
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) रायबरेली में संकाय सदस्यों की भर्ती में बड़े पैमाने पर धांधली के गंभीर आरोप लगे हैं। संस्थान के जनरल मेडिसिन और डर्मेटोलॉजी विभाग में नियमों को दरकिनार कर की गई नियुक्तियों पर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि प्रबंधन ने आरक्षण के नियमों की खुलेआम अनदेखी की और आवश्यक अनुभव न होने के बावजूद अयोग्य उम्मीदवारों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त कर दिया।
इस विवाद की शुरुआत 22 अगस्त 2024 को जारी हुए 95 पदों के भर्ती विज्ञापन से हुई। जनरल मेडिसिन विभाग में प्रोफेसर पद के लिए 14 साल का शैक्षणिक या शोध अनुभव अनिवार्य था। इस पद के लिए चुने गए उम्मीदवार डॉ. मधुकर मित्तल के पास आवेदन की अंतिम तिथि तक कुल 12 साल 4 महीने का ही अनुभव था। इसमें से भी जनरल मेडिसिन पढ़ाने का अनुभव केवल चार साल तीन महीने था।
इसके बावजूद, पूरी तरह योग्य उम्मीदवार डॉ. जलीश फातिमा को दरकिनार कर डॉ. मित्तल को अंतिम सूची में चुन लिया गया और डॉ. फातिमा को वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. मित्तल की नियुक्ति में अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) को लेकर भी बड़ा खेल हुआ। नियमों के तहत 5 अक्टूबर 2024 तक वर्तमान नियोक्ता से एनओसी देना अनिवार्य था। आवेदन के समय डॉ. मित्तल एम्स भोपाल के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग में प्रोफेसर थे और उन्होंने एनओसी जमा नहीं की थी।
उनका आवेदन रद्द होने के बजाय 28 दिसंबर 2024 को उनका इंटरव्यू करा लिया गया। बाद में 5 लाख रुपए का पेनाल्टी बॉन्ड भरने के बाद 26 मार्च 2025 को एम्स भोपाल ने उन्हें एनओसी जारी की। इससे पहले केजीएमयू लखनऊ में भी डॉ. मित्तल के एक अवैध प्रमोशन को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) रद्द कर चुकी थी।
नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी का सिलसिला यहीं नहीं रुका। इंटरव्यू लेने वाली चयन समिति की अध्यक्षता भी एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दी गई जो पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। डॉ. पद्मा श्रीवास्तव ने एम्स नई दिल्ली से 16 अक्टूबर 2023 में ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली थी, जबकि नियमानुसार समिति का अध्यक्ष किसी कार्यरत अधिकारी को ही होना चाहिए था।
डर्मेटोलॉजी विभाग में आरक्षण नियमों के सीधे उल्लंघन का मामला सामने आया है। यहां असिस्टेंट प्रोफेसर का एक पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित था। 16 दिसंबर 2024 की शुरुआती सूची में सामान्य वर्ग की डॉ. अंजलि अग्रवाल को इस पद के लिए अयोग्य माना गया था, जबकि ओबीसी वर्ग के डॉ. विकास सिंह अस्थाई रूप से योग्य थे। इसके विपरीत, 24 दिसंबर 2024 को जारी हुई अंतिम सूची में डॉ. अंजलि को न केवल योग्य ठहराया गया, बल्कि 28 जनवरी 2025 के परिणाम में उन्हें इस आरक्षित पद पर नियुक्ति भी दे दी गई।
इन तमाम गड़बड़ियों को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता संजय मिश्र ने 14 जनवरी 2026 को स्वास्थ्य मंत्रालय और 18 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में शिकायत दर्ज कराई। संजय मिश्र का आरोप है कि एम्स रायबरेली के डिप्टी डायरेक्टर कर्नल (रिटायर्ड) अखिलेश सिंह ने मामले की निष्पक्ष जांच करने के बजाय, पीएमओ के शिकायत पोर्टल पर जांच भटकाने के लिए डॉ. मित्तल के दस्तावेजों की जगह डॉ. फातिमा के दस्तावेज अपलोड कर दिए। अब इस पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग की जा रही है।
दूसरी ओर, एम्स रायबरेली की कार्यकारी निदेशक डॉ. अमिता जैन ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि सभी नियुक्तियां पूरी तरह से नियमों के दायरे में रहकर की गई हैं। ओबीसी सीट पर सामान्य वर्ग की नियुक्ति के बचाव में उन्होंने तर्क दिया कि तत्कालीन नियमों के अनुसार यदि आरक्षित वर्ग का योग्य उम्मीदवार नहीं मिलता है, तो वह सीट सामान्य वर्ग से भरी जा सकती थी (हालांकि अब यह नियम समाप्त हो चुका है)।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आरटीआई के तहत सारी जानकारी दे दी गई है और यदि किसी को नियुक्तियों में धांधली लगती है तो वह न्यायालय जा सकता है। उन्होंने इन आरोपों को संस्थान की छवि धूमिल करने की एक कोशिश करार दिया है।
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