जेन Z के प्रति रुमानियत और भय

जंतर-मंतर पर CJP का 'जेन Z' आंदोलन: क्या यह नया अन्ना आंदोलन है, जिससे कांग्रेस का इकोसिस्टम डरा हुआ है?
Sanjeev Chandan Opinion
CJP आंदोलन से कांग्रेस को क्यों याद आया अन्ना आंदोलन का खौफ? राहुल गांधी, अभिजीत दीपके और वांगचुक की सियासत व 'Gen Z' के नए दांव की इनसाइड स्टोरी।
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डी. राजा और सीताराम येचुरी की जितना हमारा पार्टी नेतृत्व सुनता है, उतना हम कांग्रेसियों का नहीं।

जयराम रमेश, स्त्रीकाल और द मार्जिनलाइज़्ड पब्लिकेशन के एक कार्यक्रम में...

मैं उपवास नहीं करता, मैं भूखा रहा हूँ, मैंने भूख से संघर्ष किया है।

डी. राजा, सीपीआई महासचिव, लेखक के साथ एक लंबे इंटरव्यू में....

उस अनशन में कुछ भी महान या उदात्त नहीं था। वह एक घृणित और निकृष्ट कार्य था। वह अनशन अछूतों के हित में नहीं, बल्कि उनके विरुद्ध था। वह असहाय लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार छोड़ने के लिए विवश करने का सबसे निकृष्ट प्रकार का दबाव था।

बाबा साहेब, 1932 के महात्मा गांधी के अनशन पर, अपनी किताब व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स में...

जयराम रमेश और के. सी. वेणुगोपाल ही आज कांग्रेस के मुख्य नेतृत्व हैं। वे राहुल गांधी को शेप करते रहे हैं और उनके रुख के लिए नैरेटिव पैदा करते रहे हैं। जयराम रमेश का उपरोक्त कथन 2021 में कांस्टीट्यूशन क्लब में दिए गए भाषण का हिस्सा है। तब राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय की पिच पर बैटिंग नहीं शुरू की थी। वे सॉफ्ट हिंदुत्व के पैरोकार थे।

अभिजीत दीपके ने जब इंस्टाग्राम पर सीजेपी की शुरुआत की, तो पहले कुछ घंटों में, बल्कि लगभग एक दिन तक, उनका बांग्लादेश और नेपाल के जेन Z अभियान की तरह स्वागत हुआ। मेरे एल्गोरिद्म का कांग्रेस इकोसिस्टम भी उत्साहित था और वे लोग भी, जो 2024 में निर्णायक जीत से चूकने के बाद कोई और संघर्ष की धुरी खोज रहे थे; जेन Z जिनके सपनों में पल रहा था; और वे भी, जो आंदोलनों को एक प्रक्रियात्मक विकास और द्वंद्व के ज़रिये देखते हैं।

दूसरे दिन तक वह एल्गोरिद्म बदल गया था। उसमें से कांग्रेस समर्थक समूह शंकाओं से भर गए थे। इस वक्त तक दीपके की जाति और आम आदमी पार्टी से उनका पुराना रिश्ता, दोनों सामने आ चुके थे। कांग्रेसी तंत्र ने इसे एक तार्किकता देते हुए अन्ना आंदोलन से धोखे की बात भी कहनी शुरू कर दी थी, इसलिए सावधान रहने की चेतावनी भी।

सीजेपी ने NEET लीक को मुद्दा बनाया, तो राहुल गांधी का राजस्थान में कार्यक्रम NEET स्टूडेंट्स के बीच बना। यद्यपि उनके युवा संगठन इसके पहले से ही आने वाले चुनावों से गुजरने वाले राज्यों में आंदोलन कर रहे थे। सीजेपी इस बीच पैदा हुआ और सक्रिय होने लगा। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को ऑनलाइन पुश करता रहा और राहुल गांधी इस बीच विदेश चले गए या सीन से गायब हो गए। उनका अगला कार्यक्रम एक महीने बाद पटना में निर्धारित हुआ।

मैंने अपने एक लाइव इंटरव्यू में उनके विदेश यात्राओं के मैनेजर और ओवरसीज़ कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा से पूछा था कि ठीक चुनाव के वक्त आप राहुल गांधी के विदेश दौरे क्यों तय करते हैं? उनका उत्तर संतोषजनक नहीं था।

अभिजीत दीपके का आंदोलन जंतर-मंतर पर शुरू हुआ और उन्हें सोनम वांगचुक का साथ मिला और शुरू से लेफ्ट पार्टियों का भी। पोस्ट ट्रुथ नैरेटिव की रचना इस हद तक प्रभावी थी कि इस जेन Y के मुख्य नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन जेन Z की संभावनाओं को उकसा रहा था, तो दूसरी ओर कांग्रेसी और अन्य तबकों को अन्ना आंदोलन का भय सता रहा था और केजरीवाल के नेतृत्व में एक और 'तिकड़म' की शंका प्रताड़ित कर रही थी। वे प्रोजेक्ट कर रहे थे कि अन्ना आंदोलन से ठगे गए हैं, अब नहीं। जबकि दोनों आंदोलनों की भिन्नता स्पष्ट थी। अन्ना आंदोलन भ्रष्टाचार से आकंठ डूबे मध्यवर्ग के नैतिक गिल्ट को सहलाने वाले भ्रष्टाचार के मुद्दे के आधार पर खड़ा था और आंदोलनकारी धार्मिक संस्थाओं में कैद अकूत संपत्ति से लेकर एनजीओ के भ्रष्टाचार को अलग करके सिर्फ़ उन नेताओं को ज़्यादा टारगेट कर रहे थे, जो कभी इस देश की ब्राह्मणवादी निरंतरता को एक झटका देने के क्रूसेडर रहे थे। वे संसद की गरिमा के खिलाफ थे। हम जैसे लोग इसलिए उसके विरोधी थे। लेकिन अतीत की गलती की ढाल के साथ लड़ रहा कांग्रेस का इकोसिस्टम अपने पोस्ट ट्रुथ को व्यापक कर रहा था और स्वयं भी इसमें घिर गया।

इस बीच दीपके-वांगचुक और नेहा बोरा सहित अनेक युवाओं का अनशन शुरू हो गया।

जयराम रमेश और के. सी. वेणुगोपाल की टीम अपनी ज़िद पर थी और उनका इकोसिस्टम उस ज़िद को ठोस यथार्थ बताने का तर्क दे रहा था। इस बीच राहुल गांधी की पटना की सभा चार दिन के लिए टली, फिर भीड़ न जुटने के डर से निरस्त हो गई। उधर जंतर-मंतर पर अनशन की निरंतरता अपना ताप पैदा कर रही थी। यह गांधीवादी पैटर्न पर यदि अनशन था, तो स्टेट के खिलाफ महात्मा गांधी के महज़ एक-दो, या थोड़ा-बहुत तीसरे (पूना पैक्ट के दौरान) आंदोलन के आईने में ही हो सकता था। अन्यथा गांधी के अनशन आत्मशुद्धि और अंतरात्मा जगाने के ही ज़्यादातर रहे हैं। स्टेट के खिलाफ किसी एक मुद्दे पर अनशनकारियों की मौत का भी इतिहास है, नेहरू काल से लेकर मोदी काल तक।

सोनम वांगचुक के अनशन से पक्ष-विपक्ष अपने-अपने तरीके से निपट रहा था कि इसी बीच राहुल गांधी विदेश से वापस आ गए। लगभग पूरा विपक्ष अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक के साथ था, लेकिन कांग्रेस आशंकाओं से घिरी थी, आशंकाएँ फैला रही थी। इस वक्त तक जयराम रमेश खुश होंगे कि डी. राजा का अब कांग्रेस नेतृत्व नहीं सुनता है। वेणुगोपाल और जयराम रमेश की टीम उन्हें राहुल से मिलने भी नहीं देती। येचुरी अब रहे नहीं। युवाओं पर लाठीचार्ज के बाद सोनम वांगचुक से (तब तक अस्पताल में एडमिट) विपक्ष के नेताओं ने अनशन तोड़ने की अपील की। और भी कई कारणों से उन्होंने अनशन तोड़ा, तो उन्हें शंकाओं और अफवाहों का टारगेट बनाया गया। कांग्रेस का तंत्र फ़िलहाल ऐसे अभियानों के लिए बीजेपी के बाद दूसरे नंबर पर मीडिया पावर से लैस है। शंकाओं और अफवाहों से टारगेट करने का उसका एक इतिहास रहा है। यदि उन्हीं हथियारों से परीक्षण होगा, तो नेहरू के साथ कभी खट्टे और कभी मीठे रिश्ते वाले शेख अब्दुल्ला के बारे में क्या राय बनेगी? कश्मीर घाटी के दोनों ही नेता, या ऐसे अन्य नेता, अपने कोर मुद्दे की धुरी पर होते हैं। उन्हें लोग सुविधा से क्रेडिट और डिस्क्रेडिट करते हैं। नेहरू या मोदी से रिश्तों के बनने-बिगड़ने से नेताओं की विश्वसनीयता क्यों तय होगी, और क्या इस वक्त मुद्दे और उसके ताप को भाँपने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं थी?

इस ताप को कुछ ख़बरों के अनुसार सोनिया गांधी ने भांपा। उन्होंने सीजेपी आंदोलन से दूरी ख़त्म करने का सुझाव दिया। लेकिन जयराम रमेश और के. सी. वेणुगोपाल की टीम वाला तंत्र भला क्योंकर तैयार होता? राहुल जी का समानांतर स्टेज तैयार किया गया। यह सब 2024 के चुनाव के पहले से इस टीम का पैटर्न है। उधर आम आदमी पार्टी के नेताओं द्वारा कांग्रेस पर हमलावर टिप्पणियां , सोनम वांगचुक और दीपके का कांग्रेस की गतिवधियों के कारण पलटवार सरीखा जवाब कांग्रेस के आशंका नैरेटिव को बढ़ाने वाला ही था। 

सोनम वांगचुक की अस्पताल शिफ्टिंग और संसद मार्च के साथ अभिजीत दीपके का नेतृत्व सामने आ चुका था। दीपके और उनकी टीम नई स्थितियों को बेहद परिपक्व अंदाज़ में, राजनीतिक चतुराई के साथ नेतृत्व देती दिखी। लेकिन शंकाओं की राजनीति करने वाली टीम ने उन्हें और अधिक डिस्क्रेडिट करना शुरू किया, मानो किसी गुप्त एजेंडे से लैस हो। जबकि आंदोलन अपनी प्रक्रिया से गुजर रहा था। वहाँ रील वाले थे, तो लाठियाँ खाने वाले भी; पैलेट गन भी झेल रहे थे युवा, और बिना डरे इस आंदोलन को रचनात्मकता के साथ एक उद्देश्य की ओर ले जा रहे थे। रील ही उस आंदोलन का यथार्थ नहीं है, जो एक वर्ग की जेन Z परिकल्पना को उनके पोस्ट ट्रुथ के पैमाने पर फिट सिद्ध कर रहा है।

यह आंदोलन भी पीछे के आंदोलनों की तरह कई धाराओं के लोगों का समुच्चय ही था। जैसे अन्ना आंदोलन में लेफ्ट, समाजवादी, भाजपाई, संघी, बाबा रामदेव, किरण बेदी, अनुपम खेर जैसे लोग भी थे; जैसे राजीव गांधी के खिलाफ लेफ्ट, भाजपा और जनता दल सब थे; जैसे इंदिरा गांधी के खिलाफ हर तबका था। इस आंदोलन में अलग-अलग इंटरेस्ट ग्रुप के लोग थे। राम मंदिर चोरी से दुखी भी, उसके राजनीतिकरण वाले भी; यूजीसी सर्कुलर से ख़फा सवर्ण इंटरेस्ट के लोग भी, तो यूजीसी सर्कुलर के समर्थक भी। भरत तिवारी एन्काउंटर से दुखी युवा भी तो एन्काउंटर को लेकर योगी नीति के समर्थक रहे युवा भी।

इस आंदोलन के सीजेपी वाले हिस्से का नेतृत्व शुरू में भी और अंत में भी दीपके और उनकी टीम के हाथ में रहा, जो सत्ता पक्ष और सबसे बड़े विपक्ष—दोनों के निशाने पर रहे। सीजेपी ही आंदोलन की धुरी भी थी, शेष समर्थक समूह वृत्त। इस आंदोलन ने संसदीय राजनीति के शासकों को थोड़ा भयभीत किया। ये युवा आज जंतर-मंतर पर हैं, तो कल ये या इनकी पीढ़ी का कोई और बेंगलुरु में होगा। एक टीम गई भी और वहाँ उमर खालिद के पक्ष में तख्ती लिए किसी महिला पर मुक़दमा भी हुआ, वैसे ही जैसे बीजेपी सरकारें करती हैं। फिर भी क्या दीपके का नेतृत्व यहाँ से युवाओं के एक बड़े वर्ग के लिए जाति-श्रेणी से मुक्त होने वाला है? क्या उनका आंदोलन आंबेडकरवादी है? क्या महाराष्ट्र के शहर-शहर में सीजेपी के समर्थन में आंदोलन के बावजूद, और उनमें दलित स्पेस की अच्छी भागीदारी के बावजूद, दीपके को आंबेडकरवादी समूह अपने नेता के रूप में देखेगा, देख रहा है? ये सारे सवाल अभी और व्यापक होंगे। फिलहाल तो इतना ही कि औरंगाबाद और पुणे जैसी आंबेडकरवादी वैचारिकी और आंदोलनों की भूमि में रहते हुए भी दीपके ने राजनीतिक ट्रेनिंग आम आदमी पार्टी में ली, जो बाबा साहेब से लेकर भगत सिंह तक को अपने अवसरवादी ऑप्टिक्स का प्रतीक बनाती रही है।

इस आंदोलन का एक बड़ा सन्देश लड़कियों की इसमें  भागीदारी और उनका नेतृत्व है।  इससे अच्छी और बुरी लड़कियों का बायनरी टूटा, लेकिन क्या पहली बार? और नेहा बोरा एवं दीपके की भागीदारी के बीच सीजेपी के आंदोलन में स्त्री नेतृत्व का क्या यथार्थ रहा? और जेन Z के बेख़ौफ़ रील बनाते समूह जेनरेशन अल्फ़ा के दौर में कहाँ होंगे?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
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