
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज के लॉ विभाग के प्रमुख (HOD) के खिलाफ जातिगत भेदभाव और अपमान के आरोपों की एक स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं। दो छात्रों ने विभाग प्रमुख पर यह गंभीर आरोप लगाया है।
हाईकोर्ट के निर्देशानुसार, आरोपी एचओडी (जो बॉयज हॉस्टल के वार्डन भी हैं) को जांच पूरी होने तक सभी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से तत्काल प्रभाव से मुक्त कर दिया गया है। अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए यह सख्त कदम उठाया है।
जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता छात्रों के मूल्यांकन, अनुशासनात्मक या हॉस्टल से जुड़े किसी भी मामले में आरोपी प्रोफेसर की अब कोई भूमिका नहीं होगी। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया है कि फिलहाल आरोपों की सत्यता को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।
मामले की निष्पक्ष जांच के लिए कोर्ट ने दो न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया है। प्रयागराज जिला अदालत के स्मॉल कॉज कोर्ट की जज अर्चना सिंह-प्रथम और प्रयागराज के विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को इस पूरे प्रकरण की जांच कर रिपोर्ट सौंपने की जिम्मेदारी दी गई है।
यह जांच समिति मुख्य रूप से यह पता लगाएगी कि क्या एससी-एसटी समुदाय के छात्रों के साथ एचओडी या विश्वविद्यालय के किसी अन्य कर्मचारी ने जातिगत भेदभाव किया है। इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन ने लागू नियमों के तहत इन शिकायतों का उचित समाधान किया था।
न्यायालय ने कुलपति (VC) को एक स्वतंत्र समिति गठित करने का भी निर्देश दिया है। यह समिति पांचवें सेमेस्टर के उस छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन करेगी, जिसकी कॉपियां आरोपी एचओडी द्वारा जांची गई थीं। छात्र द्वारा बताए गए अन्य विषयों की कॉपियां भी दोबारा जांची जाएंगी।
यह याचिका पीएचडी रिसर्च स्कॉलर शुभेंदु आनंद और पांचवें सेमेस्टर के एक बीए एलएलबी (ऑनर्स) छात्र द्वारा दायर की गई है, जो विश्वविद्यालय के बॉयज हॉस्टल में रहते हैं। उनका आरोप है कि एचओडी ने अपने शैक्षणिक और प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल जातिगत अपमान और बदला लेने के लिए एक हथियार के रूप में किया है।
पांचवें सेमेस्टर के छात्र ने 20 अगस्त को कुलपति से इस मामले की लिखित शिकायत की थी। छात्र का आरोप है कि बार-बार याद दिलाने और कई शिकायतों के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसकी शिकायत पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
शिकायत में छात्र ने बताया कि उसने 'कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ-II' विषय में सबसे अधिक अंक हासिल किए थे, जो एक गोल्ड मेडल विषय था। छात्र के अनुसार, चौथे सेमेस्टर की शुरुआत में एचओडी ने उस पर तंज कसते हुए कहा था, "जो कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ में हाइएस्ट लेकर आया है, अब मेरे में लेकर आए।"
छात्र का दावा है कि उसकी उत्तर पुस्तिकाओं की बेहद सख्ती से जांच की गई और इसका मुख्य कारण उसकी जाति थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित शिक्षक ने सार्वजनिक रूप से जाति और आरक्षण को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां की थीं।
हाईकोर्ट ने 16 सितंबर को पारित अपने आदेश में कहा कि मामले में छठे प्रतिवादी (एचओडी) को जांच पूरी होने तक प्रशासनिक जिम्मेदारियों से दूर रखा जाए।
अदालत ने कुलपति से यह भी जवाब मांगा है कि क्या यूजीसी नियमों के तहत विश्वविद्यालय में 'समान अवसर प्रकोष्ठ' (Equal Opportunity Cell) और एससी/एसटी छात्रों की शिकायतों के निवारण के लिए कोई विशेष समिति बनाई गई है। कोर्ट ने इनकी संरचना और छात्र की शिकायत पर की गई कार्रवाई की पूरी जानकारी मांगी है। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को तय की गई है।
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