कौन हैं 1857 की क्रांति के 'गुमनाम नायक' वीरा पासी, जिनकी मूर्ति का राहुल गांधी ने रायबरेली में किया अनावरण?

रायबरेली में राहुल गांधी द्वारा वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण: जानिए 1857 के गुमनाम दलित नायक का गौरवशाली इतिहास और यूपी विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक की राजनीति का पूरा समीकरण।
A statue of Veera Pasi
जानिए 1857 की क्रांति के दलित नायक वीरा पासी कौन हैं। राहुल गांधी द्वारा रायबरेली में उनकी मूर्ति के अनावरण और यूपी की दलित राजनीति का पूरा चुनावी समीकरण समझिए।
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उत्तर प्रदेश: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को रायबरेली में 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों से लोहा लेने वाले 'गुमनाम नायक' वीरा पासी की मूर्ति का अनावरण किया। उत्तर प्रदेश में पासी समुदाय को उनके महापुरुषों के जरिए लुभाने का राजनीतिक दलों का यह कोई पहला प्रयास नहीं है। हालांकि, अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव से पहले गांधी के अपने संसदीय क्षेत्र में उठाए गए इस कदम को बेहद अहम माना जा रहा है।

इसी दिन उन्होंने वीरा पासी की याद में एक 'बहुजन स्वाभिमान सभा' को भी संबोधित किया। इस कार्यक्रम में गांधी ने कहा कि हम वीरा पासी और डॉ. अंबेडकर को तो याद करते हैं, लेकिन उनकी विचारधारा को ठीक से नहीं बचाया जा रहा है, क्योंकि हमारी आंखों के सामने ही आज संविधान पर लगातार हमले हो रहे हैं।

वीरा पासी कौन थे?

19वीं सदी में वीरा पासी आधुनिक रायबरेली के शंकरपुर एस्टेट के शासक राणा बेनी माधव बख्श सिंह के सबसे भरोसेमंद साथी और सेनापति थे। पासी जाति से ताल्लुक रखने वाले इस दलित योद्धा का जन्म 11 नवंबर 1835 को रायबरेली जिले के लोधवारी गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था।

बचपन में ही माता-पिता का साया उठ जाने के बाद वह अपनी बहन के घर रहने चले गए थे। स्थानीय बोली में बहन के परिवार के साथ रहने वाले भाई को "वीरना" कहा जाता था, जो बाद में बदलकर "वीरा" हो गया।

उनकी अद्भुत शारीरिक ताकत से प्रभावित होकर सिंह ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया था। अपनी निष्ठा और बहादुरी के दम पर वह जल्द ही उनके सबसे विश्वस्त सहयोगियों में से एक बन गए।

स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, 1857 के विद्रोह के दौरान जब अंग्रेजों ने सिंह को बंदी बना लिया था, तब पासी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उन्हें जेल से सुरक्षित बाहर निकाल लिया था। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने बौखलाकर पासी को पकड़ने या उनके ठिकाने की जानकारी देने पर 50,000 रुपये के भारी इनाम की घोषणा कर दी थी।

भले ही वीरा पासी का नाम इतिहास की किताबों में बहुत प्रमुखता से दर्ज नहीं है, लेकिन रायबरेली और उसके आसपास के इलाकों में उनकी विरासत आज भी जिंदा है। इन क्षेत्रों में पासी समुदाय बड़ी संख्या में रहता है और उनकी मौखिक परंपराओं ने अपने इस नायक को भुलाने नहीं दिया। लोककथाओं में यह भी कहा जाता है कि ब्रिटिश सेना से सिंह की रक्षा करते हुए ही पासी वीरगति को प्राप्त हुए थे।

यूपी में दलित इतिहास और राजनीति

पिछले कुछ वर्षों में यूपी के राजनीतिक दलों ने अतीत के दलित महापुरुषों और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को प्रमुखता से याद करना शुरू किया है। साल 2024 के आम चुनाव के बाद फैजाबाद (अयोध्या) से समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद अवधेश प्रसाद ने लोकसभा में शपथ लेते समय इसका एक स्पष्ट उदाहरण पेश किया था। उन्होंने शपथ के दौरान पासी (दलित) समुदाय की दो प्रमुख हस्तियों "वीरांगना" ऊदा देवी और "महाराजा" बिजली पासी का विशेष तौर पर जिक्र किया था।

ऊदा देवी अवध की बेगम हजरत महल के शाही रक्षक दल का हिस्सा थीं और उन्होंने 1857 के विद्रोह में सक्रिय रूप से भाग लिया था। अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए आम लोगों को एकजुट करने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। इसी ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए नवंबर 2022 में सपा ने अपने पार्टी मुख्यालय में ऊदा देवी की पुण्यतिथि भी बड़े स्तर पर मनाई थी।

वहीं, मध्यकाल में यूपी के कुछ हिस्सों पर शासन करने वाले बिजली पासी सबसे प्रमुख दलित प्रतीकों में गिने जाते हैं। यूपी में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने लखनऊ में बिजली पासी के किले को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना का ऐलान किया है।

दिसंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महाराजा बिजली पासी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी प्रधानमंत्री के सुर में सुर मिलाते हुए उन्हें लखनऊ का एक ऐसा बहादुर योद्धा बताया था, जिसने भारत की सनातन परंपराओं की रक्षा के लिए विदेशी शासन को खुली चुनौती दी थी।

यूपी के दलित नेताओं और शिक्षाविदों का स्पष्ट रूप से मानना है कि इतिहासकारों ने समुदाय के महापुरुषों को काफी हद तक "नजरअंदाज" किया है। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर अजय कुमार कहते हैं कि मुख्यधारा के इतिहास लेखन ने अक्सर दलितों, आदिवासियों और अन्य हाशिए के समुदायों के योगदान की उपेक्षा की है।

प्रोफेसर कुमार के अनुसार, इसी अनदेखी के विरोध में इन समुदायों ने अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वापस पाने की लंबी कोशिश की है। यह प्रक्रिया केवल अतीत को फिर से खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पहचान, आत्म-सम्मान और राजनीतिक चेतना को पुनर्जीवित करने का भी एक सशक्त माध्यम है।

उन्होंने आगे बताया कि चूंकि इन समुदायों के पास पारंपरिक रूप से बहुत कम लिखित रिकॉर्ड मौजूद थे, इसलिए उनका इतिहास लोककथाओं, लोकगीतों, स्मृतियों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचा। यही मौखिक परंपराएं उनके सामाजिक अनुभवों, संघर्षों और सामूहिक चेतना की सबसे महत्वपूर्ण वाहक बन गईं।

पासी समुदाय से आने वाले सपा नेता मनोज पासवान ने भी प्रोफेसर कुमार की बातों का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह कांशीराम ही थे जिन्होंने दलित नायकों को मुख्य पटल पर ला खड़ा किया और समुदाय से अपील की कि वे अपने इतिहास पर शर्मिंदा होने के बजाय उस पर गर्व करना सीखें।

पासवान का मानना है कि दलित नेताओं ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बावजूद मंगल पांडे जैसे सवर्ण नायकों की तरह उन्हें इतिहास की किताबों में वह जगह नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे, और अब इस ऐतिहासिक भूल को सुधारे जाने की सख्त जरूरत है।

पासी समुदाय और यूपी का दलित वोट बैंक

राज्य की कुल अनुसूचित जाति की आबादी में पासी समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 7 प्रतिशत के करीब है। यह आंकड़ा उन्हें जाटवों के बाद यूपी में दलितों के बीच दूसरा सबसे बड़ा और प्रभावशाली समूह बनाता है। हालांकि भारत के अन्य राज्यों में भी उनकी अच्छी खासी मौजूदगी है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी आबादी उत्तर प्रदेश में ही निवास करती है।

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में जब सपा ने 37 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया था, तो पार्टी को इस समुदाय का एक बड़ा फायदा मिला था। सपा द्वारा चुनाव मैदान में उतारे गए पांच पासी उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी, जबकि इसके मुकाबले भाजपा के केवल तीन पासी उम्मीदवार ही अपनी सीट निकाल पाए थे।

यूपी की राजनीति में कभी बेहद मजबूत रही मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का जनाधार अब लगातार सिकुड़ रहा है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा का कुल वोट शेयर 22.23 प्रतिशत था, जो ठीक पांच साल बाद हुए चुनाव में गिरकर 12.88 प्रतिशत रह गया।

दिलचस्प बात यह है कि यह बचा हुआ वोट शेयर मोटे तौर पर जाटव-रविदासी दलितों की आबादी के अनुपात में ही है, जो शुरुआत से ही बसपा का मुख्य और अटूट समर्थक वर्ग रहा है। बसपा के इसी खाली होते राजनीतिक स्पेस को भरने के लिए अब सपा और कांग्रेस से लेकर चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) तक हर कोई एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।

सपा और कांग्रेस दोनों ही बीआर अंबेडकर और कांशीराम का लगातार आह्वान करके दलित मतदाताओं के दिलों तक पहुंचने की दिशा में काम कर रहे हैं। इस साल 14 अप्रैल को अंबेडकर की जयंती के अवसर पर दोनों ही पार्टियों ने पूरे राज्य में कई बड़े कार्यक्रम आयोजित करके अपनी मंशा साफ कर दी थी।

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित समुदाय का भारी समर्थन मिलने का दावा करने के बाद सपा और कांग्रेस अब अपनी जमीनी पकड़ और मजबूत करना चाहती हैं। चुनाव परिणामों के आंकड़ों से भी यह स्पष्ट हो गया था कि दलित मतदाताओं का रुझान अब बदल रहा है।

यही सबसे बड़ी वजह है कि दोनों पार्टियां यह सुनिश्चित करने में जुटी हैं कि यूपी की कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा रखने वाले दलित वर्ग का समर्थन उन्हें मिलता रहे। इन दोनों ही दलों का मुख्य लक्ष्य अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में इस बड़े और निर्णायक वोट बैंक को अपने पाले में पूरी तरह से गोलबंद करना है।

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