मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र मामले में 10 अगस्त तक हाईकोर्ट में दायर होगी याचिका, जानिए क्या है मामला?

राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति की क्लीन चिट को देंगे चुनौती, 1950 के अनुसूचित जाति आदेश, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और जांच प्रक्रिया की अनदेखी का लगाया आरोप; 10 अगस्त से पहले जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी।
मंत्री प्रतिमा बागरी पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र से विधायक बनने का आरोप
मंत्री प्रतिमा बागरी पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र से विधायक बनने का आरोप
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भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (एससी) जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहा विवाद अब एक नए कानूनी चरण में प्रवेश करने जा रहा है। राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति द्वारा प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को वैध ठहराते हुए उन्हें क्लीन चिट दिए जाने के बाद शिकायतकर्ता एवं मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने इस फैसले को जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि समिति का आदेश संवैधानिक प्रावधानों, ऐतिहासिक तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुरूप नहीं है। अहिरवार के मुताबिक हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने की पूरी तैयारी पूरी कर ली गई है और 10 अगस्त से पहले याचिका दायर कर दी जाएगी। उनका दावा है कि इस मामले में सभी आवश्यक दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और कानूनी आधार तैयार कर लिए गए हैं, जिन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

प्रदीप अहिरवार का कहना है कि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने जांच के दौरान उनके द्वारा प्रस्तुत कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों और संवैधानिक तथ्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरी जांच प्रक्रिया के दौरान सरकार ने अपने मंत्री को बचाने की कोशिश की और जांच को प्रभावित किया गया। उनके अनुसार समिति ने ऐसा आदेश पारित किया जो संविधान की मूल भावना और अनुसूचित जातियों से जुड़े कानूनी प्रावधानों के विपरीत है। अहिरवार का कहना है कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और वे उम्मीद करते हैं कि हाईकोर्ट तथ्यों, कानून और संविधान के आधार पर इस पूरे मामले की निष्पक्ष सुनवाई करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक भी ले जाएंगे।

कांग्रेस नेता ने अपने आरोपों के समर्थन में एक बार फिर संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 का हवाला दिया। उनका कहना है कि अनुसूचित जाति की पहचान और पात्रता का मूल आधार यही संवैधानिक आदेश है। उनके अनुसार प्रतिमा बागरी का परिवार जिस क्षेत्र से संबंधित रहा है, वहां वर्ष 1950 में बागरी समुदाय अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं था। उनका आरोप है कि समिति ने इस मूल संवैधानिक प्रश्न पर स्पष्ट और संतोषजनक विचार नहीं किया। इसके अलावा उन्होंने वर्ष 1961 और 1971 की जनगणना के रिकॉर्ड, ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) की वर्ष 1998-99 की मानवशास्त्रीय अध्ययन रिपोर्ट तथा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इन साक्ष्यों को निर्णय का आधार बनाया जाना चाहिए था, लेकिन समिति ने इन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

अहिरवार का कहना है कि यह विवाद केवल एक मंत्री के जाति प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि अनुसूचित जाति वर्ग के संवैधानिक अधिकारों, आरक्षण व्यवस्था और सामाजिक न्याय से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला है। उन्होंने कहा कि यदि कोई ऐसा व्यक्ति, जो ऐतिहासिक और संवैधानिक रूप से अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आता, केवल जाति नाम की समानता के आधार पर अनुसूचित जाति का लाभ प्राप्त करता है, तो इसका सीधा नुकसान उन लोगों को होता है जो वास्तव में इस वर्ग के अधिकारों के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि संविधान ने अनुसूचित जाति वर्ग को जो संरक्षण और आरक्षण प्रदान किया है, उसका लाभ केवल वास्तविक पात्र लोगों तक ही सीमित रहना चाहिए। इसी उद्देश्य से वे इस मामले को अदालत तक ले जा रहे हैं और इसे अनुसूचित जाति समाज के अधिकारों की लड़ाई मानते हैं।

गौरतलब है कि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने विस्तृत जांच और दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को वैध माना था और उन्हें क्लीन चिट दे दी थी। समिति के इस फैसले के बाद विवाद खत्म होने के बजाय और गहरा गया है। जहां एक ओर सरकार और समिति के निर्णय को अंतिम मानने की बात कही जा रही है, वहीं शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार इस फैसले को कानूनी कसौटी पर परखने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रहे हैं। अब इस मामले में आगे की दिशा जबलपुर हाईकोर्ट में दायर होने वाली याचिका, न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों और आगामी सुनवाई पर निर्भर करेगी। फिलहाल यह मामला राजनीतिक बहस से आगे बढ़कर न्यायिक परीक्षण के चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है।

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