महाराष्ट्र में मराठा समाज को दिए गए 10 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर बॉम्बे हाईकोर्ट में 9 अक्टूबर से निर्णायक सुनवाई शुरू होने जा रही है। न्यायमूर्ति मकरंद कर्णिक, न्यायमूर्ति निजामुद्दीन जमादार और न्यायमूर्ति संदीप मार्ने की तीन सदस्यीय विशेष पीठ 'महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग आरक्षण अधिनियम, 2024' को चुनौती देने वाली तथा इसके समर्थन में दायर सभी याचिकाओं पर एक साथ विचार करेगी।
न्यायमूर्ति मकरंद कर्णिक ने शुक्रवार 18 सितंबर को स्पष्ट किया कि पीठ 9 अक्टूबर से दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुनना शुरू करेगी। इससे पहले दो अलग-अलग पीठों के पुनर्गठन के कारण मामले की सुनवाई बाधित हुई थी।
पूर्व में मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र उपाध्याय, न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति फिरदौश पूनीवाला की पीठ इस पर सुनवाई कर रही थी, लेकिन न्यायमूर्ति उपाध्याय के दिल्ली हाईकोर्ट स्थानांतरित होने के बाद प्रक्रिया रुक गई। इसके बाद न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे की अध्यक्षता वाली पीठ ने मई 2025 से अगस्त 2025 तक मामले को सुना, किंतु उनका कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद पर पदोन्नति होने से सुनवाई पुनः रुक गई थी।
महाराष्ट्र विधानमंडल ने इस कानून को 20 फरवरी 2024 को पारित किया था, जिसे 26 फरवरी 2024 को राज्य सरकार ने विधिवत अधिसूचित किया। यह अधिनियम सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुनील बी. शुक्रे की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पर आधारित है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में असाधारण परिस्थितियों का हवाला देते हुए आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा से परे जाकर मराठा समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की थी।
गौरतलब है कि इससे पहले वर्ष 2018 में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने मराठा समुदाय को शिक्षा और नौकरियों में 16 प्रतिशत आरक्षण देने वाला कानून बनाया था। जून 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस कानून को बरकरार तो रखा, लेकिन कोटे को शिक्षा में 12 प्रतिशत और सरकारी नौकरियों में 13 प्रतिशत तक सीमित कर दिया था।
हाईकोर्ट के उस फैसले को जरांगे पाटिल व अन्य याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी। इसके बाद मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 2018 के आरक्षण कानून को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि 1992 के ऐतिहासिक इंदिरा साहनी (मंडल) फैसले की 50 प्रतिशत सीमा को लांघने का कोई असाधारण आधार मौजूद नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय मराठा समुदाय के पिछड़ेपन को साबित करने वाले आंकड़ों पर भी सवाल उठाए थे। राज्य सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को शीर्ष अदालत ने अप्रैल 2023 में खारिज कर दिया था। इसके बाद सरकार ने पुनः याचिका दायर की, जो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। अब सभी की निगाहें बॉम्बे हाईकोर्ट में 9 अक्टूबर से शुरू होने वाली नई सुनवाई पर टिकी हैं।
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