
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि सांसद, न्यायाधीश और मंत्री जैसे संवैधानिक पदाधिकारी अपने नाम के आगे 'माननीय' सम्मान सूचक शब्द लगाने के हकदार हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि कोई भी सिविल सेवक, चाहे उसका पद कुछ भी हो, इस विशिष्ट सम्मान सूचक शब्द का उपयोग नहीं कर सकता है।
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने 30 अप्रैल को अपने आदेश में कहा कि संप्रभु कार्यों का निर्वहन करने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को उनसे जुड़े हर पत्राचार में 'माननीय' कहकर संबोधित किया जाना अनिवार्य है।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि 'माननीय' शब्द का प्रयोग केवल उन संवैधानिक पदाधिकारियों के नामों के साथ किया जाना चाहिए, जो सरकार के तीनों अंगों में से किसी के भी संप्रभु कार्यों का पालन करते हैं।
पीठ ने बताया कि केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज, लोकसभा व राज्यसभा के स्पीकर और चेयरमैन, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष, संसद सदस्य (सांसद) और राज्य विधानसभाओं के सदस्य (विधायक) इस सम्मान सूचक शब्द के उपयोग के अधिकारी हैं।
अदालत ने यह भी जोड़ा कि प्रोटोकॉल के अनुसार अन्य समान पदाधिकारी भी हो सकते हैं जिन्हें यह अधिकार प्राप्त है। ऐसे में जो भी इस सम्मान का हकदार है, उसे इसी तरह संबोधित किया जाना चाहिए।
इससे पहले, आरोपी हर्षित शर्मा द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, हाईकोर्ट ने 31 मार्च को यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी आपत्ति जताई थी। पुलिस ने दर्ज एफआईआर में सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के नाम के आगे 'माननीय' नहीं लगाया था।
इस चूक पर सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) से स्पष्टीकरण मांगा था। हाईकोर्ट के इस आदेश के जवाब में 30 अप्रैल को एक हलफनामे के जरिए अदालत को पूरी स्थिति से अवगत कराया गया।
हलफनामे में बताया गया कि प्रथम सूचनाकर्ता खजान सिंह ने हिंदी में टाइप की गई एक शिकायत दी थी। इस शिकायत में श्री अनुराग ठाकुर को 'माननीय' नहीं कहा गया था और चेक एफआईआर के कॉलम 12 में उसी शिकायत को बिना किसी बदलाव के शब्दशः उतार दिया गया था।
सूचनाकर्ता का दावा था कि वह सांसदों या पूर्व केंद्रीय मंत्रियों के लिए सम्मान सूचक शब्दों के उपयोग से जुड़े प्रोटोकॉल से पूरी तरह अनजान था। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि एक मौजूदा सांसद होने के नाते, अनुराग ठाकुर पूरी सख्ती के साथ इस सम्मान के हकदार थे।
अंततः राज्य सरकार और प्रतिवादी के वकील द्वारा दाखिल किए गए जवाबों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने इस विवाद को समाप्त कर दिया।
गौरतलब है कि यह पूरा मामला आपराधिक धमकी और आपराधिक विश्वासघात के अपराधों को रद्द करने की याचिका से जुड़ा हुआ था। इस मामले की एफआईआर में पूर्व केंद्रीय मंत्री का नाम तो शामिल था, लेकिन उन्हें इसमें आरोपी नहीं बनाया गया था।
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