न पानी, न रोजगार, बस आरक्षण की हुंकार: पुरुलिया के सियासी अखाड़े में दांव पर TMC और बीजेपी की साख

पश्चिम बंगाल चुनाव: पुरुलिया में कुड़मी आंदोलन, पानी का संकट और रोजगार की कमी कैसे बदल रहे हैं सियासी समीकरण?
पुरुलिया, पश्चिम बंगाल
पुरुलिया, पश्चिम बंगालफोटो साभार- इंटरनेट
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पश्चिम बंगाल: पुरुलिया अपनी प्राकृतिक सुंदरता, अयोध्या पहाड़, छऊ नृत्य और वसंत के आगमन का संदेश देने वाले पलाश के फूलों के लिए विख्यात है। हालांकि, इन दिनों यह पश्चिम बंगाल का एक प्रमुख राजनीतिक अखाड़ा बन चुका है। यहां के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की बदलती निष्ठा और पहचान की राजनीति चुनावी मुकाबले की दिशा तय कर रही है।

झालदा अनुमंडल का एक ब्लॉक स्तर का शहर और अनारक्षित विधानसभा क्षेत्र जयपुर इस राजनीतिक उथल-पुथल का स्पष्ट उदाहरण है। किसी समय यह इलाका कांग्रेस का मजबूत गढ़ हुआ करता था। लेकिन पिछले तीन विधानसभा चुनावों में यहां तीन अलग-अलग पार्टियों ने जीत दर्ज कर सबको चौंकाया है।

छोटानागपुर क्षेत्र में स्थित जयपुर की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। इसे मुड़ी (पफ्ड राइस) बनाने वाली छोटी फैक्टरियों का भी सहारा मिलता है। हालांकि, यहां से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित चिरूगरा गांव में आज भी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है।

कंगशाबती नदी यहां के लोगों के लिए जल का मुख्य स्रोत बनी हुई है, क्योंकि घरों में अभी तक नल का पानी नहीं पहुंचा है। कई ग्रामीण मुख्य रूप से तालाबों और नदी पर निर्भर हैं और वे स्थानीय प्रशासन की विफलताओं की ओर इशारा करते हैं। नदी पर एक पुल बनने से कनेक्टिविटी जरूर बेहतर हुई है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि बेरोजगारी, पानी की किल्लत और बुनियादी ढांचे की कमी अभी भी उनके लिए बड़ी चिंताएं हैं।

हाल में इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इलाके में पिछले कुछ वर्षों से चल रहे कुड़मी आंदोलन का गहरा प्रभाव साफ देखा जा सकता है। अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा पाने और कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर यह समुदाय 2022 से कई बार सड़कों पर उतर चुका है। इनके द्वारा किए गए चक्का जाम ने पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

वर्तमान में ओबीसी श्रेणी में शामिल कुड़मी समुदाय की अनुमानित आबादी लगभग 50 लाख है। उनका दावा है कि पुरुलिया, झाड़ग्राम और बांकुड़ा की लगभग 30 विधानसभा सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है। उनकी यह मांग ऐतिहासिक उपेक्षा से जुड़ी है। दरअसल, 1931 की जनगणना में कुड़मी समुदाय को आदिवासी सूची में रखा गया था, लेकिन 1950 में उन्हें एसटी सूची से बाहर कर दिया गया। यह मुद्दा आज भी यहां के मतदान व्यवहार को काफी हद तक प्रभावित करता है।

साल 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें तो झाड़ग्राम, बांकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर और पुरुलिया जिलों की 40 विधानसभा सीटों पर टीएमसी और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला था। इनमें टीएमसी ने 24 और बीजेपी ने 16 सीटें जीती थीं। दक्षिण बंगाल में टीएमसी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन दक्षिण-पश्चिम बंगाल में स्थानीय समीकरणों के कारण मुकाबला हमेशा कड़ा रहा है। इस बार कुड़मी समुदाय खुद को एक निर्णायक ताकत के रूप में देख रहा है।

कई मतदाता कुड़मी समाज के लिए पहचान की मांग पूरी मुखरता से उठा रहे हैं। पेशे से किसान सुधीर चंद्र महतो कहते हैं कि बंगाल में लोग एक ही सरकार को बहुत लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखने की गलती करते हैं, जैसे 34 साल तक वामदल और अब 15 साल से टीएमसी। उनके अनुसार, विकास सुनिश्चित करने के लिए हर पांच साल में सरकार बदलनी चाहिए। वह स्पष्ट करते हैं कि कुड़मी अपनी पहचान के लिए लड़ रहे हैं और जो उन्हें यह हक दिलाएगा, वे उसी का समर्थन करेंगे।

जयपुर सीट को अपने पास बनाए रखने के लिए बीजेपी ने भी एक बड़ी चाल चली है। पार्टी ने हालिया विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाले कुड़मी नेता अजित महतो के बेटे विश्वजीत महतो को मैदान में उतारा है। यह इस क्षेत्र में पहचान की राजनीति के महत्व को भली-भांति दर्शाता है। अजित महतो का कहना है कि टीएमसी सरकार ने उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

पिछले सितंबर में राज्य पुलिस ने पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों को भी बेरहमी से पीटा था। उसी दिन यह तय हो गया था कि वे टीएमसी को वोट नहीं देंगे। उन्होंने बताया कि बीजेपी ने उनसे पांच साल का समय मांगा है, इसलिए वे उन्हें समर्थन देंगे। लेकिन अगर पार्टी अपने वादे से मुकरती है तो वे अपना समर्थन वापस ले लेंगे।

हालांकि, बीजेपी के लिए कुड़मी समुदाय की मांगों का समर्थन करना एक दोधारी तलवार की तरह है। इससे उन अन्य एसटी समूहों के नाराज होने का खतरा है जो अपने आरक्षण के कोटे में कोई बंटवारा नहीं चाहते।

एक वरिष्ठ पार्टी नेता ने स्पष्ट किया कि जहां कुड़मी बहुसंख्यक हैं, वहां पार्टी ने उसी समुदाय के उम्मीदवार उतारे हैं, और जहां आदिवासी समूहों की संख्या अधिक है, वहां एसटी उम्मीदवार दिए गए हैं। उनका कहना है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो वह कुड़मी समुदाय की मांगों पर विचार करेगी। लेकिन उन्हें एसटी का दर्जा मिलेगा या नहीं, यह शीर्ष नेतृत्व ही तय करेगा।

पूर्वी पुरुलिया की एसटी-आरक्षित मानवबाजार सीट पर राजनीतिक समीकरण बिल्कुल अलग हैं। यहां बीजेपी लगातार तीन बार (2011 से) जीत दर्ज कर रहीं टीएमसी विधायक संध्या रानी टुडू को हराने की उम्मीद कर रही है। लेकिन अगर बीजेपी कुड़मी हितों के बहुत करीब नजर आती है, तो मानवबाजार में उसकी राह मुश्किल हो सकती है।

जयपुर में कई लोग नौकरियों और शिक्षा के अवसरों की कमी का हवाला देते हुए आरक्षण और प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा पानी, बिजली और अस्पतालों जैसी बुनियादी और ठोस जरूरतें भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं।

एक अन्य किसान भादू महतो बताते हैं कि वे अपने घरों के नलों में साफ पानी चाहते हैं। इलाके में रोजगार नहीं है और उनका परिवार थोड़ी सी खेतीहर जमीन पर निर्भर है। वे करेला और बैंगन जैसी सब्जियां उगाकर स्थानीय बाजार में बेचते हैं, साथ ही मवेशी पालकर कुछ आमदनी कर लेते हैं।

हालांकि गांव तक बिजली पहुंच गई है, लेकिन हर तिमाही आने वाला बिल लोगों पर भारी पड़ता है। पानी की टंकियां बिना इस्तेमाल के पड़ी हैं, सौर ऊर्जा से जलने वाली लाइटें सीमित हैं और शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं का भारी अभाव है। मलय महतो नामक एक किसान बताते हैं कि वहां कोई ढंग का स्कूल या अस्पताल नहीं है। सरकारी स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, बच्चे मुख्य रूप से मिड-डे मील के लिए जाते हैं और घर लौट आते हैं। वह सवाल करते हैं कि कुड़मी समुदाय को एसटी के रूप में मान्यता क्यों नहीं मिल रही है, क्या उनके बच्चे शिक्षा के हकदार नहीं हैं?

स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत इतनी खराब है कि निवासियों को अक्सर इलाज के लिए पड़ोसी राज्य झारखंड जाना पड़ता है। सुधीर चंद्र महतो का कहना है कि सरकार मुफ्त इलाज का दावा करती है, लेकिन अस्पतालों में कोई सुविधा नहीं है। मरीजों को सीधे कोलकाता रेफर कर दिया जाता है। आपात स्थिति में वे झारखंड जाना बेहतर समझते हैं क्योंकि वह उनके अधिक करीब है और वहां चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं।

जयपुर से टीएमसी उम्मीदवार अर्जुन महतो स्थानीय लोगों की इन समस्याओं को स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि कुछ जगहों पर पीने के पानी की समस्या जरूर है, लेकिन उस पर तेजी से काम चल रहा है और वे सभी शिकायतों पर ध्यान देंगे।

मानवबाजार के गांवों में भी पानी की किल्लत को लेकर ऐसी ही शिकायतें सामने आती हैं। गोबिंदोपुर की रहने वाली रेबा हांसदा बताती हैं कि पूरे गांव के लिए पानी की एक ही टंकी है। इसे दिन में सिर्फ एक बार भरा जाता है, लेकिन दुर्भाग्य से उसका पानी पीने लायक नहीं है।

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