नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा की जाने वाली गिरफ्तारियों को लेकर एक अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि जिन अपराधों में सजा का प्रावधान सात साल तक की कैद का है, उनमें पुलिस आरोपी को सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत, पुलिस को गिरफ्तारी से पहले आरोपी को नोटिस देना अनिवार्य होगा।
'गिरफ्तारी मजबूरी होनी चाहिए, सुविधा नहीं'
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि पुलिस अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी करना महज एक वैधानिक विवेक (statutory discretion) है, जो जांच और सबूत जुटाने में मदद करता है। इसे किसी भी हाल में "अनिवार्य" नहीं माना जा सकता।
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "नतीजतन, पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी की प्रक्रिया शुरू करने से पहले खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना वास्तव में आवश्यक है या नहीं?"
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के 1 जुलाई, 2021 के फैसले को चुनौती देने वाली एक अपील से जुड़ा है। 15 जनवरी को दिए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि BNSS, 2023 की धारा 35(3) के तहत आरोपी को नोटिस देना एक 'नियम' (Rule) है। वहीं, धारा 35(6) जिसे धारा 35(1)(b) के साथ पढ़ा जाता है, उसके तहत गिरफ्तारी करना एक स्पष्ट 'अपवाद' (Exception) है।
कानूनी प्रावधानों को समझाते हुए कोर्ट ने बताया कि धारा 35(1)(b) उन परिस्थितियों का जिक्र करती है जिनमें पुलिस सात साल से कम सजा वाले मामलों में बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है। वहीं, धारा 35(6) तब लागू होती है जब कोई व्यक्ति नोटिस की शर्तों का पालन करने में विफल रहता है या अपनी पहचान बताने में आनाकानी करता है।
संविधान के अनुच्छेद 21 का सम्मान जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों को याद करते हुए दोहराया कि BNSS, 2023 की धारा 35(6) की प्रक्रिया भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) की कसौटी पर तैयार की गई है। पुलिस अधिकारियों को इन सुरक्षा उपायों का पालन न केवल लिखित रूप में, बल्कि उनकी मूल भावना (letter and spirit) के साथ करना होगा।
शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि भले ही धारा 35(1)(b) के तहत गिरफ्तारी के लिए स्थितियां मौजूद हों, फिर भी गिरफ्तारी तब तक नहीं की जानी चाहिए जब तक कि यह "बिल्कुल अनिवार्य" (absolutely warranted) न हो। पुलिस अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस शक्ति का प्रयोग करते समय अत्यंत सावधानी और संयम बरतें।
पुराने आधार पर बाद में गिरफ्तारी नहीं
फैसले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू पर भी प्रकाश डाला गया। कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस ने धारा 35(3) के तहत उपस्थिति के लिए नोटिस जारी कर दिया है, तो बाद में गिरफ्तारी करते समय पुलिस उन कारकों या परिस्थितियों का हवाला नहीं दे सकती जो नोटिस जारी करते वक्त पहले से मौजूद थे।
दूसरे शब्दों में, धारा 35(6) के तहत गिरफ्तारी केवल उन "नई सामग्रियों और कारकों" पर आधारित होनी चाहिए जो धारा 35(3) का नोटिस जारी करते समय पुलिस अधिकारी के पास उपलब्ध नहीं थे।
'जांच बिना गिरफ्तारी के भी चल सकती है'
फैसले के अंत में कोर्ट ने विवेचना (Investigation) के महत्व पर जोर देते हुए कहा, "यह कहना पर्याप्त है कि गिरफ्तारी के बिना भी जांच जारी रह सकती है।"
संज्ञेय अपराध (cognizable offence) के बारे में राय बनाते समय और सबूत इकट्ठा करते वक्त, पुलिस अधिकारी को अपनी अंतरात्मा से गिरफ्तारी की आवश्यकता पर सवाल करना चाहिए। यह सुरक्षा उपाय इसलिए दिया गया है क्योंकि कारण दर्ज करने के बाद भी आरोपी को गिरफ्तार करने की शक्ति पुलिस के पास हमेशा मौजूद रहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन प्रावधानों के तहत गिरफ्तारी की शक्ति को "सख्त वस्तुनिष्ठ आवश्यकता" (strict objective necessity) के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि पुलिस अधिकारी की "व्यक्तिगत सुविधा" (subjective convenience) के रूप में।
कोर्ट ने निष्कर्ष में कहा, "इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस अधिकारी केवल पूछताछ करने के लिए किसी को गिरफ्तार कर ले। बल्कि, पुलिस को खुद को संतुष्ट करना होगा कि सात साल तक की सजा वाले अपराध में, संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लिए बिना जांच प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ सकती।"
इसके विपरीत कोई भी व्याख्या BNSS, 2023 की धारा 35(1)(b) और धारा 35(3) से 35(6) के विधायी उद्देश्य को विफल कर देगी।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.