
तमिलनाडु की जेलों में बंद हाशिए और दलित समाज के कैदियों से जबरन टॉयलेट साफ करवाने और मैला ढुलवाने के गंभीर आरोपों पर मद्रास हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सोमवार, 31 अगस्त को मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने अधिकारियों को इन अमानवीय आरोपों की गहन जांच करने का निर्देश दिया है। यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और जस्टिस आर शक्तिवेल की खंडपीठ ने मदुरै के एक वकील केआर राजा द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए दिया।
याचिकाकर्ता केआर राजा ने अदालत को बताया कि मदुरै सेंट्रल जेल में वंचित समुदायों के कैदियों को साफ-सफाई के काम में झोंका जा रहा है। उनका आरोप है कि तिरुनेलवेली जिले की पालयमकोट्टई सेंट्रल जेल और त्रिची सेंट्रल जेल में भी बिल्कुल यही प्रथा बदस्तूर जारी है। याचिका के अनुसार, मदुरै और पालयमकोट्टई जेलों में हाशिए के समुदायों से आने वाले कैदियों के लिए अलग से बैरक और ब्लॉक तक निर्धारित कर दिए गए हैं।
इन खास ब्लॉक्स में रहने वाले कैदियों से कथित तौर पर बैरक के अंदर और बाहर मौजूद करीब 150 शौचालयों की सफाई करवाई जाती है। हैरानी की बात यह है कि जेल में कैदियों की भारी भीड़ होने के बावजूद पूरे परिसर के लिए केवल दो सफाई कर्मचारी ही नियुक्त किए गए हैं। वकील ने त्रिची की महिलाओं के लिए बनी विशेष जेल में भी ऐसी ही प्रथाओं का पालन होने का सनसनीखेज दावा किया है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, कुछ महिला कैदियों को पुनर्वास कार्यक्रम के तहत जेल अधिकारियों द्वारा संचालित 'फ्रीडम पेट्रोल बंक' पर काम करने की अनुमति दी गई थी। लेकिन आरोप है कि पेट्रोल पंप पर काम करवाने के बजाय इन महिलाओं से वहां के टॉयलेट और परिसर के अन्य हिस्सों की सफाई करवाई जा रही है। उन्होंने जेल अधिकारियों के उस दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि सफाई के लिए केवल नगरपालिका सेवाओं का ही उपयोग किया जाता है।
केआर राजा 'ग्लोबल नेटवर्क फॉर इक्वलिटी, इंडिया' के सह-संस्थापक भी हैं, जो कैदियों और अपराध पीड़ितों के बच्चों की शिक्षा का समर्थन करती है। उन्होंने बताया कि साल 2025 में उन्होंने जेल अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर इस जातीय भेदभाव को खत्म करने और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई की मांग की थी। इसके साथ ही उन्होंने 16 जनवरी के सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने की भी मांग की है, ताकि यह साबित हो सके कि कैदियों से सीवर और टॉयलेट साफ करवाए गए थे।
अपनी दलीलों को मजबूत करने के लिए याचिकाकर्ता ने जेलों में जातीय भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट के 2024 के ऐतिहासिक फैसले (सुकन्या शांता बनाम भारत संघ) का हवाला दिया। उन्होंने 'मैला ढोने वालों के रूप में रोजगार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013' का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी प्रथाएं न केवल भेदभावपूर्ण हैं, बल्कि कैदियों के मौलिक सम्मान के भी सीधे तौर पर खिलाफ हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि दक्षिणी तमिलनाडु की कई अन्य जिला जेलों में हालात और भी बदतर हैं।
हालांकि, जेल प्रशासन ने अदालत में इन सभी आरोपों को पूरी तरह से नकार दिया है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मदुरै, त्रिची और तिरुनेलवेली के प्रधान जिला न्यायाधीशों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) के सचिवों को संबंधित जेलों का औचक निरीक्षण कर सच्चाई का पता लगाने का निर्देश दिया।
अदालत ने डीएलएसए को सीधे कैदियों से पूछताछ करने और सीसीटीवी फुटेज खंगालकर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट सौंपने को कहा है। इसके अलावा संबंधित जेल अधीक्षकों को भी इन आरोपों पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने के अलग से निर्देश दिए गए हैं। अब इस पूरे मामले की सच्चाई जानने के लिए अगली सुनवाई 4 अक्टूबर को तय की गई है।
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