
असम सरकार ने 25 मई 2026 को राज्य विधानसभा में 'यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम, 2026 बिल' पेश कर दिया है। इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य विवाह, तलाक, संपत्ति के उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में राज्य के सभी निवासियों के लिए एक समान कानून लागू करना है।
यदि यह बिल सदन से पारित हो जाता है, तो उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन जाएगा, जहां यूसीसी लागू होगा।
सदन में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ओर से संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने इस बिल को पटल पर रखा। हालांकि, विधानसभा में मौजूद कांग्रेस सहित तीन प्रमुख विपक्षी दलों के विधायकों ने इस बिल का कड़ा विरोध किया है।
मुख्यमंत्री ने इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यूसीसी बिल पेश होने से इस बात पर आधिकारिक चर्चा का रास्ता साफ हो गया है कि आज के समय में इसकी जरूरत क्यों है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कानून हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा दिखाए गए मार्ग को साकार करने में मदद करेगा।
इस नए प्रस्तावित कानून के तहत दो शादियां करने या बहुविवाह को पूरी तरह से गैरकानूनी घोषित किया गया है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 82 के तहत ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर सात साल तक की जेल की सजा का कड़ा प्रावधान किया गया है।
पूर्ण समानता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए लाए गए इस असम यूसीसी बिल में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
नए नियम के अनुसार, लड़कों के लिए शादी की वैध कानूनी उम्र 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल निर्धारित की गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कानून राज्य की सांस्कृतिक विविधता की पूरी तरह रक्षा करता है।
लोग बिना किसी रोक-टोक के अपने पारंपरिक और धार्मिक रीति-रिवाजों से शादी कर सकेंगे। इनमें वैदिक विवाह, अहोम चकलॉन्ग, सप्तपदी, आशीर्वाद, निकाह, होली यूनियन और आनंद कारज जैसी सभी मान्यता प्राप्त विधियां शामिल हैं।
धोखाधड़ी और फरेब को रोकने के लिए सभी शादियों और तलाक का रजिस्ट्रेशन अब अनिवार्य कर दिया गया है। नए नियम के मुताबिक, नवविवाहित जोड़ों को शादी समारोह के साठ दिनों के भीतर सब-रजिस्ट्रार के पास अपना मैरिज मेमोरेंडम जमा करना होगा।
यह बिल तलाक के लिए भी एक समान आधार तय करता है, जिसमें क्रूरता, साथी को छोड़ देना या आपसी सहमति शामिल है। इसके साथ ही, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की कस्टडी अनिवार्य रूप से मां को ही सौंपने का स्पष्ट नियम बनाया गया है।
संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार में भी लैंगिक समानता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। क्लास-1 के वारिसों में जीवनसाथी, बच्चों और मृतक के माता-पिता को समान रूप से शामिल किया गया है। मानसिक रूप से स्वस्थ किसी भी वयस्क नागरिक को अपनी इच्छानुसार वसीयत बनाने का कानूनी अधिकार प्रदान किया गया है।
आधुनिक पारिवारिक संरचनाओं को ध्यान में रखते हुए, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन एक महीने के भीतर कराना अनिवार्य कर दिया गया है। नए कानून के तहत लिव-इन से पैदा होने वाले बच्चों को पूरी तरह से वैध माना जाएगा। यदि कोई पार्टनर लिव-इन में रहने वाले साथी को धोखा देकर छोड़ देता है, तो उस पीड़ित साथी को अदालत के माध्यम से आर्थिक भरण-पोषण मांगने का स्पष्ट कानूनी अधिकार होगा।
इस बिल के माध्यम से सरकार ने कड़ा संदेश दिया है कि व्यक्तिगत रिश्तों में किसी भी तरह का शोषण, धोखाधड़ी और गैरकानूनी कृत्य बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बाल विवाह और बिना वैध सहमति के की गई शादी के मामलों में दो साल तक की जेल या जुर्माना अथवा दोनों सजाएं हो सकती हैं। वहीं, बलपूर्वक या सच्चाई छिपाकर की गई धोखेबाजी वाली शादियों के लिए सात साल तक की जेल और जुर्माने का सख्त प्रावधान रखा गया है।
गैरकानूनी तरीके से तलाक की प्रक्रिया अपनाने या शादी तोड़ने पर तीन साल की कैद और जुर्माने की सजा तय की गई है। पुनर्विवाह से पहले किसी तलाकशुदा व्यक्ति को गैरकानूनी शर्तें मानने के लिए मजबूर करने पर तीन साल की जेल और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा।
इसके अलावा, मान्य रीति-रिवाजों के बिना निषिद्ध रिश्तों के बीच शादी करने पर छह महीने तक की सजा और 50,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
जानबूझकर 60 दिनों के भीतर शादी या तलाक का रजिस्ट्रेशन न कराने पर 10,000 रुपये का जुर्माना देना होगा। रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के दौरान फर्जी या जाली दस्तावेज जमा करने पर तीन महीने की जेल या 25,000 रुपये का जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं।
इसी तरह, लिव-इन रिलेशनशिप की जानकारी एक महीने के भीतर दर्ज न कराने पर तीन महीने तक की जेल या 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। लिव-इन से जुड़ी अहम जानकारी छिपाने या गलत तथ्य पेश करने पर तीन महीने तक की जेल और 25,000 रुपये तक के जुर्माने का नियम है।
राज्य के वैधानिक ढांचे को सुव्यवस्थित करने के उद्देश्य से 'असम अनिवार्य मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम, 2024' को इस बिल के जरिए रद्द कर दिया गया है। हालांकि, यूसीसी लागू होने से पहले संपन्न हो चुके बहुविवाहों को नियमित करने और उन्हें कानूनी सुरक्षा देने के लिए एक विशेष बचाव खंड (सेविंग्स क्लॉज) भी शामिल किया गया है।
सरकारी बयान के अनुसार, यह सम्पूर्ण नियमन कानूनी एकरूपता और राज्य की सांस्कृतिक भावनाओं के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाता है, जो असम को एक प्रगतिशील राज्य के रूप में स्थापित करेगा।
दूसरी ओर, विपक्षी दल इस बिल को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस नेता जाकिर हुसैन सिकदर ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपने राजनीतिक एजेंडे के कारण इस बिल को जबरन थोप रही है। उन्होंने कहा कि सदन में बिल पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों और गैर-राजनीतिक संगठनों से व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए था।
बिल पेश होने से पहले 23 मई 2026 को गुवाहाटी में करीब 10 मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने एक बड़ी बैठक की थी। इन संगठनों ने राज्य सरकार पर दबाव बनाया था कि यूसीसी बिल को अंतिम रूप देने से पहले सभी संबंधित पक्षों की राय ली जाए।
अब इस अहम बिल पर 16वीं असम विधानसभा के पहले सत्र के आखिरी दिन यानी 27 मई को विस्तृत चर्चा होनी तय है।
विधानसभा के अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में, राज्य सरकार ने 126 सदस्यीय सदन में एक अहम प्रस्ताव भी पेश किया। इस प्रस्ताव में परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का पुरजोर समर्थन किया गया है।
इसके अलावा, विधायक के रूप में अपने पहले भाषण में तुलिराम रोंगहांग ने संविधान के अनुच्छेद 244(ए) को लागू करने की जोरदार मांग उठाई। कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद के मुख्य कार्यकारी सदस्य रोंगहांग ने तीन पहाड़ी जिलों— कार्बी आंगलोंग, पश्चिम कार्बी आंगलोंग और दीमा हसाओ— के लिए असम राज्य के भीतर ही स्वायत्त राज्य (ऑटोनोमस स्टेट) बनाने का प्रस्ताव रखा।
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