
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुस्लिम कानून (मोहम्मडन लॉ) के तहत तलाक के मामलों में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने कहा है कि कोई भी तलाक उसी तारीख से प्रभावी माना जाएगा, जिस दिन पति ने उसे बोला या उच्चारित किया हो। इसके बाद उस तलाक की पुष्टि करने वाला कोर्ट का आदेश या डिक्री प्रकृति में केवल एक 'घोषणा' मात्र होती है।
जस्टिस मदन पाल सिंह ने इस मामले की सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत द्वारा जारी की गई ऐसी कोई भी डिक्री फैसले की तारीख से कोई नया तलाक नहीं बनाती है। इसके बजाय, यह कानूनी आदेश उसी पुरानी तारीख से जुड़ जाता है, जिस दिन पति ने पहली बार तलाक की घोषणा की थी।
यह महत्वपूर्ण फैसला हुमैरा रियाज द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। हुमैरा ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत उनके दूसरे पति से गुजारा भत्ता मांगने की अर्जी को खारिज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार किया गया था। अब इस पूरे मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया गया है, ताकि वह मेरिट के आधार पर पत्नी के गुजारा भत्ता के दावे पर नए सिरे से फैसला कर सके।
अदालती कार्यवाही के दौरान पत्नी की ओर से बताया गया कि उनके पहले पति ने 27 फरवरी 2005 को उन्हें तलाक दे दिया था। इसके बाद इस तलाक को वैध घोषित कराने के लिए एक मुकदमा दायर किया गया। सिविल कोर्ट ने 8 जनवरी 2013 को इस पर अपनी डिक्री पारित की और साल 2005 में दिए गए तलाक को कानूनी रूप से मान्य ठहराया।
पत्नी के वकील ने अदालत को जानकारी दी कि सिविल कोर्ट में मुकदमा लंबित रहने के दौरान और अपनी 'इद्दत' की अवधि पूरी होने के बाद, हुमैरा ने मई 2012 में दूसरी शादी कर ली थी। उनके दूसरे पति को इस पहले तलाक के बारे में पूरी जानकारी थी। वकील के मुताबिक, इसी कारण से यह दूसरी शादी मोहम्मडन लॉ के तहत पूरी तरह वैध थी।
दूसरी शादी के कुछ समय बाद जब दूसरे पति ने हुमैरा की आर्थिक जरूरतें पूरी करने और देखभाल करने से मना कर दिया, तो विवाद खड़ा हो गया। इसके बाद ही महिला ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने दूसरे पति से गुजारे भत्ते की मांग करते हुए कानूनी आवेदन दाखिल किया था।
दूसरी तरफ, दूसरे पति के वकील ने अदालत में यह दलील दी कि याचिकाकर्ता ने अपने पहले पति से वैध तलाक लिए बिना ही दूसरी शादी की है। उनका तर्क था कि चूंकि तलाक की डिक्री साल 2013 में मिली थी, इसलिए 2012 में हुई यह कथित दूसरी शादी मुस्लिम कानून के तहत अमान्य (शून्य) है।
फैमिली कोर्ट ने पहले इसी तर्क को आधार बनाते हुए महिला के गुजारा भत्ता के दावे को खारिज कर दिया था। निचली अदालत का मानना था कि दूसरी शादी के वक्त तक महिला की पहली शादी कानूनी तौर पर भंग नहीं हुई थी। इसके बाद ही न्याय की गुहार लगाते हुए यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था।
अपने 10 मार्च के आदेश में हाईकोर्ट ने स्थिति को पूरी तरह साफ कर दिया। अदालत ने कहा कि जब कोई पति तलाक बोलता है और बाद में डिक्री के लिए कोर्ट जाता है, तो अदालत का आदेश आमतौर पर सिर्फ एक घोषणा होता है, जो पहले ही हो चुके तलाक के स्टेटस की केवल पुष्टि करता है। इसी के साथ अदालत ने दूसरे पति की सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
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