इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: धर्म बदलने या दूसरी जाति में शादी करने से नहीं बदलती है जन्म से मिली जाति

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के मामले में स्पष्ट किया कानून, कहा- धर्म बदलने पर भी बरकरार रहती है जन्म से मिली पहचान, खारिज की आरोपियों की याचिका।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की जाति का निर्धारण उसके जन्म से होता है और यह स्थिति जीवन भर समान रहती है। अदालत ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल लेता है या अंतरजातीय विवाह (Inter-caste marriage) कर लेता है, तब भी उसकी मूल जाति में कोई बदलाव नहीं आता। यह टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने 10 जनवरी को दिए अपने फैसले में दिनेश और आठ अन्य लोगों द्वारा दायर एक आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला अलीगढ़ का है। दिनेश और आठ अन्य याचिकाकर्ताओं ने अलीगढ़ के एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) के विशेष न्यायाधीश द्वारा जारी एक आदेश को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने उन्हें एससी/एसटी एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया था।

आरोपियों ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि शिकायतकर्ता महिला, जो मूल रूप से पश्चिम बंगाल की निवासी है और जन्म से अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) से ताल्लुक रखती है, अब उस श्रेणी में नहीं आती। उनका तर्क था कि चूंकि महिला ने जाट समुदाय के एक व्यक्ति से शादी कर ली है, इसलिए उसकी मूल जाति समाप्त हो गई है और अब वह अपने पति की जाति (जाट) से जानी जाएगी। इस आधार पर उन्होंने दावा किया कि उन पर एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला नहीं बनता।

हाईकोर्ट ने खारिज की दलील

जस्टिस अनिल कुमार-X ने इस दलील को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया कि जाट समुदाय में शादी करने से महिला ने अपनी जाति खो दी है। अदालत ने टिप्पणी की, "भले ही कोई व्यक्ति अपना धर्म बदल ले, लेकिन धर्म परिवर्तन के बावजूद उसकी जाति वही रहती है। शादी किसी व्यक्ति की जाति को नहीं बदलती। इसलिए, याचिकाकर्ताओं का यह तर्क स्वीकार्य नहीं है।"

मारपीट और जातिसूचक शब्दों का आरोप

पीड़ित महिला ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। उसका आरोप था कि आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की, गालियां दीं और झगड़े के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। शिकायत में यह भी बताया गया कि इस घटना में महिला समेत तीन लोग घायल हुए थे।

आरोपियों ने यह भी तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने उन्हें झूठा फंसाया है क्योंकि उन्होंने (आरोपियों ने) पहले ही महिला और उसके परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। इसे उन्होंने 'काउंटर-ब्लास्ट' यानी बदले की भावना से की गई कार्रवाई बताया।

सबूतों के आधार पर फैसला

सरकारी वकील ने आरोपियों की दलील का विरोध करते हुए कहा कि शिकायत और एफआईआर में वर्णित घटनाएं एक ही तारीख की हैं, इसलिए इसे महज एक जवाबी कार्रवाई कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों के साथ-साथ चोट की रिपोर्ट (Injury reports) पर विचार करने के बाद ही आरोपियों को तलब किया था। अदालत ने यह भी साफ किया कि केवल 'क्रॉस-केस' (Cross-case) का होना किसी विरोधी पक्ष द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता।

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