
असम: "सम्मान के साथ जीने का अधिकार, पीने योग्य पानी, स्वच्छता और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं का अधिकार जीवन के अधिकार (Right to Life) में शामिल है।" इस अहम टिप्पणी के साथ, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार और गोलपारा जिला प्रशासन को कड़े निर्देश दिए हैं। अदालत ने पिछले साल जून में बेदखल किए गए परिवारों को पीने के साफ पानी और अस्थायी स्वच्छता तंत्र सहित सभी बुनियादी सुविधाएं जल्द से जल्द मुहैया कराने को कहा है।
जस्टिस देबाशीष बरुआ की पीठ ने यह आदेश 60 याचिकाकर्ताओं की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। ये वे लोग हैं जो 16, 17 और 18 जून, 2025 को गोलपारा जिले के हसीला बील आर्द्रभूमि (वेटलैंड) क्षेत्र में चलाए गए बेदखली अभियान से प्रभावित हुए थे। असम सरकार द्वारा पिछले साल जून से शुरू किए गए बड़े पैमाने के बेदखली अभियानों में यह एक प्रमुख कार्रवाई थी, जिसने कुल मिलाकर 600 से अधिक परिवारों को प्रभावित किया था।
याचिका के अनुसार, बेदखली के बाद से बच्चों समेत 556 परिवार किसी अन्य व्यक्ति की निजी जमीन (पट्टा भूमि) पर शरण लेने को मजबूर हैं। अदालत ने अपने आदेश में इस बात पर गौर किया कि इस बड़े पैमाने की बेदखली के कारण एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया है। अपने घर से निकाले जाने के दिन से ही अस्थायी शिविरों में रह रहे लोगों को भारी कष्ट और यहां तक कि मौतों का भी सामना करना पड़ा है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील जुनैद खालिद ने अदालत को बताया कि ये लोग बेहद अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि एक 'कल्याणकारी राज्य' होने के नाते और संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों से बंधे होने के कारण, यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन लोगों को कम से कम स्वच्छता, पीने का पानी, चिकित्सा देखभाल और भोजन जैसी बुनियादी सुविधाएं दे।
वकील ने यह भी बताया कि प्रभावित लोगों के पास राशन कार्ड होने के बावजूद, जिन उचित मूल्य की दुकानों (फेयर प्राइस शॉप) से उन्हें जोड़ा गया है, वहां पर्याप्त अनाज ही नहीं दिया जाता।
इसके जवाब में मामले से जुड़े विभिन्न सरकारी विभागों के वकीलों ने अपना पक्ष रखा। उनका कहना था कि उचित मूल्य की दुकानों में राशन की कोई कमी नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चूंकि विस्थापित परिवार इस समय सरकारी जमीन पर नहीं बल्कि दूसरों की निजी जमीन पर रह रहे हैं, इसलिए वहां स्वच्छता सुविधाएं देने के लिए संबंधित विभाग से विशेष निर्देशों की आवश्यकता होगी। साथ ही यह भी कहा गया कि चिकित्सा सुविधाओं के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) मौजूद हैं, जहां ये लोग इलाज करा सकते हैं।
सभी पक्षों को सुनने के बाद, अदालत ने प्रतिवादियों को 9 मार्च से पहले हलफनामा दाखिल कर अपना रुख स्पष्ट करने का नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही, पीठ ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत पात्र लोगों को लाभ देने की बात दोहराते हुए अगली सुनवाई तक के लिए कई अंतरिम निर्देश जारी किए हैं:
राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग, जिला आयुक्त, संबंधित अंचल अधिकारी (सर्किल ऑफिसर) और पीएचई (PHE) डिवीजन के कार्यकारी अभियंता को मिलकर उस इलाके में पीने के पानी की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।
जिला आयुक्त और जिला खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति अधिकारी को निर्देश दिया गया है कि वे राशन की दुकानों में पर्याप्त अनाज सुनिश्चित करें, ताकि राशन कार्ड दिखाने पर याचिकाकर्ताओं को बिना किसी परेशानी के अनाज मिल सके।
स्वास्थ्य सेवा के संयुक्त निदेशक को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है कि विस्थापितों के शिविरों के आसपास मौजूद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 'बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं' अनिवार्य रूप से उपलब्ध हों।
अदालत ने जिला आयुक्त और अंचल अधिकारी को निर्देश दिया है कि वे निजी जमीन पर रह रहे इन परिवारों के लिए 'उचित अस्थायी स्वच्छता तंत्र' (शौचालय आदि) स्थापित करने के तरीके खोजें।
अंत में, अदालत ने स्पष्ट किया है कि गोलपारा जिला प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामे में इस बात का स्पष्ट रूप से जिक्र होना चाहिए कि याचिकाकर्ताओं को जीवन के अधिकार के तहत आने वाली बुनियादी जरूरतें उपलब्ध कराई जा रही हैं या नहीं।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.