
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि गर्भावस्था किसी भी महिला को सरकारी नौकरी से वंचित करने का आधार नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि एक महिला को मातृत्व और अपनी नौकरी के बीच चयन करने के लिए मजबूर करना उसके प्रजनन और आजीविका के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें एक गर्भवती उम्मीदवार के शारीरिक दक्षता परीक्षा (पीईटी) को टालने के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था। अदालत ने आयोग को उस अभ्यर्थी के लिए नए सिरे से परीक्षा आयोजित करने का सख्त निर्देश दिया है, जो परीक्षा के निर्धारित समय पर नौ महीने की गर्भवती थी।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश कोमल जायसवाल नामक अभ्यर्थी की विशेष अपील को स्वीकार करते हुए पारित किया। कोमल साल 2023 की वन रक्षक और वन्यजीव रक्षक भर्ती प्रक्रिया की उम्मीदवार हैं।
पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि राज्य और आयोग द्वारा गर्भावस्था के कारण पीईटी टालने से इनकार करना अनिवार्य रूप से एक महिला को या तो बच्चा पैदा करने या रोजगार चुनने के लिए विवश करता है। कोर्ट के अनुसार ऐसी स्थिति को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह रवैया महिला के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है। अधिकारियों को इस तरह की असाधारण परिस्थितियों के प्रति अधिक मानवीय और संवेदनशील होना चाहिए था।
इस मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, कोमल जायसवाल ने लिखित परीक्षा पास कर ली थी और उन्हें फरवरी 2026 में 14 किलोमीटर पैदल चलने की परीक्षा (पीईटी) में शामिल होना था। उस समय बच्चे के जन्म की संभावना को देखते हुए उन्होंने डिलीवरी के बाद टेस्ट देने की मोहलत मांगी थी। हालांकि, आयोग ने नियमों में इस तरह की छूट का कोई स्पष्ट प्रावधान न होने का हवाला देते हुए उनका अनुरोध ठुकरा दिया था। इसके बाद एक एकल न्यायाधीश ने भी उनकी रिट याचिका को खारिज कर दिया था।
इस फैसले को पलटते हुए खंडपीठ ने माना कि किसी भी महिला की वैवाहिक स्थिति या गर्भावस्था को सार्वजनिक रोजगार के लिए अयोग्यता नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि भले ही भर्ती नियमों में परीक्षा टालने का कोई सीधा प्रावधान नहीं था, लेकिन उनमें इसकी मनाही भी नहीं थी। ऐसे में आयोग को एक मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर मामले को सुलझाना चाहिए था।
अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि भर्ती के विज्ञापन और लिखित परीक्षा के बीच दो साल से अधिक का लंबा समय बीत चुका था। कोर्ट ने कहा कि इस लंबी अवधि के दौरान विवाह और गर्भावस्था जीवन की बेहद स्वाभाविक घटनाएं हैं। इन प्राकृतिक बदलावों के लिए किसी महिला को दंडित करना समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।
अपने अंतिम फैसले में पीठ ने यूपीएसएसएससी को चार सप्ताह के भीतर जायसवाल का पीईटी आयोजित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि वह पीईटी, मेडिकल परीक्षा और मेरिट सूची में सफल साबित होती हैं, तो उन्हें उस तारीख से सभी परिणामी लाभों के साथ नियुक्त किया जाए जिस दिन उनसे कम रैंक वाले किसी अन्य उम्मीदवार की नियुक्ति हुई थी। इसके साथ ही, अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जब तक यह पूरी प्रक्रिया संपन्न नहीं हो जाती, तब तक ओबीसी महिला श्रेणी में एक पद अनिवार्य रूप से खाली रखा जाए।
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