
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक विवाहित महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपने नाबालिग बेटे का डीएनए (DNA) टेस्ट कराने की मांग की थी। महिला यह टेस्ट इसलिए कराना चाहती थी ताकि वह उस व्यक्ति से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) का दावा कर सके, जिसके साथ उसके कथित तौर पर प्रेम संबंध थे।
इस मामले में महिला के पति ने एक डीएनए टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर उससे दूरी बना ली थी और तलाक की अर्जी दाखिल कर दी थी। दरअसल, उस रिपोर्ट में यह सामने आया था कि पति उस बच्चे का जैविक पिता (बायोलॉजिकल फादर) नहीं है।
जस्टिस नंद प्रभा शुक्ला की सिंगल बेंच ने 4 मई को पारित अपने आदेश में इस स्थिति को स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि यह एक स्वीकार्य तथ्य है कि बच्चे का जन्म दंपति की वैध शादी के दौरान ही हुआ था। डीएनए टेस्ट रिपोर्ट मिलने और तलाक की याचिका दायर होने तक पति-पत्नी दोनों एक साथ ही रह रहे थे।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि शादी के दौरान दोनों की एक-दूसरे तक पहुंच थी। ऐसे में अगर यह मान भी लिया जाए कि पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति के साथ विवाहेतर संबंध थे, तो भी केवल यह तथ्य बच्चे की वैधता (लेजिटिमेसी) को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
फैसले में कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि पति और दूसरे व्यक्ति, दोनों की महिला तक एक ही समय में पहुंच थी। ऐसे में वैधानिक प्रावधानों के तहत बच्चे को महिला के पति का ही बेटा माना जाएगा।
इसके साथ ही पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया आदेश का भी हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, कानून हमेशा बच्चे की वैधता का पक्ष लेता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 महज संदेह या निराधार आरोपों के आधार पर बच्चों को अवैध घोषित करने के खिलाफ एक मजबूत ढाल की तरह काम करती है।
महिला ने आगरा की फैमिली कोर्ट के अपर प्रधान न्यायाधीश द्वारा 19 जनवरी को दिए गए आदेश को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। आगरा की अदालत ने डीएनए टेस्ट के जरिए बेटे की पैटरनिटी तय करने की उसकी अर्जी पहले ही खारिज कर दी थी।
फैमिली कोर्ट का कहना था कि महिला और उस दूसरे व्यक्ति के बीच लिव-इन रिलेशनशिप का कोई ठोस सबूत या सामग्री उपलब्ध नहीं है। इसी फैसले को चुनौती देते हुए महिला ने उच्च न्यायालय का रुख किया था।
अदालत के आदेश के अनुसार, इस पूरे विवाद से जुड़े तथ्य बताते हैं कि महिला की शादी साल 2012 में हुई थी और इस विवाह से दो बेटे हुए। इसके बाद साल 2018-19 में पत्नी कथित तौर पर दूसरे व्यक्ति के संपर्क में आई और दोनों के बीच विवाहेतर संबंध बन गए।
महिला ने 12 जुलाई 2020 को एक बेटे को जन्म दिया। जब पति को संदेह हुआ, तो उसने अपना और नवजात बच्चे का पैटरनिटी टेस्ट कराया। 28 जुलाई 2020 को आई रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि वह जैविक पिता नहीं है। इसके बाद पति ने 24 अगस्त को तलाक की याचिका दायर कर दी।
हाईकोर्ट की बेंच ने अपने आदेश में इस बात पर गौर किया कि महिला कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। अपनी वैध शादी के दौरान ही उसने दूसरे व्यक्ति के साथ संबंध बनाए, जिससे यह बच्चा पैदा हुआ। अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध शादी के दौरान बच्चे का जन्म उसकी वैधता का सबसे ठोस और अकाट्य प्रमाण है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए बेंच ने बताया कि अगर गर्भधारण के समय पति-पत्नी साथ रह रहे थे और बाद में डीएनए टेस्ट बताता है कि बच्चा पति का नहीं है, तब भी कानून में बच्चे की वैधता का अनुमान खंडित नहीं होता। ऐसी स्थिति में पत्नी की ओर से व्यभिचार तो साबित हो सकता है, लेकिन बच्चे की वैधता कानूनी रूप से बनी रहेगी।
कानून के अनुसार इसे केवल तभी गलत साबित किया जा सकता है, जब यह सिद्ध हो कि गर्भधारण के समय पति की पत्नी तक पहुंच बिल्कुल नहीं थी। सिर्फ एक डीएनए टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर इस कानूनी अनुमान को नहीं तोड़ा जा सकता।
जस्टिस शुक्ला ने आगे कहा कि शीर्ष अदालत ने यह भी तय किया है कि पितृत्व से जुड़े मामलों में अदालतों को नियमित या सामान्य तरीके से डीएनए टेस्ट का आदेश नहीं देना चाहिए। किसी को जबरन डीएनए टेस्ट से गुजरने के लिए मजबूर करना उसकी निजता पर हमला है। विशेष रूप से जब मामला बेवफाई का हो, तो ऐसी जांच किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और समाज में उसके सम्मान को गहरी ठेस पहुंचा सकती है।
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