भरण-पोषण मामले में फरार पति की पेशी के लिए 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला: भरण-पोषण (मेंटेनेंस) मामले में वारंट से बच रहे पति को पकड़ने के लिए 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, यह अधिकार फैमिली कोर्ट का है।
Allahabad High Court
इलाहाबाद हाई कोर्ट
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उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण (मेंटेनेंस) मामले में वारंट से बच रहे पति की अदालत में पेशी के लिए 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (हेबियस कॉर्पस) याचिका को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने संगीता यादव की तरफ से दायर याचिका को खारिज करते हुए यह महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में फरार पति की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए उचित और सख्त कानूनी कदम उठाने का अधिकार संबंधित पारिवारिक अदालत (फैमिली कोर्ट) के पास है।

याचिकाकर्ता महिला ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए प्रशासन को अपने पति का पता लगाने, उसे गिरफ्तार करने और अदालत में पेश करने का निर्देश देने की मांग की थी। उसका पति भरण-पोषण निष्पादन मामले में जारी हुए वारंट से कथित तौर पर लगातार बच रहा था।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, जनवरी 2021 में आजमगढ़ की पारिवारिक अदालत ने पति को अपनी पत्नी और बेटी को भरण-पोषण भत्ता देने का सख्त निर्देश दिया था। हालांकि, उस व्यक्ति ने कोर्ट के इस आदेश का पालन नहीं किया और तभी से वह लापता है।

महिला ने अपनी याचिका में बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करने की गुहार लगाई थी। उसने मांग की थी कि अधिकारियों को उसके पति को हाई कोर्ट या आजमगढ़ फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया जाए।

याचिकाकर्ता ने बकाया भरण-पोषण की वसूली सुनिश्चित करने के लिए अपने पति की कस्टडी पारिवारिक अदालत को सौंपने का भी अनुरोध किया था।

अपनी दलीलों को मजबूत करने के लिए महिला ने मद्रास हाई कोर्ट के 'एमपी नागलक्ष्मी बनाम पुलिस उपायुक्त' मामले के फैसले का हवाला दिया था।

हालांकि, पीठ ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि मद्रास हाई कोर्ट के उस मामले में याचिकाकर्ता के ससुर द्वारा बंदी को अवैध हिरासत में रखने का बिंदु शामिल था। उस विशेष परिस्थिति में अदालत का वह निर्देश पूरी तरह से उचित था।

हाई कोर्ट ने 25 मार्च को जारी अपने अंतिम आदेश में यह स्थापित किया कि सिर्फ इस आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी नहीं की जा सकती कि कोई पति पारिवारिक अदालत द्वारा जारी किए गए वारंट से भाग रहा है। इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने इस याचिका को निरस्त कर दिया।

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