
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में इन दिनों बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के भतीजे आकाश आनंद को लेकर हलचल तेज हो गई है। बसपा से सभी सांगठनिक जिम्मेदारियों से मुक्त किए जाने के बाद सत्ताधारी एनडीए के घटक दल, मुख्य विपक्षी दल और बहुजन आंदोलन से जुड़े नेता उन पर डोरे डालने लगे हैं।
वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए तमाम राजनीतिक दल बसपा के पारंपरिक जनाधार में अपनी पैठ बनाने की तलाश में हैं। मायावती द्वारा किसी भी दल के साथ चुनावी गठबंधन से लगातार इनकार किए जाने के कारण दूसरे दलों की नजर अब सीधे दलित मतदाताओं पर टिकी है।
एनडीए के सहयोगी और निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने खुलकर आकाश आनंद का समर्थन करते हुए उनसे आगे आने का आह्वान किया है। उन्होंने प्रसिद्ध नारे 'अंबेडकर जी के सपने अधूरे, कांशीराम करेंगे पूरे' का जिक्र करते हुए कहा कि आकाश आनंद अपनी टीम के साथ मुख्यधारा में शामिल होकर कांशीराम के अधूरे सपनों को साकार करें।
नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी आकाश आनंद को अपनी पार्टी में आने की खुली दावत दी है। चंद्रशेखर का कहना है कि आकाश आनंद बहुजन मिशन को आगे ले जाना चाहते हैं और भले ही उन्होंने पूर्व में उनके खिलाफ तीखे शब्दों का प्रयोग किया हो, लेकिन यदि वे आजाद समाज पार्टी में आते हैं तो उनका स्वागत है और दोनों मिलकर साथ काम करेंगे।
मायावती ने 10 सितंबर को आकाश आनंद को पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त करने का ऐलान किया था। यह फैसला आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ के सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बाद सामने आया। इससे पहले मायावती ने आकाश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर अहम जिम्मेदारियां सौंपी थीं, मगर बाद में पार्टी में उनकी स्थिति में कई बार बड़े उतार-चढ़ाव आए।
बसपा के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि मायावती भविष्य में उन्हें दोबारा मौका दे सकती हैं, लेकिन विपक्षी दलों की दिलचस्पी के पीछे मुख्य वजह बसपा का मजबूत जमीनी वोट बैंक है। राज्य में पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों के दौरान बसपा के मत प्रतिशत में निरंतर गिरावट दर्ज की गई है।
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 22.23 प्रतिशत वोट हासिल कर 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि 2022 के चुनाव में पार्टी का वोट शेयर घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और वह मात्र एक सीट ही जीत सकी।
संसदीय चुनावों में भी ऐसा ही रुख देखने को मिला, जहां 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 19.43 प्रतिशत वोट पाकर 10 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। वहीं 2024 के आम चुनाव में बसपा का वोट शेयर गिरकर करीब 9.39 प्रतिशत पर सिमट गया और उसका खाता भी नहीं खुला।
विधानसभा और संसद में संख्या बल कम होने के बावजूद दलित समुदाय, खासकर जाटव मतदाताओं के बीच बसपा की पकड़ अब भी असरदार मानी जाती है। मायावती के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने अन्य दलों के सामाजिक समीकरणों को जटिल बना दिया है, जिसके चलते नेता आकाश आनंद के लिए अपने दरवाजे खुले रखकर बहुजन मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने लोकतांत्रिक तरीके से राजनीति में आने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ काम करने की संभावना पर विचार करने की बात कही है। राय का आरोप है कि मायावती का झुकाव भाजपा की तरफ है और चूंकि आकाश ने भाजपा के खिलाफ बयानबाजी की थी, इसलिए उन पर भाजपा का दबाव था। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जुड़ना चाहता है, तो कांग्रेस उस पर विचार करेगी।
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। आकाश आनंद को सपा में शामिल करने के सवाल पर अखिलेश यादव ने कहा कि यह पूरी तरह से बसपा का अंदरूनी फैसला है और दूसरी पार्टी के लोग इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते, लेकिन अगर उन्हें सपा के पास लाया जाता है तो वे उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।
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