
नई दिल्ली: वकीलों के एक समूह ने शुक्रवार, 25 सितंबर को एक सार्वजनिक बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया आदेश को वापस लेने की मांग की है। यह आदेश नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम से जुड़ा है। इसके साथ ही समूह ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी नए सिरे से सुनवाई का आग्रह किया है।
'लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टीट्यूशन' की ओर से जारी इस बयान को सुप्रीम कोर्ट के वकील सुभाष चंद्रन के.आर. ने ऑनलाइन साझा किया। वकीलों के इस समूह ने अपील की है कि इन दोनों ही अहम मामलों की सुनवाई शीर्ष अदालत की ऐसी बेंच करे, जिसमें जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल न हों।
इस मांग के पीछे मीडिया और सार्वजनिक रिपोर्टों का हवाला दिया गया है। इन रिपोर्टों में दावा किया गया है कि जस्टिस शर्मा के बेटे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के स्थायी वकील के रूप में पैनल में शामिल हैं।
गौरतलब है कि 23 सितंबर को जस्टिस शर्मा की अगुवाई वाली खंडपीठ ने मेधा रूपम की अपील पर एक अंतरिम आदेश पारित किया था। मेधा रूपम मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं।
ठीक इसी दिन, 2023 के सीईसी और ईसी कानून को चुनौती देने वाले मामले में जस्टिस शर्मा और जस्टिस दीपांकर दत्ता के बीच मतभेद सामने आया था। जस्टिस दत्ता इस मामले की मेरिट पर सीधे सुनवाई करने के पक्ष में थे, जबकि जस्टिस शर्मा ने इसे पांच जजों की संविधान पीठ को सौंपने का फैसला सुनाया था।
दोनों जजों की राय अलग-अलग होने के कारण यह मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास लंबित है। उन्हें यह तय करना है कि इसके लिए संविधान पीठ का गठन किया जाए या नहीं, जिसके चलते इस महत्वपूर्ण मामले के अंतिम फैसले में और देरी हो रही है।
वकीलों के संगठन ने अपनी चिंताओं को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा है। पहली आपत्ति मेधा रूपम के मामले को कथित तौर पर गलत तरीके से जस्टिस शर्मा की बेंच के सामने सूचीबद्ध करने को लेकर है। संगठन का कहना है कि उनके पास बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई का रोस्टर नहीं था। दूसरी चिंता जस्टिस शर्मा के बेटे के चुनाव आयोग का वकील होने से जुड़ी है।
समूह ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि क्या सुनवाई के दौरान पक्षकारों को इन तथ्यों से अवगत कराया गया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका मकसद मामले के गुण-दोष पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि आम जनता की नजर में ये परिस्थितियां कैसी प्रतीत होती हैं।
बयान में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए कहा गया कि ऐसे हालात में जांच का पैमाना यह नहीं होता कि कोई जज वास्तव में प्रभावित हुआ है या नहीं। इसके बजाय यह देखा जाता है कि क्या एक निष्पक्ष और जागरूक पर्यवेक्षक को उस पूरी प्रक्रिया में किसी भी तरह के पक्षपात की आशंका नजर आ सकती है।
इसके अलावा, वकीलों के इस संघ ने शीर्ष अदालत से प्रकटीकरण (डिस्क्लोजर) और जज के सुनवाई से हटने (रिक्यूजल) को लेकर एक पारदर्शी प्रोटोकॉल बनाने का भी आग्रह किया है। उनका मानना है कि जब किसी जज के करीबी रिश्तेदार किसी पक्षकार या संबंधित संस्था के वकील हों, तो न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए स्पष्ट नियम होने चाहिए।
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