इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्जी मार्कशीट से वकील बने आशीष शुक्ला की जमानत याचिका की खारिज, कहा- यह न्याय व्यवस्था के साथ गंभीर धोखा है

इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी- 'वकालत का पेशा ईमानदारी और अखंडता पर टिका है, फर्जीवाड़े पर उदारता नहीं दिखाई जा सकती'
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्याय प्रणाली की पवित्रता बनाए रखने के लिए एक अहम फैसला सुनाते हुए, उस वकील की जमानत याचिका खारिज कर दी है जिस पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे वकालत का लाइसेंस हासिल करने का आरोप है। कोर्ट ने इस मामले को न्याय व्यवस्था के साथ किया गया एक 'गंभीर धोखा' करार दिया है। आरोपी पर अपनी 12वीं कक्षा की मार्कशीट में हेराफेरी कर उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकरण कराने का आरोप है।

'सदाचार ही सर्वोच्च कर्तव्य है'

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने संस्कृत के श्लोक "आचार: परमो धर्म:" का उल्लेख किया, जिसका अर्थ है कि सदाचार या अच्छा आचरण ही सर्वोच्च कर्तव्य है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक अधिवक्ता केवल मुकदमे लड़ने वाला पेशेवर नहीं होता, बल्कि वह न्याय प्रशासन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ (Vital Pillar) है।

न्यायमूर्ति पहल ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा, "कानून के रक्षकों के लिए उनके शब्दों से ज्यादा उनका आचरण महत्व रखता है। कानूनी पेशे की महानता अटूट अखंडता, ईमानदारी और कानून के शासन के प्रति निष्ठा पर टिकी है। इस तरह के मामलों में कोर्ट उदारता नहीं दिखा सकता, क्योंकि गलत जगह दिखाई गई सहानुभूति कानूनी पेशे की विश्वसनीयता और पवित्रता से समझौता करने जैसा होगी।"

फर्जी दस्तावेजों से पाई लॉ डिग्री और रजिस्ट्रेशन

कोर्ट ने अपनी सख्त टिप्पणी में कहा कि आरोपी ने न केवल फर्जी और मनगढ़ंत शैक्षिक दस्तावेजों के जरिए स्नातक और कानून (Law) की डिग्रियां हासिल कीं, बल्कि एक अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण भी प्राप्त कर लिया। 6 जनवरी को दिए गए अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी और जालसाजी के ये आरोप बेहद गंभीर हैं, जो कानूनी पेशे की जड़ों पर प्रहार करते हैं और न्याय प्रशासन में जनता के विश्वास को कम करते हैं।

क्या है पूरा मामला?

आरोपी आशीष शुक्ला, जो उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकृत अधिवक्ता था, ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 471 (फर्जी दस्तावेज का असली के रूप में उपयोग) के तहत दर्ज मामले में जमानत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

शुक्ला के खिलाफ एफआईआर एक अन्य अधिवक्ता द्वारा कानपुर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को की गई शिकायत के बाद दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि शुक्ला ने पंजीकरण पाने के लिए अपने शैक्षिक प्रमाण पत्रों में फर्जीवाड़ा किया है। इस शिकायत को पुलिस आयुक्त के पास भेजा गया, जिसके बाद मुकदमा दर्ज हुआ।

'दीमक खा गई मार्कशीट' - कोर्ट ने नहीं मानी दलील

आरोपी आशीष शुक्ला का दावा था कि उसने 1994 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की थी, लेकिन यूपी बोर्ड के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि वह फेल हो गया था। जांच अधिकारी (IO) द्वारा बार-बार नोटिस दिए जाने के बावजूद, वह अपनी 12वीं की मार्कशीट पेश नहीं कर सका। उसने अजीबोगरीब दलील दी कि उसका प्रमाण पत्र 'दीमक' द्वारा नष्ट कर दिया गया है।

कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि 'दीमक द्वारा चुनिंदा रूप से केवल 12वीं का सर्टिफिकेट नष्ट करना' गले नहीं उतरता, और यह दावा बोर्ड के अधिकारियों की रिपोर्ट से भी गलत साबित होता है, जिसमें स्पष्ट है कि आवेदक परीक्षा में फेल था।

नैनीताल में छुट्टियों के दौरान हुई थी गिरफ्तारी

कानपुर के सत्र न्यायाधीश ने पिछले साल नवंबर में आशीष शुक्ला की अग्रिम जमानत रद्द कर दी थी, क्योंकि वह जांच अधिकारी के सामने अपने पूरे शैक्षिक दस्तावेज पेश करने की शर्तों का पालन करने में विफल रहा था। इसके बाद, पिछले साल दिसंबर में पुलिस ने उसे नैनीताल से गिरफ्तार किया, जहां वह छुट्टियां मना रहा था।

बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि बार एसोसिएशन के अध्यक्ष को शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नहीं है, क्योंकि दस्तावेजों की जांच केवल उत्तर प्रदेश बार काउंसिल कर सकती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता ने निजी रंजिश के चलते ऐसा किया है। वहीं, राज्य के वकील ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वकालत करना निर्दोष और असहाय वादियों के जीवन और स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।

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