दिल्ली हाईकोर्ट से सिद्धार्थ वरदराजन को बड़ा झटका, तथ्य छिपाने के कारण राहत का आदेश हुआ रद्द

दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने पर 'द वायर' के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को दी गई राहत रद्द की, हलफनामा देकर जवाब मांगने का निर्देश।
Siddharth Varadarajan
पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन
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नई दिल्ली: पत्रकार और 'द वायर' के संस्थापक संपादकों में से एक सिद्धार्थ वरदराजन को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने गुरुवार को उन्हें दी गई राहत का अपना पिछला आदेश वापस ले लिया है। कोर्ट ने उनकी याचिका में "महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने" की बात को बेहद गंभीरता से लिया है।

जस्टिस पुरुषेंद्र कौरव ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए वरदराजन के आचरण पर हलफनामे के जरिए स्पष्टीकरण मांगा है और उन्हें नोटिस जारी किया है।

इससे पहले 12 मई को दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के अप्रैल के उस संचार को रद्द कर दिया था, जिसमें वरदराजन के पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन (PIO) कार्ड को ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड में बदलने के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था। उस समय अदालत ने बिना कोई कारण बताए इस अनुरोध को ठुकराने पर संबंधित अधिकारियों की आलोचना की थी। अब अदालत का वह फैसला वापस ले लिया गया है।

गुरुवार को केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को एक अहम जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कथित मानहानि से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वरदराजन को अग्रिम जमानत देते हुए कुछ सख्त शर्तें लगाई थीं।

इन शर्तों में यह स्पष्ट किया गया था कि मुकदमे के लंबित रहने के दौरान वरदराजन संबंधित निचली अदालत की अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ेंगे। इसके साथ ही उन्हें अपना पासपोर्ट भी अदालत में जमा करने का कड़ा निर्देश दिया गया था।

सबसे बड़ी बात यह रही कि दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष दायर वरदराजन की याचिका में इन जमानत शर्तों का कोई जिक्र नहीं किया गया था। इसे अदालत ने महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाने का मामला माना है।

वरदराजन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन को संबोधित करते हुए जस्टिस कौरव ने मौखिक रूप से कहा कि उन्हें अपने मुवक्किल से निर्देश लेना चाहिए, अन्यथा यह बहुत गंभीर स्थिति है। जब रामकृष्णन ने अदालत को बताया कि वह जमानत की शर्तों से वाकिफ थीं, लेकिन याचिका में इसे शामिल करना उनके दिमाग से निकल गया था, तो उन्होंने अपनी इस भूल के लिए माफी भी मांगी।

इस पर जस्टिस कौरव ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत को इन शर्तों के बारे में नहीं बताया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तथ्यों को छिपाने के कारण याचिका को केवल इसी आधार पर खारिज करना पड़ सकता है। जज ने आगे कहा कि वे वकील की माफी स्वीकार करते हैं और याचिकाकर्ता के खिलाफ फिलहाल कार्रवाई नहीं करेंगे, लेकिन इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को हलफनामा दायर करके उचित स्पष्टीकरण देना होगा और उसी के आधार पर तय होगा कि आगे कोई कार्रवाई करनी है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि उनका हमेशा यह मानना होता है कि याचिकाकर्ता पूरी जानकारी और सच्चाई के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाता है।

कोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह माना कि याचिकाकर्ता अदालत के सामने महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने का दोषी है। इसी को आधार बनाते हुए अदालत ने सात कार्य दिवसों के भीतर हलफनामे पर आचरण स्पष्ट करने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 25 मई तय की है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि तथ्यों को छिपाने वाले वादी किसी भी तरह की राहत पाने के अयोग्य हो जाते हैं। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि अदालत की प्रक्रियाओं को धोखे से बचाकर उसके दुरुपयोग को रोका जा सके।

गौरतलब है कि मई 2020 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वरदराजन को एक एफआईआर के संबंध में अग्रिम जमानत दी थी। यह एफआईआर एक ट्वीट को लेकर दर्ज की गई थी, जिसमें दिल्ली के निजामुद्दीन में कोविड-19 मामलों के बढ़ने और नेहरू स्टेडियम को क्वारंटाइन सेंटर बनाने की बात कही गई थी। आरोप था कि इस रिपोर्ट से यूपी के सीएम की मानहानि हुई है।

सिद्धार्थ वरदराजन एक अमेरिकी नागरिक हैं, लेकिन उनकी जड़ें भारत से जुड़ी हैं और वह 1995 से यहां रह रहे हैं। उन्हें अक्टूबर 2002 में पीआईओ कार्ड जारी किया गया था। नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत 2015 की एक अधिसूचना के बाद, सभी मौजूदा पीआईओ कार्डधारकों को कानूनी रूप से ओसीआई कार्डधारक मान लिया गया था।

इसके बाद वरदराजन ने जनवरी 2022 में नई दिल्ली में विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय के समक्ष अपने पीआईओ कार्ड को भौतिक रूप से ओसीआई दस्तावेजों में बदलने के लिए आवेदन किया था। गृह मंत्रालय ने आवेदन को चार साल से अधिक समय तक लंबित रखने के बाद बिना कोई कारण बताए 2 अप्रैल को एक पंक्ति के ईमेल के जरिए उनके इस आवेदन को खारिज कर दिया था।

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