
नई दिल्ली: दिल्ली सरकार ने महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देने के लिए 'सहेली' कार्ड योजना शुरू की थी। इस योजना को लॉन्च हुए तीन महीने बीत चुके हैं। मार्च 2025 में सरकार ने पिंक कार्ड के जरिए इस मुफ्त सफर की घोषणा की थी, जिसे 2 मार्च को आधिकारिक तौर पर शुरू किया गया था। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। कई ट्रांसजेंडर निवासियों का कहना है कि वितरण केंद्रों पर उन्हें यह कार्ड देने से साफ इनकार किया जा रहा है।
द हिन्दू की एक हालिया जमीनी पड़ताल के दौरान पांच वितरण केंद्रों का दौरा किया गया और आवेदकों से बातचीत की गई। इस दौरान यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि पात्र लाभार्थियों की सूची में शामिल होने के बावजूद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को कार्ड नहीं मिल पा रहे हैं। पांच में से चार केंद्रों पर अधिकारियों ने साफ कह दिया कि यह कार्ड ट्रांसजेंडर्स के लिए नहीं है।
हैरानी की बात यह है कि कार्ड पर स्पष्ट रूप से "महिला/ट्रांसजेंडर" लिखा हुआ है। केवल एक केंद्र पर अधिकारियों को जब कार्ड पर लिखी यह बात दिखाई गई, तब जाकर वे इसे जारी करने के लिए राजी हुए।
एक गैर-सरकारी संगठन के साथ काम करने वाली 23 वर्षीय विशाखा ने अपना कड़वा अनुभव साझा किया। उन्होंने पिछले महीने तुगलकाबाद के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट कार्यालय में केंद्र सरकार द्वारा जारी अपने ट्रांसजेंडर पहचान पत्र के जरिए पिंक कार्ड के लिए आवेदन किया था।
विशाखा ने बताया कि उनके आधार कार्ड में जेंडर 'ट्रांसजेंडर' दर्ज है और वह खुद को एक ट्रांस महिला मानती हैं। इसके बावजूद अधिकारियों ने उनका आधार कार्ड पांच अलग-अलग लोगों को दिखाया, लेकिन पिंक कार्ड जारी करने से मना कर दिया। इसके बजाय उन्हें पुरुषों के लिए बना रिचार्जेबल ब्लू कार्ड थमा दिया गया, जिसमें मुफ्त यात्रा की कोई सुविधा नहीं मिलती है।
एक तरफ वितरण केंद्रों पर बैठे अधिकारी ट्रांसजेंडर्स को इस योजना का हिस्सा मानने से ही इनकार कर रहे हैं, वहीं दिल्ली परिवहन निगम (DTC) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि वे पूरी तरह से इस योजना के दायरे में आते हैं। अधिकारी के मुताबिक सभी महिलाएं और ट्रांसजेंडर इन कार्डों के लिए पात्र हैं और किसी को भी इसे देने से मना नहीं किया जा सकता।
इन सरकारी आश्वासनों के बीच ट्रांसजेंडर्स की परेशानियां जस की तस बनी हुई हैं। 35 वर्षीय कैटरर बॉबी ने बताया कि जब वे महरौली के जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय गए, तो उन्हें ब्लू कार्ड की कतार में खड़ा कर दिया गया और कहा गया कि यह योजना सिर्फ महिलाओं के लिए है।
बॉबी का मानना है कि पहले मिलने वाले पिंक टिकट की व्यवस्था ज्यादा आसान थी, जिसे कंडक्टर तुरंत दे देते थे या कई बार खुद ही आगे बढ़कर पेश कर देते थे। हालांकि, परिवहन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि पिंक टिकट प्रणाली को धीरे-धीरे खत्म कर दिया जाएगा। सरकार ने मार्च में इस पुरानी व्यवस्था को तीन और महीनों के लिए बढ़ा दिया था।
आईटीओ स्थित डीटीसी बस पास काउंटर के कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा स्पष्ट निर्देश मिले हैं कि वे ट्रांसजेंडर्स को कार्ड जारी न करें। एक कर्मचारी ने दावा किया कि योजना शुरू होने के कुछ हफ्तों बाद ही यह प्रावधान वापस ले लिया गया था।
वहीं, शादीपुर बस डिपो के एक अधिकारी ने बताया कि कर्मचारियों को मिले दिशा-निर्देशों में ट्रांसजेंडर्स को कभी पात्र लाभार्थी के रूप में बताया ही नहीं गया। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि उनका बैकएंड सिस्टम केवल उन्हीं आधार कार्ड को स्वीकार करता है, जिनमें जेंडर 'महिला' दर्ज होता है।
दक्षिण-पूर्व दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से पिंक कार्ड प्राप्त करने वाली सुरपिया (बदला हुआ नाम) को भी सफर के दौरान दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उनका कार्ड इसलिए बन गया था क्योंकि उनके आधार में जेंडर 'महिला' लिखा था। सुरपिया ने बताया कि जब भी वह बस की मशीन पर अपना कार्ड टैप करती हैं, तो सिस्टम इसकी वैधता सत्यापित करने के लिए कहता है।
दूसरी ओर, नेहरू प्लेस डीटीसी डिपो में एक अधिकारी ने कार्ड के पीछे छपे 'महिला/ट्रांसजेंडर' शब्द देखने के बाद यह माना कि वे इसके पात्र हैं। अधिकारी ने कहा कि अगर वे अपने आधार के साथ आएंगे तो उन्हें कार्ड जारी किया जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सरकारी अधिकारियों सहित ज्यादातर लोग नियमों और निर्देशों को ठीक से पढ़ते ही नहीं हैं।
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