MP: अपहरण मामले में HC की सख्ती के बाद हरकत में आई पुलिस, दलित लड़की को 6 अप्रैल तक पेश करने का आदेश, जानिए क्या है मामला?

FIR में नाम हटाने, कार्रवाई में देरी और परिजनों से मारपीट पर कोर्ट ने जताई नाराजगी, अवकाश के दिन सुनवाई कर पुलिस को लगाई फटकार
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इंदौर.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट इंदौर.इंटरनेट.
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भोपाल। मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के महू स्थित बडगोंदा थाना क्षेत्र में अनुसूचित जाति की 17 वर्षीय नाबालिग किशोरी के अपहरण के मामले में पुलिस की लापरवाही एक बार फिर सामने आई है। 23 फरवरी को हुई इस घटना के बाद पीड़ित परिवार लगातार पुलिस से कार्रवाई की गुहार लगाता रहा, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने न केवल एफआईआर दर्ज करने में टालमटोल की, बल्कि जब मामला दर्ज किया भी गया तो उसमें नामजद आरोपियों के बजाय अज्ञात लोगों को आरोपी बना दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम से आहत पीड़िता के मजदूर पिता को अंततः हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी, जहां बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई।

अवकाश के दिन भी हुई सुनवाई

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट की डबल बेंच ने शनिवार को छुट्टी के बाद भी सुनवाई की। यह अपने आप में दर्शाता है कि अदालत ने इस प्रकरण को कितना संवेदनशील और तात्कालिक माना। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम मांडिल और गौरव गुप्ता ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी उपस्थित हुए। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब परिजन लगातार आरोपियों के नाम बता रहे थे, तब भी एफआईआर में उन्हें शामिल न करना गंभीर लापरवाही है।

पुलिस की भूमिका पर सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने पुलिस के रवैये पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक नाबालिग के अपहरण जैसे गंभीर मामले में इस तरह की ढिलाई और उदासीनता अस्वीकार्य है। अदालत ने यह भी नोट किया कि घटना के डेढ़ महीने बाद तक पुलिस ने न तो बालिका को तलाशने के लिए ठोस प्रयास किए और न ही परिजनों से पर्याप्त जानकारी जुटाई। यह स्थिति कानून व्यवस्था और पुलिस की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। अदालत ने यह भी माना कि प्रथम दृष्टया मामला गंभीर है और इसमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक है।

6 अप्रैल तक बालिका और आरोपियों को पेश करने का आदेश

हाई कोर्ट ने सख्त निर्देश जारी करते हुए पुलिस को आदेश दिया कि वह नाबालिग बालिका को, जो कथित रूप से पवन सिंह के कब्जे में है, हर हाल में 6 अप्रैल को कोर्ट के समक्ष पेश करे। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि मामले से जुड़े सभी आरोपियों को भी कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए। अदालत के इस आदेश ने पुलिस प्रशासन पर तत्काल दबाव बना दिया है।

FIR में नाम गायब करने पर नाराजगी

पीड़िता के पिता का आरोप है कि उन्होंने शुरुआत से ही पवन सिंह का नाम पुलिस को बताया था, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर में उसका नाम शामिल नहीं किया गया। इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि नामजद शिकायत के बावजूद आरोपियों को अज्ञात दिखाना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है। यह न केवल पीड़ित को न्याय से वंचित करता है, बल्कि आरोपियों को बचाने का प्रयास भी प्रतीत होता है।

परिजनों के साथ मारपीट का आरोप

मामले में एक और गंभीर पहलू यह सामने आया कि जब पीड़िता के परिजन थाने पहुंचे, तो उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया और पीड़िता के चाचा के साथ मारपीट तक की गई। इस घटना ने पुलिस की संवेदनहीनता को और उजागर कर दिया है। ऐसे व्यवहार ने न केवल परिवार को मानसिक रूप से आहत किया, बल्कि पुलिस पर भरोसे को भी कमजोर किया।

कोर्ट के आदेश के बाद बदला पुलिस का रवैया

हाई कोर्ट की सख्ती के बाद पुलिस का रवैया अचानक बदलता नजर आया। जहां पहले डेढ़ महीने तक पुलिस ने कोई ठोस पहल नहीं की, वहीं कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद बडगोंदा थाना पुलिस सक्रिय हो गई। पुलिस टीम पीड़िता के घर पहुंची और परिवारजनों से घटना की विस्तृत जानकारी लेने लगी। इससे साफ है कि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ही प्रशासनिक तंत्र में गति आई।

यह पूरा मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक तरफ जहां पीड़ित परिवार लगातार न्याय की गुहार लगाता रहा, वहीं दूसरी ओर पुलिस की निष्क्रियता और कथित पक्षपातपूर्ण रवैया सामने आया। अब इस मामले में 6 अप्रैल पर को सुनवाई होगी। जब पुलिस को नाबालिग बालिका और आरोपियों को कोर्ट में पेश करना है।

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