मध्य प्रदेश में UCC लागू करने की तैयारी: ड्राफ्ट बिल के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन

उत्तराखंड और गुजरात की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी यूसीसी (UCC) लागू करने की तैयारी तेज, सीएम मोहन यादव के निर्देश पर गठित समिति 6 महीने में सौंपेगी ड्राफ्ट।
Dr. Mohan Yadav
एमपी में जल्द लागू होगा यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC)! सरकार ने ड्राफ्ट के लिए उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। दिवाली तक कानून लाने का है लक्ष्य।
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मध्य प्रदेश: उत्तराखंड और गुजरात की तर्ज पर अब मध्य प्रदेश सरकार ने भी राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) यानी समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। भोपाल से 27 अप्रैल को विधि एवं विधायी कार्य विभाग द्वारा जारी किए गए एक आदेश के अनुसार, राज्य में यूसीसी लागू करने की संभावनाओं का परीक्षण करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे छह महीने के भीतर इस कानून का ड्राफ्ट बिल तैयार कर लें। राज्य सरकार ने इस साल दिवाली तक इस अहम कानून को लागू करने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यह पहल भारतीय जनता पार्टी के उस दीर्घकालिक राष्ट्रीय एजेंडे के बिल्कुल अनुरूप है, जिसके तहत विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में पूरे देश में एक समान कानून की वकालत की जाती रही है।

सरकार के आदेश में इस बात का स्पष्ट रूप से जिक्र है कि वर्तमान में शादी, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े संवेदनशील मामले अलग-अलग व्यक्तिगत और पारिवारिक कानूनों द्वारा संचालित होते हैं। ऐसे में सभी नागरिकों के बीच समानता, निष्पक्षता और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए इन पुरानी व्यवस्थाओं की समीक्षा करना बेहद जरूरी हो गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए एक समान, संतुलित और व्यावहारिक कानूनी ढांचा विकसित करने की आवश्यकता महसूस की गई है।

इस नवगठित समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रसाद देसाई को सौंपी गई है। उनके अलावा इस अहम पैनल में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, कानूनी विशेषज्ञ अनूप नायर, शिक्षाविद् गोपाल शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता बुधपाल सिंह बतौर सदस्य शामिल किए गए हैं। सामान्य प्रशासन विभाग के अतिरिक्त सचिव अजय कटेसरिया इस समिति के सचिव के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करेंगे।

तय किए गए अधिकार क्षेत्र के मुताबिक, यह पैनल विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रावधानों सहित राज्य के सभी मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों का गहन अध्ययन करेगा। इसके साथ ही, समिति उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों द्वारा अपनाए गए यूसीसी मॉडल की भी बारीकी से जांच करेगी ताकि वहां की प्रासंगिक और सफल प्रथाओं को समझा जा सके।

समिति को निर्देश दिया गया है कि वह राज्य के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए यूसीसी के लिए एक संतुलित कानूनी ढांचा प्रस्तावित करे। इस प्रक्रिया को समावेशी बनाने के लिए आम जनता, सामाजिक और धार्मिक संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से सुझाव तथा आपत्तियां भी आमंत्रित की जाएंगी। जरूरत पड़ने पर व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जनसुनवाई का भी आयोजन किया जा सकता है।

यह पैनल विशेष रूप से इस बात पर जोर देगा कि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कड़े प्रावधान किए जाएं। इसके अतिरिक्त, समिति लिव-इन रिलेशनशिप के नियमन, पंजीकरण और उसके कानूनी प्रभावों को लेकर भी अपने सुझाव देगी। भविष्य में किसी भी तरह की जटिलताओं से बचने के लिए प्रस्तावित कानून के कानूनी, प्रशासनिक और कार्यान्वयन से जुड़े हर पहलू की बारीकी से समीक्षा की जाएगी।

समिति से कहा गया है कि वह 60 दिनों के भीतर राज्य सरकार को एक विस्तृत रिपोर्ट के साथ अपना ड्राफ्ट बिल सौंपे। इस पैनल के सुचारू रूप से कामकाज, सेवा शर्तों और अन्य संचालन संबंधी पहलुओं को लेकर सरकार की ओर से अलग आदेश जारी किए जाएंगे।

साल 2023 के अंत में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आए मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए यूसीसी की दिशा में आगे बढ़ना उनके अब तक के कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला माना जा रहा है।

हालांकि, सरकार के इस बड़े प्रस्ताव को कड़े विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है, जिसमें विपक्षी दलों के अलावा मुख्य रूप से आदिवासी समूह शामिल हैं। मध्य प्रदेश की कुल आबादी में 21 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी अनुसूचित जनजातियों की है, जिस वजह से यह पूरा मुद्दा राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील हो गया है।

आदिवासी समुदाय के नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी पारंपरिक प्रथाओं को किसी एक समान कानूनी ढांचे के अधीन लाया गया, तो वे राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन करेंगे। उनका साफ तौर पर तर्क है कि संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA) जैसे विशेष कानून उनकी विशिष्ट परंपराओं और स्वशासन प्रणालियों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करते हैं, जिन्हें बदला नहीं जाना चाहिए।

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