
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने 2027 की जनगणना में जातियों की गिनती के लिए 'ओपन-कॉलम' (खुले कॉलम) पद्धति अपनाने का फैसला किया है। इस दौरान केंद्र और राज्यों की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) सूची के इस्तेमाल पर भी विचार किया गया था। हालांकि, गहन मंथन के बाद इसे खारिज कर दिया गया। अधिकारियों का कहना है कि ओबीसी की सूची दरअसल जातियों की सूची नहीं है, बल्कि यह वर्गों (क्लास) की सूची है। इसी तकनीकी पेंच के कारण सरकार ने इस विकल्प को किनारे कर दिया।
अधिकारियों के मुताबिक, ओबीसी सूची में कई ऐसी प्रविष्टियां हैं जो किसी विशेष जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। इसके बजाय वे लोगों के विभिन्न समूहों को दर्शाती हैं, जैसे कि भीख मांगने के काम में लगे लोग। जब राज्यों की सूचियों के उपयोग पर विचार किया जा रहा था, तब भी बिल्कुल ऐसी ही समस्या सामने आई थी।
मीडिया रिपोर्ट के हवाले से एक अधिकारी ने बताया कि सरकार इस बात का आकलन कर रही थी कि क्या बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों में हुए जातिगत सर्वेक्षणों के मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जा सकता है। इसी समीक्षा के दौरान ये व्यावहारिक दिक्कतें उभर कर सामने आईं।
अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों की गिनती हमेशा की तरह संबंधित राष्ट्रपति सूचियों के आधार पर ही की जा रही है। लेकिन 'अन्य सभी जातियों' के लिए एक ओपन-कॉलम रखने के फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे विपक्षी नेताओं के साथ-साथ कई ओबीसी समूहों ने मांग की है कि इन समुदायों को विशेष रूप से सूचीबद्ध करके गिना जाए। उन्होंने ओपन-कॉलम पद्धति की उपयोगिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
विपक्षी नेताओं और कई विद्वानों का तर्क है कि ओपन-कॉलम तरीके से 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) जैसे ही परिणाम सामने आ सकते हैं। 2011 के उस सर्वेक्षण में 46 लाख से अधिक जातियों के नाम सामने आए थे। नरेंद्र मोदी सरकार ने इतनी बड़ी संख्या में विसंगतियों का हवाला देते हुए ही उस अभ्यास के जातिगत आंकड़े जारी नहीं किए थे।
जाति गणना की कार्यप्रणाली से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि जिन भी विकल्पों पर चर्चा हुई, उन सभी के अपने फायदे और नुकसान थे। उनका कहना है कि उच्चतम स्तर पर सभी पहलुओं और अन्य विकल्पों पर बारीकी से विचार करने के बाद ही ओपन-कॉलम पद्धति को अंतिम रूप दिया गया है।
केंद्र या राज्य की ओबीसी सूचियों के इस्तेमाल पर चर्चा के दौरान मुख्य मुद्दा यह था कि क्या इसमें दर्ज सभी समुदायों को जातियों के रूप में गिना जा सकता है। दरअसल, इन सूचियों में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के 'स्थानीय निवासी' जैसे नाम शामिल हैं। इसके अलावा असम के चाय बागान श्रमिकों जैसे खास मजदूर वर्ग या बसावट वाले समूहों को भी इसमें जगह मिली है, जिन्हें तकनीकी तौर पर जाति नहीं माना जा सकता।
हालांकि केंद्र और राज्य दोनों की ओबीसी सूचियों में ऐसी प्रविष्टियां मौजूद हैं, लेकिन लगभग 3,000 समुदायों वाले ओबीसी वर्ग में इनकी संख्या काफी कम है। एक और बड़ी उलझन यह है कि कई समुदाय जो एक राज्य की ओबीसी सूची में शामिल हैं, वे किसी अन्य राज्य में एससी या एसटी के रूप में भी वर्गीकृत हो सकते हैं।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) ने 2015 के एक दस्तावेज़ में इस बात पर निष्कर्ष निकाला था कि क्या किसी ओबीसी समुदाय को केवल जाति के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। आयोग ने कहा था कि भारत में एक जाति अक्सर एक सामाजिक वर्ग भी होती है। चूंकि जाति एक मौजूदा और आसानी से पहचाना जाने वाला सामाजिक समूह या वर्ग है, जो देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को कवर करता है, इसलिए इसके साथ शुरुआत करना और फिर अन्य समूहों या वर्गों तक जाना पूरी तरह से तार्किक है।
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के बहुमत खोने के एक साल बाद, तीसरे कार्यकाल वाली नरेंद्र मोदी सरकार की केंद्रीय कैबिनेट ने 2027 के जनगणना फॉर्म में जाति को शामिल करने की योजना को मंजूरी दी है। चुनाव से पहले विपक्ष ने जाति जनगणना को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था। विपक्ष का एक प्रमुख तर्क यह रहा है कि ओबीसी आबादी की सटीक गिनती होना बेहद जरूरी है, क्योंकि अब तक यह आंकड़ा सिर्फ 1931 की जातिगत जनगणना के आधार पर ही अनुमानित किया जाता रहा है।
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