
मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य धार जिले में गुरुवार को हालात तब बेहद तनावपूर्ण हो गए, जब ग्रामीणों ने एक प्रस्तावित सीमेंट कारखाने के लिए की जा रही चूना पत्थर खदान की सैंपलिंग का हिंसक तरीके से विरोध किया। यह पूरी घटना आदिवासी क्षेत्रों में जमीन के अधिकारों, पर्यावरण को होने वाले नुकसान और उन पर जबरन थोपे जा रहे औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को लेकर लोगों के गहरे आक्रोश को दर्शाती है।
बिना सहमति के काम शुरू करने पर भड़का गुस्सा
यह विवाद कुक्षी विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले खेलाड़ी (Kheladi) गांव से शुरू हुआ। बताया जा रहा है कि यहां एक सीमेंट उत्पादक कंपनी की टीम चूना पत्थर की संभावना तलाशने के लिए सैंपलिंग कर रही थी। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह काम प्रभावित समुदाय की पूर्व सहमति के बिना और दबाव बनाकर किया जा रहा था।
जैसे ही यह खबर फैली, आक्रोशित ग्रामीण बड़ी संख्या में मौके पर पहुंच गए। उन्होंने कंपनी की मशीनों और प्रशासनिक वाहनों में जमकर तोड़फोड़ की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जब पुलिस बल और अधिकारी वहां पहुंचे, तो उन पर भी पथराव किया गया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस घटना के वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह उपकरणों को नुकसान पहुंचाया गया, गाड़ियां पलट दी गईं और प्रदर्शनकारियों व सुरक्षाबलों के बीच तीखी झड़प हुई।
प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई
कुक्षी के एसडीएम प्रमोद गुर्जर ने मीडिया से बातचीत में पुष्टि की है कि ग्रामीण सैंपलिंग प्रक्रिया का कड़ा विरोध कर रहे थे, जिसने बाद में हिंसक रूप ले लिया। प्रशासन के दखल के बाद फिलहाल इलाके में शांति है। हालांकि, पुलिस की ओर से अभी तक इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है कि इस बवाल के मामले में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई एफआईआर (FIR) दर्ज हुई है या नहीं।
सड़क से लेकर विधानसभा तक लड़ेंगे: उमंग सिंघार
इस घटना ने अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि यह विरोध सिर्फ खेलाड़ी गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि धार और अलीराजपुर जिलों में फैली गंधवानी और जोबट जैसी विधानसभाओं में भी इसी तरह का भारी आक्रोश है। वहां भी दबाव में चूना पत्थर के लिए ड्रिलिंग की जा रही है।
सिंघार ने इसे वन अधिकार अधिनियम और 'पेसा' (PESA) जैसे संवैधानिक प्रावधानों के तहत सुरक्षित आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों का सीधा उल्लंघन बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर घटना की कड़ी निंदा करते हुए लिखा, "आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर किसी भी तरह की जबरदस्ती बर्दाश्त नहीं की जाएगी।"
राज्य सरकार पर ताकतवर लोगों के इशारे पर अन्याय को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी ग्रामीणों के साथ मजबूती से खड़ी है और यह लड़ाई सड़क से लेकर विधानसभा तक लड़ी जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने इस बात की जवाबदेही तय करने की मांग की कि आखिर इन ऑपरेशंस की अनुमति किसने दी।
पर्यावरण और अस्तित्व पर मंडराता खतरा
दूसरी ओर, पर्यावरणविदों और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इस तरह के खनन प्रोजेक्ट्स से उपजाऊ कृषि भूमि पूरी तरह बंजर हो जाएगी। इसके कारण न केवल स्थानीय समुदाय विस्थापित होंगे, बल्कि पहले से ही संवेदनशील इस क्षेत्र का इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) तबाह हो जाएगा।
यह घटना मध्य प्रदेश में औद्योगिक विकास, पर्यावरण और मूल निवासियों के अधिकारों के बीच चल रहे लगातार टकराव को एक बार फिर उजागर करती है। जहां एक ओर मामले की जांच जारी है, वहीं इस बवाल ने आदिवासी इलाकों में किसी भी प्रोजेक्ट से पहले लोगों की स्पष्ट सहमति लेने और सुरक्षा कानूनों को सख्ती से लागू करने की मांग को फिर से तेज कर दिया है।
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