इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: रेप पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाना 'कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग', आरोपी के वकील को लगाई फटकार

जस्टिस अनिल कुमार की बेंच ने कहा- महिला को 'आसान चरित्र' वाली बताना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन, रेप केस में वकील की दलीलों पर कोर्ट नाराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह एक रेप केस की सुनवाई के दौरान बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने रेप पीड़िता के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने और उसके चरित्र पर कीचड़ उछालने को लेकर अपीलकर्ता (आरोपी) के वकील को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला के खिलाफ ऐसे आरोप लगाना न केवल कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि यह उसके संवैधानिक अधिकारों का भी हनन है।

29 जनवरी को दिए गए अपने फैसले में, जस्टिस अनिल कुमार-X की पीठ ने वकील के आचरण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बार (Bar) के एक सदस्य से ऐसी दलीलों की उम्मीद नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा: महिला के अतीत का इस्तेमाल उसके अधिकार छीनने के लिए नहीं हो सकता

जस्टिस अनिल कुमार-X की पीठ ने अपने फैसले में कहा, "किसी महिला को 'आसान चरित्र' वाली बताना या उसके नैतिक चरित्र पर लांछन लगाना पूरी तरह से अप्रासंगिक है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 53A और धारा 146 के प्रावधानों के तहत इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।"

कोर्ट ने इसे 'चरित्र हनन' (Character Assassination) करार देते हुए कहा कि इस तरह के आरोप भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत महिला के गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। पीठ ने सख्त लहजे में कहा, "यह कानूनन तय है कि किसी महिला के पिछले आचरण या चरित्र का उपयोग उसे बदनाम करने या उसके कानूनी अधिकारों को हराने के लिए नहीं किया जा सकता। इसलिए, दिए गए अपमानजनक बयानों को रिकॉर्ड से हटाया जाना चाहिए और पूरी तरह नजरअंदाज किया जाना चाहिए।"

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक सरकारी अस्पताल के फार्मासिस्ट से जुड़ा है, जिसके खिलाफ मई 2022 में एक दलित महिला ने रेप का केस दर्ज कराया था। महिला का आरोप था कि जब वह इलाज के लिए क्लिनिक गई, तो फार्मासिस्ट ने उसे नशीली दवा देकर उसके साथ दुष्कर्म किया।

पुलिस ने मामले की जांच के बाद भारतीय दंड संहिता (IPC) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। नवंबर 2022 में एक स्थानीय अदालत ने इस चार्जशीट पर संज्ञान लिया था, जिसे चुनौती देने के लिए आरोपी पक्ष ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

वकील ने कोर्ट में क्या दलीलें दीं?

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के वकील ने पीड़िता को 'आदतन ब्लैकमेलर' और 'सदिग्ध चरित्र' वाली महिला बताने की कोशिश की। अपनी बात को सही ठहराने के लिए वकील ने पांच स्थानीय लोगों के शपथ पत्र (Affidavits) प्रस्तुत किए, जिसमें दावा किया गया था कि महिला लोगों को रोककर पैसे मांगती है और झूठे केस में फंसाने की धमकी देती है।

वकील ने अप्रैल 2022 के एक कथित हलफनामे का हवाला देते हुए यह भी कहा कि पीड़िता ने खुद माना था कि उसने गुस्से में आकर एफआईआर (FIR) में घटना को बढ़ा-चढ़ाकर बताया था। इसके अलावा, एफआईआर दर्ज करने में नौ महीने की देरी और घटना की सटीक तारीख व समय का उल्लेख न होने को भी आधार बनाया गया।

वहीं, सरकारी वकील ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता ने पुलिस और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयानों में लगातार अभियोजन पक्ष का समर्थन किया है और चार्जशीट कानूनी सबूतों के आधार पर दाखिल की गई है।

'पेशेवर आचरण में गंभीर चूक'

जस्टिस कुमार ने वकील के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा, "कोर्ट अपीलकर्ता के वकील के इस आचरण की निंदा करता है। महिला के चरित्र और गरिमा पर सवाल उठाने वाले निंदनीय आरोपों वाले शपथ पत्रों पर भरोसा करना एक अनुचित और अस्वीकार्य प्रथा है। ऐसी दलीलें एक वकील को शोभा नहीं देतीं और यह नैतिक वकालत की नींव पर प्रहार करती हैं।"

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि वकील ने बहस के दौरान बार-बार यह कहकर कोर्ट पर दबाव बनाने की कोशिश की कि वे इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। साथ ही, पिछले आदेशों के बारे में भ्रामक बयान दिए गए। कोर्ट ने इसे "पेशेवर आचरण में गंभीर चूक" करार दिया।

फैसला: अपील खारिज, ट्रायल जारी रहेगा

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केस डायरी में मौजूद सामग्री के अलावा बाहरी शपथ पत्रों पर विचार नहीं किया जा सकता।

फैसले में कहा गया, "पीड़िता के बयान शुरू से ही सुसंगत रहे हैं। सीआरपीसी (CrPC) की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज उसके बयानों से आरोपों की पुष्टि होती है। एफआईआर में देरी के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में देरी का मूल्यांकन संज्ञान लेने के चरण पर नहीं, बल्कि ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए।"

कोर्ट ने यह भी माना कि पीड़िता द्वारा कथित तौर पर दायर किया गया हलफनामा पहली नजर में दबाव में तैयार किया गया प्रतीत होता है, इसलिए उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अंततः, हाईकोर्ट ने अपील को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया और स्थानीय अदालत के संज्ञान आदेश को सही ठहराते हुए ट्रायल को कानून के अनुसार आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।

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