केरल के मंदिरों में गैर-हिंदूओं का प्रवेश: हाईकोर्ट के बड़े फैसले ने बदली तस्वीर, जानें पूरा मामला

हाईकोर्ट ने कहा, “कानून का उद्देश्य सामाजिक सद्भाव सुनिश्चित करना और नागरिकों के कल्याण को बढ़ावा देना है। कानून स्थिर नहीं है; यह गतिशील है और समाज की बदलती जरूरतों व वास्तविकताओं के साथ विकसित होता है।"
अदालत ने नियम 3(a) पर गंभीर सवाल उठाए, जिसमें गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध है। अदालत ने नोट किया कि मूल एक्ट में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है, जबकि नियम में यह प्रतिबंध जोड़ा गया है।
अदालत ने नियम 3(a) पर गंभीर सवाल उठाए, जिसमें गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध है। अदालत ने नोट किया कि मूल एक्ट में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है, जबकि नियम में यह प्रतिबंध जोड़ा गया है। सांकेतिक चित्र इंटरनेट
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कोच्चि- केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी हिंदू मंदिर के तंत्री (मुख्य पुजारी) द्वारा अनुमति देने पर गैर-हिंदुओं का 'अतिथि' या 'विशिष्ट आमंत्रित व्यक्ति' के रूप में मंदिर में प्रवेश, मंदिर के नियमों, रीति-रिवाजों या धार्मिक प्रथाओं का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस के. वी. जयकुमार की पीठ ने यह फैसला आदूर के श्री पार्थसारथी मंदिर में दो ईसाई पादरियों के प्रवेश को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनाया।

7 सितंबर 2023 को दो ईसाई पादरियों ने पौरोहित्य वस्त्र पहनकर नालम्बलम (मंदिर का आंतरिक हिस्सा) में प्रवेश किया, जो केरल हिंदू प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप (ऑथराइजेशन ऑफ एंट्री) एक्ट, 1965 और नियम 1965 के नियम 3(a) का उल्लंघन है, जिसमें गैर-हिंदुओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक है।

याचिकाकर्ता संजिल नारायणन नंपूतिरी ने आरोप लगाया था कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी समारोह के दौरान डॉ. जकरिया मार एप्रेम नामक एक ईसाई पादरी को मंदिर परिसर में आयोजित सार्वजनिक सभा में बुलाया गया और बाद में मंदिर के तंत्री और सलाहकार समिति के सदस्यों ने उन्हें मंदिर के नालम्बलम में ले जाकर सम्मानित किया।

कानून, नियम और विनियम विभिन्न धर्मों, जातियों, उप-जातियों या समुदायों के बीच कलह या असंतोष फैलाने के साधन बनने नहीं दिए जाने चाहिए। इसके विपरीत कानूनी ढांचे को एक ऐसी एकजुट शक्ति के रूप में कार्य करना चाहिए जो आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व को बढ़ावा दे।"
केरला हाईकोर्ट

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि तंत्री मंदिर पदानुक्रम में एक केंद्रीय और पवित्र स्थान रखता है, जिसे देवता का आध्यात्मिक संरक्षक एवं रीति-रिवाजों का सर्वोच्च प्राधिकारी माना जाता है। पीठ ने कहा, "तंत्री द्वारा अनुमति देकर, 'अतिथि' (मेहमान) या विशिष्ट आमंत्रित व्यक्ति के रूप में किया गया प्रवेश, अधिकार के तौर पर दावा किए गए प्रवेश से मौलिक रूप से भिन्न है। इस तरह का अनुमति-आधारित और औपचारिक प्रवेश, हमारे विचार में, अधिनियम, वहां बनाए गए नियमों या मंदिर को नियंत्रित करने वाले स्थापित रीति-रिवाजों और प्रथाओं का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।"

 न्यायालय ने गौर किया कि मुख्य अधिनियम (1965 का अधिनियम) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध का कोई प्रावधान नहीं है। यह प्रतिबंध नियम 3(ए) में लगाया गया है। पीठ ने कहा, "अधिनियम और नियमों के बीच स्पष्ट विसंगति है... यह सुस्थापित कानून है कि यदि मूल अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों के बीच कोई असंगति है, तो पूर्व (अधिनियम) प्रबल होगा।" न्यायालय ने कहा कि यह सरकार के लिए विचारणीय है कि वह नियम 3(ए) की समीक्षा करे और इसे विधायी उद्देश्य और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप लाए।

पीठ ने टिप्पणी की, "कानून का मूल उद्देश्य सामाजिक सद्भाव सुनिश्चित करना और नागरिकों का कल्याण promote करना है। कानून स्थिर नहीं है; यह गतिशील है और समाज की बदलती आवश्यकताओं और वास्तविकताओं के साथ विकसित होता है... कानून, नियम और विनियम विभिन्न धर्मों, जातियों, उप-जातियों या समुदायों के बीच कलह या असंतोष फैलाने के साधन बनने नहीं दिए जाने चाहिए। इसके विपरीत, कानूनी ढांचे को एक ऐसी एकजुट शक्ति के रूप में कार्य करना चाहिए जो आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व को बढ़ावा दे।"

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा, "हिंदू धर्म को विश्व के अन्य धर्मों से अलग, जीवन के एक तरीके के रूप में वर्णित किया जा सकता है।" और यह कि मंदिर में प्रवेश धार्मिक प्रथाओं पर निर्भर है, और अगर किसी मंदिर की प्रथा/रिवाज किसी गैर-हिंदू भक्त के प्रवेश की अनुमति देते हैं, तो ऐसे व्यक्तियों को प्रवेश दिया जा सकता है।

इन सभी तर्कों के आधार पर केरल उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा मांगे गए सभी राहतों को अस्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने कहा कि चूंकि तंत्री ने पादरियों के प्रवेश की अनुमति दी थी और वे सामान्य जनता के सदस्य के बजाय आमंत्रित अतिथि के रूप में गए थे, इसलिए उक्त प्रवेश को अधिनियम या नियमों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

इस फैसले को हिंदू मंदिर प्रबंधन और अंतर-धार्मिक सौहार्द के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जो मंदिर के तंत्री के अधिकारों और समावेशी सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन बैठाता है।

अदालत ने नियम 3(a) पर गंभीर सवाल उठाए, जिसमें गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध है। अदालत ने नोट किया कि मूल एक्ट में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है, जबकि नियम में यह प्रतिबंध जोड़ा गया है।
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