने राज्य भर के राहत शिविरों में विस्थापित लोगों के बीच हुई 25 अप्राकृतिक मौतों पर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने को कहा है। इन मामलों में एक कथित यौन उत्पीड़न की घटना भी शामिल है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि मणिपुर सरकार ने इन मौतों के संबंध में संतोषजनक जवाब नहीं दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त जस्टिस गीता मित्तल समिति को भी आवश्यक जानकारियां नहीं दी गईं। यह समिति 2023 की जातीय हिंसा के पीड़ितों को दी जा रही राहत और पुनर्वास की निगरानी कर रही है।

मुख्य न्यायाधीश ने राज्य के महाधिवक्ता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि यह स्थिति बेहद चौंकाने वाली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समिति द्वारा मांगी गई जानकारी बहुत गंभीर प्रकृति की थी, जिसमें यौन उत्पीड़न का एक संवेदनशील मामला भी शामिल है।

अदालत ने आदेश दिया है कि मुख्य सचिव की रिपोर्ट पूरी तरह से व्यापक होनी चाहिए। इस रिपोर्ट में पोस्टमार्टम के विवरण के साथ-साथ विस्थापित लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।

विस्थापितों को दैनिक सुविधाएं और चिकित्सा देखभाल आसानी से मिलनी चाहिए। सीजेआई ने राज्य सरकार के वकीलों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि वे अपने मुख्य सचिव से कहें कि वे किसी नई समस्या को बुलावा न दें।

इस पर राज्य के वकील ने सफाई देते हुए कहा कि हाल ही में नए मुख्य सचिव की नियुक्ति हुई है, जिसके कारण जवाब देने में देरी हुई होगी। एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को आश्वस्त किया कि मामले की संवेदनशीलता और इसके महत्व को तुरंत संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश में एक और चौंकाने वाली रिपोर्ट का जिक्र किया गया है। इसके अनुसार, आठ जिलों के राहत शिविरों में कुल 640 मौतें हुई हैं, लेकिन आपराधिक मामला दर्ज कर केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम किया गया है।

अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है कि आखिर सिर्फ 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम क्यों हुआ। इसके साथ ही यह भी पूछा गया है कि इन मामलों में मुआवजे के रूप में महज 20,000 से 30,000 रुपये की मामूली रकम क्यों दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को तत्काल हस्तक्षेप करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि अप्राकृतिक मौतों के सभी मामलों में बिना किसी देरी के एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी दत्तात्रय पडसलगीकर द्वारा दायर एक स्थिति रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया। उन्हें मणिपुर हिंसा मामलों की आपराधिक जांच और अभियोजन की निगरानी के लिए शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त किया गया था।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि आठ जिलों में 3,020 मामलों की जांच के लिए 42 विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाए गए हैं। इनमें से 302 मामलों में चार्जशीट दायर की जा चुकी है, जबकि 1,583 मामलों में क्लोजर रिपोर्ट लगाई गई है। वर्तमान में 1,135 मामलों की जांच चल रही है और 33 मामलों में ट्रायल शुरू हो चुका है।

रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) भी 31 मामलों की जांच कर रहा है। इसमें 28 मामलों में चार्जशीट और छह में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई है, जबकि तीन मामलों की जांच अभी भी जारी है।

सीबीआई की इस जांच में कुल 978 गवाह हैं, जिनमें से छह से पूछताछ हो चुकी है और 38 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। मामलों के तेजी से निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एएसजी भाटी को एक अहम सुझाव भी दिया। अदालत ने कहा कि काम के भारी बोझ को बांटने के लिए दो सीबीआई अदालतें स्थापित करने के सुझाव पर सरकार विचार करे।

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