
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शांति भंग के आरोप में गाजियाबाद के एक वकील को चार दिन तक हिरासत में रखे जाने की घटना पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 24 घंटे से अधिक समय तक किसी भी व्यक्ति को निजी मुचलके पर रिहा न कर अवैध रूप से हिरासत में रखने पर प्रतिदिन 25,000 रुपये का मुआवजा देना होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह मुआवजा राशि सीधे तौर पर उस पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट के वेतन से काटी जाएगी, जो इस अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार पाए जाएंगे। इसके साथ ही, पूरे राज्य में एक समान व्यवस्था लागू करते हुए अदालत ने निजी मुचलके (पर्सनल बॉन्ड) की अधिकतम सीमा भी 20,000 रुपये तय कर दी है। कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाले ऐसे अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जाएगी।
जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 8 जून को दिए अपने आदेश में इस मामले पर कड़ी टिप्पणी की। बेंच ने कहा कि शांति भंग और दुर्व्यवहार के मामलों में जब भी कोई गिरफ्तारी होती है, तो मजिस्ट्रेट अवैध रूप से 50 हजार रुपये और समान राशि के एक या दो जमानतदारों की मांग करते हैं।
अदालत ने निराशा जताते हुए कहा कि 23 मार्च 2021 की राज्य नीति (जिसमें 25 हजार रुपये मुआवजे का प्रावधान था) के बावजूद पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपना रहे हैं और लोगों को बिना वजह कई दिनों तक जेल भेज रहे हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के मद्देनजर कोर्ट ने सरकार को नई नीति बनाकर इस मुआवजा राशि को और बढ़ाने का भी सुझाव दिया है। न्यायालय ने नई नीति लागू होने तक लोगों की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए कई कड़े निर्देश जारी किए हैं।
इन निर्देशों के अनुसार, बीएनएसएस (BNSS) या सीआरपीसी (CrPC) के तहत निवारक निरोध के मामलों में व्यक्ति को 20 हजार रुपये से अधिक का व्यक्तिगत मुचलका (बिना जमानतदार के हस्ताक्षर वाला बांड) भरने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। अगर मुचलके की राशि बढ़ाई जाती है, तो मजिस्ट्रेट को लिखित में इसका कारण बताना होगा। मुचलका भरते ही हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उसी दिन तुरंत रिहा करना अनिवार्य होगा।
अदालत ने आगे निर्देश दिया है कि यदि कोई आरोपी उसी दिन मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त के समक्ष मुचलका भरने से मना करता है, तो जेल भेजने से पहले इस इनकार को लिखित रूप में और ऑडियो-विजुअल माध्यम से दर्ज करना होगा। आरोपी को भविष्य में उसकी सुविधानुसार किसी अन्य तारीख पर मुचलका भरने का अवसर भी दिया जाना चाहिए।
इस आदेश का उल्लंघन कर 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखने पर राज्य को प्रतिदिन 25 हजार रुपये का मुआवजा देना होगा। यह राशि जिम्मेदार मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी का दायित्व तय करने के बाद उनके वेतन से वसूली जाएगी और संबंधित सेवा नियमों के तहत उन पर कार्रवाई होगी।
यह अहम आदेश गाजियाबाद के रहने वाले हाईकोर्ट के एक प्रैक्टिसिंग वकील चंद्र पाल सिंह द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है। याचिका के मुताबिक, सिंह और उनके भतीजे को 22 फरवरी की सुबह 11 बजे पड़ोसियों के साथ हुए एक मामूली विवाद के बाद शांति भंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में एक गैर-संज्ञेय रिपोर्ट (NCR) दर्ज की गई थी।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उन्हें टीला मोड़ पुलिस स्टेशन में 24 घंटे से अधिक समय तक अवैध हिरासत में रखा गया और अगले दिन 23 फरवरी को शाम 4 बजे सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के सामने पेश किया गया। वकील और उनके भतीजे ने 50,000 रुपये का मुचलका भी भरा, लेकिन फिर भी उन्हें जेल भेज दिया गया। अदालत में यह भी बताया गया कि वकील की पत्नी शारीरिक रूप से विकलांग हैं।
बाद में हाईकोर्ट के दखल और निर्देश के बाद याचिकाकर्ता को 25 फरवरी को और उनके भतीजे को 26 फरवरी को जेल से रिहा किया गया। पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था।
इसके एवज में राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर वकील को 75,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया गया है। यह 75 हजार की राशि संबंधित एसीपी और पुलिस स्टेशन के एसएचओ के वेतन से आनुपातिक रूप से वसूली जाएगी। इसके लिए तीन महीने के भीतर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक जांच पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।
इसके अलावा, गाजियाबाद के पुलिस आयुक्त को 14 सितंबर तक या उससे पहले अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि वह इसका पालन करने में विफल रहते हैं, तो अगली सुनवाई के दिन 14 सितंबर को पुलिस आयुक्त को स्वयं अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।
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