
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 23 सितंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों के वेतन से 5 लाख रुपये वसूलने का निर्देश दिया गया था। यह जुर्माना दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिए जाने के एवज में मुआवजे के तौर पर दिया जाना था। छात्रा को इस साल अप्रैल में नोएडा में हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले के अमल पर फिलहाल रोक लगा दी है। इससे पहले हाईकोर्ट ने छात्रा की करीब पांच महीने की हिरासत को गैरकानूनी करार देते हुए उसे रद्द कर दिया था।
डीएम मेधा रूपम की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत में दलील दी कि एनएसए लगाने जैसे फैसले केंद्र और राज्य स्तर पर कई चरणों की प्रक्रिया से गुजरने के बाद लिए जाते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इस मामले में केवल उनकी मुवक्किल को सजा के लिए अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। रूपम के पक्ष में भारत के सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता तुषार मेहता भी पेश हुए। वहीं, मामले में प्रतिवादी छात्रा आकृति चौधरी का पक्ष वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने रखा।
दोनों पक्षों के वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक इस मामले की गुण-दोष के आधार पर सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक हाईकोर्ट के फैसले, विशेषकर पैराग्राफ 27 से 33 के क्रियान्वयन पर रोक रहेगी। अदालत ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर के लिए तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले के जिन सात पैराग्राफ को रेखांकित किया है, उनमें नौकरशाही के तानाशाही रवैये को लेकर कड़ी टिप्पणी की गई थी। हाईकोर्ट ने चेतावनी दी थी कि अधिकारियों का ऐसा आचरण उत्तर प्रदेश को एक "ऑर्वेलियन डिस्टोपिया" में बदल सकता है, जहां नागरिकों के अधिकारों का घोर दमन होता है।
इससे पहले हाईकोर्ट ने छात्रा के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट पर बिना सोचे-समझे कार्रवाई करने के लिए डीएम मेधा रूपम की कड़ी आलोचना की थी। अदालत ने छात्रा की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी नोटिस में कई खामियां उजागर करते हुए राज्य सरकार की दलीलों को एक गढ़ी हुई कहानी करार दिया था।
गौरतलब है कि आकृति चौधरी उन कई कार्यकर्ताओं में शामिल थीं, जिन्हें 10 से 18 अप्रैल के बीच हुए प्रदर्शन के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। इस दौरान औद्योगिक और संविदा मजदूर पड़ोसी राज्य हरियाणा के बराबर वेतन दिए जाने और मजदूरी बढ़ाने की मांग कर रहे थे। यह प्रदर्शन 13 अप्रैल को हिंसक हो गया था।
इस घटना के एक महीने बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने आकृति चौधरी पर एनएसए लगा दिया था। पुलिस का आरोप था कि छात्रा ने प्रदर्शनकारियों को पथराव और आगजनी करने के लिए उकसाया था। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पुलिस ने दावा किया था कि उनके पास छात्रा के खिलाफ मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफिक सबूत मौजूद हैं।
हाईकोर्ट ने अपने कड़े फैसले में कहा था कि बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाली एक छात्र कार्यकर्ता के खिलाफ एनएसए जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करना एक डराने वाला उदाहरण सेट करने की कोशिश थी। अदालत के अनुसार, इसका मकसद अन्य लोगों को मजदूरों के समर्थन में बोलने और सार्वजनिक स्थानों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग करने से रोकना था। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट अपनी निष्ठा की शपथ का उल्लंघन करने की दोषी हैं।
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