
गुवाहाटी- असम के प्रमुख बुद्धिजीवी, लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के बार-बार की गई कथित नफरत भरी टिप्पणियों (हेट स्पीच) और संवैधानिक उल्लंघनों पर गुवाहाटी हाईकोर्ट का ध्यान आकर्षित किया है। प्रसिद्ध विद्वान और साहित्यकार हिरेन गोहैन के नेतृत्व में 43 प्रमुख हस्तियों ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर मुख्यमंत्री के बयानों पर सुओ मोटो संज्ञान लेने की मांग की है।
पत्र में आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री सरमा ने बंगाल मूल के मुस्लिम समुदाय, जिसे आमतौर पर "मियां" कहा जाता है, के खिलाफ लगातार ऐसी टिप्पणियां की हैं जो नफरत फैलाने, सामाजिक अपमान, आर्थिक भेदभाव और शारीरिक उत्पीड़न को बढ़ावा देती हैं। इनमें एक हालिया बयान शामिल है जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा, "जो कोई भी कर सकता है, किसी भी तरीके से मियां को परेशान करे। अगर रिक्शा का किराया 5 रुपये है, तो उन्हें सिर्फ 4 रुपये दो।" ऐसा बयान राज्य के सर्वोच्च कार्यकारी प्रमुख से आना संविधान के मूल्यों के खिलाफ माना जा रहा है।
पत्र में आगे कहा गया है कि मुख्यमंत्री ने भाजपा कार्यकर्ताओं को विशेष संशोधन (Special Revision - SR) प्रक्रिया में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के खिलाफ आपत्तियां दर्ज करने का निर्देश दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारी ओवरटाइम काम करके इस समुदाय को परेशान करें। यह एक संवैधानिक और अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया में कार्यकारी हस्तक्षेप का गंभीर मामला है, जो चुनाव आयोग की निष्पक्षता को प्रभावित करता है और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन करता है।
पत्र में कहा गया कि मूल रूप से मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले ये लोग सौ वर्षों से अधिक समय से असमिया भाषा को अपनाकर और असमिया संस्कृति में घुलमिलकर व्यापक असमिया समाज का हिस्सा बन चुके हैं। मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंचों पर बार-बार दिए गए बयान राजनीतिक बयानबाजी से कहीं आगे बढ़कर अमानवीकरण, सामूहिक कलंक और राज्य प्रायोजित उत्पीड़न की धमकियों के संवैधानिक रूप से निषिद्ध दायरे में प्रवेश करते हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि ये बयान अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, गरिमा सहित), अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), प्रस्तावना में उल्लिखित भाईचारा और संविधान की मूल संरचना का हिस्सा धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन करते हैं। मुख्यमंत्री का यह आचरण अनुच्छेद 164(3) के तहत ली गई शपथ के विपरीत है, जिसमें उन्होंने संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा और बिना भय-प्रेम या द्वेष के कर्तव्य निभाने की शपथ ली है।
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए पत्र में कहा गया है कि अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ और विशाल तिवारी बनाम भारत संघ जैसे मामलों में हेट स्पीच पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस को ऐसे मामलों में स्वत: एफआईआर दर्ज करनी चाहिए और विफलता पर अवमानना का सामना करना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार दोहराया है (एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ आदि मामलों में) कि धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना है।
शिकायत में हाईकोर्ट से गुहार लगाई है कि सक्षम अधिकारियों को हेट स्पीच, कार्यकारी हस्तक्षेप और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ मामला दर्ज करने का निर्देश दे।प्रभावित समुदाय की गरिमा, समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करे, संवैधानिक पदाधिकारियों को उनकी शपथ और संवैधानिक अनुशासन के प्रति बाध्य करे और धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक शासन और कानून के शासन में जनता का विश्वास बनाए रखे।
डॉ. हिरेन गोहैन (प्रसिद्ध विद्वान और लोक बुद्धिजीवी) के नेतृत्व में भेजे पत्र में असम के 43 प्रमुख बुद्धिजीवियों, लेखकों, पूर्व अधिकारियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें पूर्व डीजीपी असम और लेखक हरे कृष्ण डेका, गुवाहाटी के पूर्व आर्कबिशप थॉमस मेनम्परम्पिल, राज्यसभा सांसद अजित कुमार भुयान, पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. दुलाल चंद्र गोस्वामी, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डी. एन. सैकिया और लखी नाथ तमुली, नॉर्थईस्ट नाउ के एडिटर-इन-चीफ परेश मलाकार, पूर्व डिप्टी डायरेक्टर जनरल (एनआईसी) दीपक गोस्वामी, सेवानिवृत्त आईओसीएल के डिप्टी जनरल मैनेजर जयंत बरगोहैन, तथा ओमियो कुमार दास इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल चेंज एंड डेवलपमेंट की पूर्व निदेशक डॉ. इंद्रानी दत्ता जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।
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