अभिजीत दीपके: पोस्ट ट्रूथ और उनका दलित होना, अम्बेडकरवादी स्पेस से होना

अभिजीत दीपके, कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडर
अभिजीत दीपके, कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडरफोटो साभार- सोशल मीडिया
Published on

मैं आपको बता दूँ कि मैं अपने विद्यार्थी जीवन से ही, जब आपका जन्म भी नहीं हुआ था, अछूतों की समस्या पर विचार करता आया हूँ।

महात्मा गांधी

यह सही है महात्माजी कि आपने अछूतों की समस्या पर मेरे जन्म से पहले सोचना शुरू कर दिया था। वृद्ध लोग प्रायः अपनी आयु का उल्लेख करना पसंद करते हैं। यह भी सही है कि आपके कारण कांग्रेस ने इस समस्या को मान्यता दी, लेकिन कांग्रेस ने औपचारिक मान्यता देने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया।

डॉ. आंबेडकर

ऊपर का यह संवाद एक अपेक्षाकृत युवा का संवाद है अपने से पूर्व की पीढ़ी के प्रभावी नेता से 1931 में। उस नेता ने इसके पहले अपने पूर्व की पीढ़ी के नेताओं की जगह ली थी। और उससे नेतृत्व हासिल करने, छीनने के लिए उसके समूह के युवा तैयार थे, लेकिन यह संवाद उसके समूह के युवा से नहीं है, यह कोई और था जो उसके समूह से बाहर का था और एक बड़ी जनता के नेतृत्व के लिए दस्तक दे रहा था।

अभिजीत दीपके और उनके साथियों ने जब चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी के बैकड्रॉप से कॉक्रोच जनता पार्टी मुहीम शुरू की तो उन्हें इंस्टाग्राम पर जबरदस्त फॉलोइंग मिली। आजकल नई पीढ़ी इंस्टा आदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर है इसलिए सीजेपी को 'जेन जी ' ( Gen Z) की मुहीम बताया गया। हालांकि खुद अभिजीत जेन मिलेनियल ( Gen Y) हैं । एक - डेढ़ साल पहले पैदा होते तो जेन जी होते।यह बला क्या है, जेनरेशन का नामकरण! मुझे तो बस युवा समझ में आते हैं। लेकिन नामकरण है तो है।

पहले आए बेबी बूमर्स (1946 से 1964)। इनका नामकरण द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मदर में आए उछाल के आधार पर हुआ, जो कथित रूप से युद्ध से लौटे सैनिकों और युद्ध के साये से बाहर निकले अन्य नागरिकों के कारण आया बताया जाता है।

1965 से 1980 के बीच जन्मे लोग Gen X कहलाए। कई वजहों से इन्हें एक अज्ञात प्रकृति वाली, बदलती संस्कृति की पीढ़ी माना गया। कंप्यूटर भारत में भले ही राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने तक व्यापक नहीं हुआ था, लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में उसका स्वागत हो रहा था। Generation X शब्द पहले से प्रचलन में था, लेकिन 1991 में डगलस कूपलैंड के उपन्यास Generation X: Tales for an Accelerated Culture के बाद यह नाम व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गया।

1981 से 1996 के बीच जन्मे लोग जेन मिलेनियल (Gen Y) कहलाए। अमेरिकी समाजशास्त्री और इतिहासकार विलियम स्ट्रॉस (William Strauss) और नील होवे (Neil Howe) ने अपनी 1991 की किताब Generations में इस शब्द को लोकप्रिय बनाया। जाहिर है, इस पीढ़ी के बच्चे नई सदी के आसपास बड़े हुए।

जेन जी (Gen Z) 1997 से 2012 के बीच जन्मे लोग हैं। इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहा जाता है। इस नामकरण का आधार अंग्रेजी वर्णमाला का क्रम बना। पहले इनके लिए कई नाम प्रस्तावित हुए, लेकिन अंततः Gen Z ही सबसे अधिक प्रचलित हो गया।

और 2013 के बाद पैदा हुए बच्चे जेन अल्फा (Gen Alpha) हैं। अगले कुछ वर्षों में, 2029 के बाद, इनमें से पहले बच्चे मतदाता बनने शुरू होंगे। मार्क मैक्रिंडल (Mark McCrindle) ने 2008 में एक शोध के दौरान इस पीढ़ी के लिए 'जेन अल्फा' नाम प्रस्तावित किया, जो बाद में व्यापक रूप से प्रचलित हो गया।

बांग्ला देश, नेपाल आदि के सत्ता परिवर्तन को 'जेन जी ' आंदोलन द्वारा परिवर्तित बताया गया। तब से भारत में भी एक बड़ा समूह ऐसे किसी विरोध और सत्ता परिवर्तन की उम्मीदों से भरा था। यहां कुछ रुमानियत सरीखा भी दिखा-इंतजाररत बुद्धिजीवियों में। यहां से एक पोस्ट ट्रूथ की रचना शुरू होने की संभावना बननी शुरू हुई। गोया यह कि जेन जी नेटिजनस के रूप में भारत के जाति धर्म से ऊपर की दुनिया में पले बढ़े हों और वे मोनोलिथ कैटेगरी की तरह पेश आएंगे , एक्ट करने वाले हैं, कर रहे हैं। इस पोस्ट ट्रूथ पर खड़े और भी पोस्ट ट्रूथ हैं, जिनमें एक सीजेपी, दीपके भी किरदार हुए। लेकिन इस बीच युवाओं के आंदोलन का इतिहास-थोड़ा सा इस आंदोलन के सापेक्ष जो जंतर मंतर पर हुआ, जेन जी का आन्दोलन ।

भारत में 1946 से 1964 तक पैदा हुई बेबी बूमर्स' पीढ़ी का आन्दोलन था 1974 का आन्दोलन, जिन्हें आजादी से मोहभंग हो गया था, 1971 में बांग्लादेश के जन्म के बाद लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची इंदिरा गांधी 'देवी से दानवी' दिखने लगी थीं। लेकिन क्या वह एकरूप था। क्या उसी वक्त ऐसे युवा नहीं थे, जो इमरजेंसी तक से खुश थे। उसे सिर्फ इंदिरा इज इंडिया के प्रति हिकारत के नजरिए भर से नहीं देखा जा सकता। उसके लिए लेंस फ्रॉम बिलो, सामाजिक श्रेणी के निचले पायादान से देखने की जरूरत है। खुद जीतन राम मांझी तब जेन बूम युवा थे, अभिजीत दीपके की तरह ही थोड़ा दो साल पहले पैदा हुए थे। थोड़े उनके समाज के लोगों को इमरजेंसी अच्छी लग रही थी-समय पर मजदूरी, अपमान के दैनंदिन में कमी, जमींदारों में भय। एक ओर तरह तरह की गालियां देते थे जेन बूम थे ' गली गली में अंडी है, इंदिरा गांधी रं.. है।' ऐसे अनेक। ये उत्तर भारत के बेबी बूमर्स थे, वरना तो दक्षिण भारत में इंदिरा गांधी का आधार लगभग बना हुआ ही था। इन गाली देते युवाओं का भी कोई एक होमो चरित्र नहीं था। इनमें से कई बस थोड़े दिन पहले ही बिहार जैसे राज्य मेंआरक्षण के खिलाफ नारे लगा चुके थे।'आरक्षण कहां से आई, कर्पूरी की मां.....' बेबी बूमर्स के खाते में एक सत्ता परिवर्तन है इंदिरा गांधी बाहर हुईं थीं कुछ दिनों के लिए लेकिन फिर वापस भी हुईं। बेबी बूमर्स के खाते में महाराष्ट्र का पैंथर आंदोलन भी है जिसने इंदिरा गांधी से ज्यादा मोरारजी देसाई को नापसंद किया, उनके दक्षिणपंथी प्रो सवर्ण नीतियों और मन के कारण। उनपर जूते ही फेंके गए नागपुर इलाके में। ये संवैधानिक भारत के युवा थे, लोकतंत्र के असर से पैदा हुए थे। 1974 का आंदोलन भी कोई मोनोलिथ नहीं था। उनमें भी वर्ग, जाति की आकांक्षाओं की अपनी अपनी लय थी। इस पीढ़ी ने नक्सल वाड़ी आंदोलन को भी जन्म दिया, आगे बढ़ाया।

जेन एक्स ने 1990 के आंदोलनों की शुरुआत की। जेन x के हिस्से में तीन तरह के आंदोलनों की श्रेणियां थीं। मंडल - कमंडल और भूमंडल। ये तीनों आंदोलन साफ-साफ भारत के स्तरीकृत समाज के अलग-अलग इंटरेस्ट के केंद्र बिंदु से जुड़े थे। तीनों ही नारों में गालियां थी। गलियों का विरूप देखना हो तो आरक्षण विरोधी आंदोलन की गालियां देख लें। यह जेनरेशन भी कोई कम क्रिएटिव नहीं था, भले ही क्रिएटिविटी के रंग अलग-अलग थे। झाड़ू लिए डॉक्टर और 'मेरे पतियों से नौकरी मत छीनों' की तख्तियों में गार्गी जैसी इलीट कॉलेज की लड़कियां भद्दे, भौंडे, वीभत्स रचनात्मकता का चरम पेश कर रहे थे। एक चौथा आंदोलन भी था, जो उत्तर भारत में इस पोस्ट की शुरुआत के युवा नायक को गली - गली में पहुंचा रहा था। एक अलग राजनीतिक परिवर्तन का आगाज दे रहा था, कांशीराम जी के साथ सायकल चला रहा था। तो इस पीढ़ी के कमंडल धारी युवाओं ने देश के फैब्रिक को भी तार तार किया। बाबरी मस्जिद उसकी शिकार हुई। गालियां और साम्प्रदायिक नारे गली गली तक इस पीढ़ी ने पहुंचाए। इस पीढ़ी ने भी उस वक्त के बेबी बूमर्स की सरकार ले ली। राजीव गांधी सत्ता से बेदखल हुए, सामजिक रूप से उनसे प्रगतिशील और यथार्थवादी सोच वाली वीपी सिंह की सरकार भी। चंद्रशेखर भी गए। गद्दी पर बैठा एक खुर्राट ब्राह्मण राजनीतिज्ञ।

जेन Y, मिलेनियल, जब युवा हुआ, हो रहा था तो उसने संचार क्रांति की पंख पाई। ऑरकुट से लेकर फेसबुक तक और ट्विटर तक का निवासी हुआ। इसने जेन x और बेबी बूमर्स पीढ़ी का उत्पात देखा था, उनकी फसलें इसके हिस्से थी। गुजरात था, ओपन मार्केट थी, बदलती दुनिया थी, एक मायालोक भी अब उसके पॉकेट में था, या सायबर कैफे में, जो उसके पहले की पीढ़ी के लिए मायापुरी और मस्तराम के फुटपाथी उपलब्धता तक सीमित हुआ करता था। इस पीढ़ी के ख्वाब सिलिकॉन वैली में पलने शुरू हुए। हेमा मालिनी रेखा, मंदाकिनी , बिपाशा से ज्यादा आगे उनके सपने थे, ब्रिटनी स्पीयर्स से लेकर शकीरा, माइकल जैक्सन तक। इसने 2012 के आंदोलन को देखा, किया। इसी ने शाहीन बाग का आंदोलन भी किया, जो सौ सालों का सबसे बड़ा नागरिकता आंदोलन था। सरकार बदल कर जो इस पीढ़ी ने लाई वह नरेंद्र मोदी की सरकार थी, शाहीन बाग़ आंदोलन से इसकी ही लाई सरकार और उन्मादी हुई तो अपने सीएए, एनआरसी प्रोजेक्ट को रोक दिया/ धीमा भी किया। इस पीढ़ी ने अपने पूर्ववर्ती विरासत को भी बढ़ाया। और सांप्रदायिक हुए, पिछली पीढ़ी ने बाबरी मस्जिद तोड़ी तो इस पीढ़ी ने राम मंदिर बनावाया। इसी पीढ़ी ने मणिपुर की त्रासदी झेली तो उसे वीभत्स बनाने में शामिल भी हुआ

यह भी कोई मोनोलिथ कैटेगरी नहीं थी। इस पीढ़ी के दौर में आजादी और संविधान 60 साल से 70 साल की ओर बढ़ा। सत्ता में और अन्य स्पेस में बंटवारे हुए। इसमें से एक बड़ा वर्ग अन्ना आंदोलन को लेकर सशंकित था, उसके साथ नहीं था। उसे दिख रहा था कि भ्रष्टाचार के दायरे से कैसे अकूत संपत्ति अर्जित किए धार्मिक संस्थान बाहर रखा जा रहा है या आंदोलनकारी अपने एनजीओ, अपनी संस्थाओं को बाहर रख रहे हैं। इस समूह को 70 साल की आजादी और संविधान का हासिल मिल रहा था। वह देख रहा था कि इन्हें संभव करने वाले नेता जंतर- मंतर पर सबसे ज्यादा टारगेट हो रहे, गालियां खा रहे हैं।

उसके बाद का यह जेन जी आंदोलन जो अपने पूर्वतियों से ज्यादा नेटिजन है। उसका ठिकाना अब इंस्टाग्राम से लेकर अलग अलग सोशल मीडिया साइट है। अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों, खासकर 12 और 20 के आंदोलन से ज्यादा प्रसार की सहूलियत थी। शाहीन बाग के रचनात्मक पोस्टर हों, नारे हों या अन्ना आंदोलन में दी जा रही गालियां, नारे ग्लोबल होने में वक्त लेते थे फिर भी, इस बार उनमें पंख लगे थे। यह आंदोलन इन्स्टा और यूट्यूब के बूम से पोषित रहा। लेकिन क्या मोनोलिथ और जाति धर्म से ऊपर एकदम पवित्र? क्या गालियां देते युवा कोई अजूबा थे इस वक्त के लिए भी? पड़ोसी मुल्क में शेख हसीना के ब्रा, बिकनी से खेलते जेन Z उसके आदर्श नहीं थे। मेलोनी यूं ही भाभी हुई क्या? और वह जेन y की ईजाद 'सविता भाभी' कल्पना को नहीं उकसाती है जेन Z के लिए ? क्या जो बीबी को पे... वह देश को पे.. जैसे जुमले निर्वात से आए थे? और क्या वे उनसे भिन्न थे जो पिछले 12 सालों से सत्ता विरोधी लोगों को मिल रहे हैं, उन हैंडल से जिन्हें आदरणीय प्रधानमंत्री को भी फॉलो करते देखा गया है? क्या इस पीढ़ी के युवा धार्मिक स्थलों के पास साम्प्रदायिक गानों पर नाच नहीं रहे? क्या इसी पीढ़ी के युवा 'भाभी की ढोढ़ी' पर नहीं फिसल रहे?

अगली किस्त में क्या इस आंदोलन के वायरल रील ही यथार्थ हैं या पैलेट गन और कील लगी लाठियां भी, क्या इसके पूर्व की पीढ़ी का इनके प्रति उन्मादी रुमानियत ही यथार्थ है, और क्या अभिजीत का दलित होना और उसी रूप में उनका सार्वभौम नेता होना स्वीकार्य है?

अगली क़िस्त में जारी ......

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
अभिजीत दीपके, कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडर
जन्तर मन्तर आंदोलन और कॉमरेड दीपंकर का मास्टर स्ट्रोक
अभिजीत दीपके, कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडर
पाकिस्तान केंद्रित कुंठा विपक्षी समूहों के संघीकरण का औज़ार है
अभिजीत दीपके, कॉकरोच जनता पार्टी फाउंडर
'दलित' शब्द से इतनी नफरत क्यों?

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक की मदद करें

‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.

यहां सपोर्ट करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com