
कोलकाता- कलकत्ता हाईकोर्ट ने 11 फरवरी को दिए एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के किसी सदस्य के साथ किया गया हर अपमान या धमकी स्वतः ही अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध नहीं माना जाएगा। जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) की एकल पीठ ने मौमिता भट्टाचार्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में क्रिमिनल रिविजनल एप्लीकेशन पर सुनवाई करते हुए एम्हर्स्ट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन केस और उसमें दाखिल चार्जशीट सहित पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
यह मामला संस्कृत विभाग में पेशेवर विवाद से जुड़ा है । शिकायतकर्ता SC समुदाय से हैं और 14 नवंबर 2018 को असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में जॉइन हुए थे, उन्होंने आरोप लगाया था कि मौमिता भट्टाचार्य ने विभागाध्यक्ष होने के नाते उन्हें जाति के आधार पर अपमानित किया, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और उनके करियर को नुकसान पहुंचाया। आरोपों में शिकायतकर्ता को विभागीय मीटिंग में न बुलाना, मीटिंग के रिजॉल्यूशन न देना, अंडरग्रेजुएट क्लास रोकना, परीक्षा/मूल्यांकन ड्यूटी से रोकना, छात्रों के साथ साजिश करना और ऑनलाइन मीटिंग में अभद्र भाषा का इस्तेमाल आदि शामिल थे। शिकायत 4 दिसंबर 2021 को दर्ज हुई, जांच के बाद 10 अप्रैल 2022 को चार्जशीट दाखिल हुई और विशेष कोर्ट ने संज्ञान लिया।
याचिकाकर्ता मौमिता भट्टाचार्य ने धारा 482 CrPC के तहत याचिका दायर कर कार्यवाही रद्द करने की मांग की। उन्होंने अपनी योग्यताओं का हवाला देते हुए बताया कि वे विश्व भारती यूनिवर्सिटी से संस्कृत में पीएचडी, पोस्ट-डॉक्टोरल फेलोशिप, एसएलईटी पास हैं और विभिन्न जर्नल्स में संपादकीय भूमिका आदि निभायी है और कहा कि आरोप झूठे, बदले की भावना से प्रेरित हैं तथा SC/ST एक्ट के अपराध के आवश्यक तत्वों की कमी है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों (साजन स्करिया बनाम केरल राज्य, हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य, स्वर्ण सिंह बनाम राज्य आदि) का हवाला देते हुए धारा 3(1)(r) के लिए आवश्यक तत्वों को स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा:
"धारा 3(1)(r) के तहत अपराध के मूल तत्व इस प्रकार हैं: आरोपी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं होना चाहिए। आरोपी को अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य को जानबूझकर अपमानित या धमकाना चाहिए। ऐसा अपमान या धमकी उस व्यक्ति को अपमानित करने के इरादे से होनी चाहिए। और ऐसा अपमान या धमकी किसी सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक दृष्टि में होनी चाहिए।"
कोर्ट ने आगे महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
"अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी सदस्य के साथ किया गया हर जानबूझकर अपमान या धमकी जाति आधारित अपमान की भावना नहीं पैदा करेगा। ऐसा केवल तब होता है जब अपमान या धमकी अस्पृश्यता की प्रचलित प्रथा के कारण हो या ऊपरी जाति की ऐतिहासिक श्रेष्ठता, निम्न जाति/अछूतों पर श्रेष्ठता, शुद्धता-अशुद्धता जैसी धारणाओं को मजबूत करने के लिए हो।"
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़ित की जाति का आरोपी को पता होना पर्याप्त नहीं है। अपराध तब बनता है जब अपमान "इस आधार पर या इस कारण से किया गया हो कि वह व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य है"।
शिकायत में एक खास घटना का जिक्र था जहां ऑनलाइन मीटिंग में शिकायतकर्ता को 'आदर्श सर' कहा गया। इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की:
"‘आदर्श’ का अर्थ आदर्श होता है और ‘सर’ सम्मान का संबोधन है। यह अदालत समझ नहीं पा रही है कि किसी व्यक्ति को ‘आदर्श सर’ कहना अपमानजनक कैसे हो सकता है, भले ही व्यंग्यात्मक ढंग से कहा गया हो। यह किसी भी स्थिति में SC/ST (POA) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं बन सकता।"
कोर्ट ने स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल केस के सिद्धांत लागू करते हुए कहा कि अगर FIR में लगाए गए आरोप भी पूरी तरह सच मान लिए जाएं, तो भी वे अपराध नहीं बनाते। कार्यवाही व्यक्तिगत दुश्मनी और बदले की भावना से प्रेरित लगती है। इसलिए धारा 482 CrPC के तहत इसे रद्द किया जाना उचित है।
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