
लेख- शाहनवाज़ आलम
पिछले दिनों बनारस की ऐतिहासिक मस्जिद गंज शहीदां के प्रशासन द्वारा तोड़े जाने की अटकलों पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने ट्वीटर पर चिंता ज़ाहिर करते हुए इसे रोकने की मांग की. आगे उन्होंने भारत सरकार से अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा और देश की साझी विरासत को सम्भालने की अपील की और कहा कि ऐसा न होने पर विखण्डन और स्थायी अराजकता का सामना भारत को करना पड़ सकता है.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति के इस ट्वीट पर भाजपा नेताओं ने इसे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने, पहले अपने देश के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने, आतंकवाद को नियंत्रित करने, अपने मानवाधिकार के रिकॉर्ड को ठीक करने जैसे स्वर में प्रतिक्रियाएं दीं.
वहीं विपक्षी समूहों की भाषा ‘पाकिस्तान को अपने देश की फिक्र करने, हमारे आंतरिक मामलों में न बोलने, हमें पाकिस्तान से सीखने की ज़रूरत नहीं, भारत में अल्पसंख्यक ख़ुश हैं, के इर्दगिर्द रही. कुछ ने पोलिटिकली करेक्ट रहते हुए कहा कि इस स्थिति के लिए मोदी सरकार की सांप्रदायिक कार्यशैली ज़िम्मेदार है जिसके चलते पाकिस्तान भी हमें नसीहत देने लगा है.
यानी भारतीय पक्ष और विपक्षी समूहों में एक आम सहमति दिखी कि यह मामला भारत का आंतरिक मामला है और पाकिस्तान को इस पर बोलने का हक़ नहीं है.
विपक्षी समूहों की आंतरिक वैचारिक बुनावट को समझने के लिये उनके इस स्टैंड की विवेचना पाँच बिंदुओं पर की जानी चाहिए.
पहला, क्या वाक़यी यह आम सहमति तर्कसंगत है या वैश्विक मान्यताओं यहाँ तक कि हमारे अपने इतिहास के अनुरूप है ?
दूसरा, क्या पाकिस्तान केंद्रित विमर्श को हमारी अपनी राष्ट्रीय पहचान को परिभाषित करने की छूट दी जा सकती है ?
तीसरे, क्या यह दृष्टिकोण हमें एक सार्वभौमिक मूल्यों वाले स्वतंत्र राष्ट्र के बजाए सीमित दायरे वाले कुंठित राष्ट्र में बदलने का माध्यम तो नहीं है ?
चौथा, भूगोल से परे वर्ग, धर्म, जाति और व्यक्ति के तौर पर ‘देश’ कौन है ? किन तर्कों का निष्कर्ष कुछ लोगों को ख़ुद को देश मानने को प्रेरित करता है ?
पाँचवां, क्या यह तर्क धर्मनिरपेक्ष राजनीति को नियंत्रित करने का माध्यम है, जिसका मक़सद लोकतंत्र को बहुसंख्यकवाद में बदल देना है ?
आम सहमति या वैचारिक समर्पण
20 वीं सदी के शुरुआत तक व्यक्ति की आज़ादी और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार पूरी दुनिया का मुख्य सार्वभौमिक मूल्य बन चुका था जिसमें उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचानों का संरक्षण भी निहित था. इसीलिए लगभग सभी देश यहाँ तक कि उपनिवेशवादी देशों के लोगों ने भी इन मूल्यों पर आधारित स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया. गांधी जी के साथ इंग्लैंड समेत औपनिवेशिक देशों के बहुत सारे लोगों ने भारत की आज़ादी के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया था. संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य के बतौर भी सभी देशों ने अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण की ज़िम्मेदारी लेने का वादा किया है. इसीलिए किसी भी देश के अंदर किसी भी एक व्यक्ति का उत्पीड़न सिर्फ़ उस देश का आंतरिक मामला नहीं होता बल्कि पूरी दुनिया के लिए समान रूप से चिंता का मुद्दा होता है. इसलिए यह कहना कि मस्जिद का मुद्दा भारत का आंतरिक मुद्दा है, सैद्धांतिक तौर पर ग़लत है. भारत, पाकिस्तान या किसी भी देश को ऐसे किसी भी देश की घटना पर संज्ञान लेने का पूरा अधिकार है. लेकिन अफ़सोस की बात है कि ऐसे अवसरों पर विपक्षी समूहों में भी लगभग भाजपा के स्वर में बोलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. जो दरअसल, विपक्षी नैरेटिव के आरएसएस के नैरेटिव के अंदर ही बने रहने की सहमति का परिणाम है.
दरअसल, भाजपा के तर्क का मक़सद सार्वभौमिक वैश्विक मूल्यों पर लड़े गए स्वतंत्रता आंदोलन जिसका परिणाम सेक्युलर भारत का गठन था को ख़ारिज कर उसे हिंदू राष्ट्र के बतौर रेखांकित करना है. ताकि मुसलमानों के उत्पीड़न के मामले को हिंदू राष्ट्र का अपना आंतरिक मामला मानते हुए किसी मुस्लिम बहुल देश को इसपर कुछ भी बोलने से रोका जा सके. इस प्रवृत्ति को आप राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मामले में आरएसएस के इस तर्क में भी देख सकते हैं कि यह हिंदुओं का आपसी मामला है, इसमें ग़ैर हिंदुओं और ग़ैर भाजपाइयों को बोलने का अधिकार नहीं है. ठीक ऐसा ही अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय 2001 में डरबन में हुए भेदभाव विरोधी सम्मेलन के समय भी हुआ था. जब मनुवादी गिरोहों ने जाति व्यवस्था को आंतरिक समस्या बताकर उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की आलोचना की थी.
यानी विपक्षी समूहों की भाषा और तर्क उन सार्वभौमिक मूल्यों के ही ख़िलाफ़ है, जिसके आधार पर सेक्युलर भारत अस्तित्व में आया था.
सबसे अहम कि इससे बड़ी मूर्खता और क्या हो सकती है कि आप किसी देश से इसलिए कुछ नहीं सीखना चाहते कि आप उससे कई युद्ध लड़ चुके हैं ? हमने अंग्रेज़ों से लंबा संघर्ष किया तो क्या हमें वेस्ट मिनिस्टर संसदीय व्यवस्था उनसे नहीं लेनी चाहिए थी ? दरअसल, यह प्रवृत्ति सामान्य मनुष्यगत विवेक के ही ख़िलाफ़ है. अगर कोई अच्छी बात होगी तो किसी से भी सीखी जानी चाहिए. यहाँ हमें पाकिस्तान से यह तो सीखना ही चाहिए कि कैसे उसने पुराने ऐतिहासिक हिंदू नामों को फिर से बहाल किया है. जैसे जिस जैन मंदिर चौक का नाम बाबरी मस्जिद चौक कर दिया गया था, उसे फिर से उसका पुराना नाम दे दिया गया है. इस सीख से आरएसएस को दिक़्क़त होगी क्योंकि इससे उसका मुस्लिम नामों वाले शहरों के नाम बदलकर मुसलमानों के इतिहास को मिटाने की राजनीति में अवरोध उत्पन्न होगा. लेकिन भारत को हिंदू राष्ट्र न मानने वाले विपक्षी समूहों को पाकिस्तान से पुराने नामों को बहाल करने के उदाहरणों से सीखने में क्या दिक़्क़त है ? क्या विपक्षी समूहों की सत्ता पक्ष से मिलती-जुलती भाषा को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ‘राष्ट्रहित’ में दिखायी जा रही ‘एकता’ कहा जा सकता है ? अगर ऐसा है तो फिर ‘राष्ट्र’, ‘राष्ट्रहित’ और ‘एकता’ के संघी नैरेटिव के समानांतर क्या विपक्षी समूहों के पास कोई अपना नैरेटिव नहीं है ? फिलहाल इस सवाल का जवाब एक दुखद ‘ना’ दिखता है.
बिना पाकिस्तान के हिंदू भारत नहीं बन सकता
दूसरा, पाकिस्तान के लिए यह ज़रूरी है कि वो अपने अस्तित्व को भारत के समानांतर परिभाषित करे. लेकिन भारत के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है. पाकिस्तान इसलिए पाकिस्तान है कि वो पहले भारत का हिस्सा था. लेकिन भारत इसलिए भारत नहीं है कि कोई पाकिस्तान भी है. अब चूँकि भाजपा भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है और इसी लक्ष्य के लिए वो बनी है इसलिए उसके लिए इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान के समानांतर भारत की एक हिंदू पाकिस्तान जैसी छवि गढ़नी मजबूरी है. इसीलिए हम भाजपा शासन में पाकिस्तान केंद्रित बहस ज़्यादा देखते हैं.
इसको थोड़ा तह में देखना ज़रूरी होगा. तत्कालीन एडमिरल विष्णु भागवत ने प्रधानमंत्री वाजपेयी और रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस को पाकिस्तानी रेंजरों द्वारा कारगिल की पहाड़ियों पर बेस बनाने और भारी गोलीबारी की सूचना दी थी. लेकिन भारत सरकार ने उस पर कोई उचित कार्रवाई नहीं की थी जिससे पाकिस्तानी सैनिकों को बढ़त मिलती गई. बाद में एडमिरल भागवत को सरकार की बात न मानने के आरोप में हटा दिया गया. जिसके बाद मीडिया में वो सभी पत्र प्रकाशित हुए जिसमें वाजपेयी सरकार को युद्ध से पहले से ही पाकिस्तानी रेंजरों की चढ़ायी की सूचना दी गई थी. तब विश्लेषकों का मानना था कि वाजपेयी सरकार ने जानबूझकर मिलिट्री ऐक्शन में देरी की और चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक लाभ के लिए मिलिट्री ऐक्शन का आदेश दिया. अगर समय पर कार्रवाई की होती तो हमारे इतने जवान शहीद नहीं हुए होते.
दरअसल, इस देरी की वजह यह कुंठा थी कि जिस पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवाद पर भाजपा ज़िंदा है उससे युद्ध करने का सारा श्रेय कांग्रेस की लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी सरकार के हिस्से था. भाजपा पाकिस्तान को हराने का एक अदद श्रेय चाहती थी जिसके लिए उसने जानकारी मिलने के बावजूद चुनावी कारणों से बहुत देर से कार्यवायी की थी.
दरअसल, पाकिस्तान के साथ हमारे संबंध के दोस्ताना होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. यह विपक्षी समूहों को समझना होगा. यहाँ हमें दिल्ली में शांति बहाल करने के लिए गांधी जी द्वारा 1948 में 13 से 18 जनवरी तक किए गए आख़िरी अनशन की समाप्ति के समय हस्ताक्षर करने वालों की सूची देखनी चाहिए. जिसमें नेहरू, सरदार पटेल के निजी सचिव शंकर राव, हिंदू महासभा और आरएसएस के लाला हरिश्चंद्र के साथ ही पाकिस्तान हाई कमीशनर ज़ाहिद हुसैन का नाम भी दर्ज है. यानी हमारे या उनके अच्छे बुरे हर समय में उनकी और हमारी दोनों की भूमिका रहनी ही है तो यह सकारात्मक क्यों न हो. इसलिए अगर ग़ैर आरएसएस समूह भी आरएसएस के नज़रिए से पाकिस्तान को देखेंगे तो उन्हें आरएसएस के नज़रिए वाले भारत को भी स्वीकार करना पड़ेगा. विपक्षी समूह अनजाने या फिर जानबूझकर इस जाल में फँस चुके हैं.
राष्ट्र का एक कुंठा में बदलना
तीसरा, दरअसल पाकिस्तान विरोधी विमर्श का मुख्य उद्देश्य भारत को हिंदू पाकिस्तान में बदलने की कुंठा को मजबूत करना है. यहाँ यह संज्ञान में रखना चाहिए कि पाकिस्तान निर्माण के बाद हिंदुत्ववादी गिरोहों की तरफ़ से भारत का अधिकृत नाम हिंदुस्तान रखने की मांग की जाती थी. बंटवारे के समय के संघी जैसे लालकृष्ण आडवाणी देश को ‘हिन्दुस्थान’ बोलते हैं. संघ के न्यूज़ एजेंसी का नाम भी ‘हिन्दुस्थान समाचार’ है. यानी, संघ मानता था कि अगर बंटवारे के बाद अधिकृत तौर पर भारत का नाम हिंदुस्तान हो जाता तो उसके लिए भारत के ‘हिंदू राष्ट्र’ होने के नैरेटिव को फैलाना आसान होता. मसलन, मेरी और राजीव यादव निर्मित डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘सैफ़्रन वॉर’ के एक दृश्य में एक वक्ता भाषण में कहता है कि पाकिस्तान में मंदिरों में भेड़ बकरियां पाली जाती हैं इसलिए भारत की मस्जिदों में सुअर पालन किया जाएगा. ज़ाहिर है जो लोग भी पाकिस्तान में ऐसा होने की अफ़वाह सुनेंगे वो भारत की मस्जिदों में भी ऐसा करने को प्रेरित होंगे. यानी जितना पाकिस्तान विरोध तीव्र होगा उतना भारत के हिंदू राष्ट्र बनाए जाने की कुंठा भी बढ़ती जाएगी.
सवाल है कि आरएसएस-भाजपा ऐसा करे तो समझ में आता है लेकिन विपक्षी समूह पाकिस्तान विरोध को भारतीय राष्ट्र राज्य की पहचान कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?
व्यक्ति का देश में बदल जाना
चौथा, आरएसएस-भाजपा के इतर सेक्युलर कहे जाने वाले विपक्षी समूहों में भी देश को ‘भारत माता’ की इमेज में देखने का चलन रहा है. जबकि ऐतिहासिक तौर पर यह प्रवृत्ति मुश्किल से डेढ़ सौ साल पुरानी है और इसकी जड़ें उस बंगाल के पुनरुत्थानवादी हिंदू आंदोलन में हैं जहां यूरोपियन प्रभाव ज़्यादा रहा है. जिसकी शुरुआत 1882 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय लिखित अंग्रेज़ समर्थक और मुस्लिम विरोधी उपन्यास ‘आनंद मठ’ आने के बाद हुई. इस राजनीतिक उपन्यास के लिए अंग्रेज़ों ने बंकिम को 1891 में ‘राय बहादुर’ की पदवी दी थी. इसीलिए न तो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन में और ना ही आदिवासी आंदोलनों में और ना ही सिखों के विद्रोह में कभी भी भारत हिंदू देवी के रूप में अभिव्यक्त हुआ.
इसकी जो लोकप्रियता और स्वीकार्यता भी आई वो बंगाल केंद्रित साहित्यिक बुद्धिजीयों के कारण आई. जो यूरोपियन नवजागरण से प्रेरित थे जहाँ मदरलैंड और कुछ जगहों पर देश को फ़ादरलैंड मानने की प्रवृत्ति थी. इसकी इस संकीर्णता के कारण उदारवादी, तर्कवादी और प्रगतिशील खेमे ने इस इमेज को स्वीकार नहीं किया. क्योंकि यह देश को एक हिंदू राष्ट्र के बतौर चित्रित करता है और 1857 समेत सभी आंदोलनों के वैचारिक पक्ष जो साझी विरासत - साझी शहादत पर आधारित थे, को ढकने की साज़िश का हिस्सा रहा है.
इसलिए जब देश को हिंदू देवी के बतौर स्वीकार किया जाएगा तो स्वतः ही इससे ग़ैर हिंदू आबादी देश के लिए बाहरी हो जायेंगे. मूर्तिपूजक समाज जहाँ नेताओं के भगवान मान लिए जाने की प्रवृत्ति ज़्यादा होती है वहाँ कोई भी ‘बाहरियों’ के ख़िलाफ़ हिंसा करके देश भक्त बन सकता है. यह एक ऐसी उन्मादी भावना विकसित करती है जिससे हर एक भक्त अपने को स्वयं में देश मानने लगता है. इसीलिए हम देखते हैं कि मोदी या योगी के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने वालों पर राजद्रोह का भी मुक़दमा लिखा जाने लगा है. यह एक ऐसी धारणा है जो भारत के चरित्र को पूरी तरह बदल देगा. क्योंकि सत्ता से जुड़े लोग देश के नाम पर बोलने का दावा करने लगेंगे. ऐसे में हर बात पर अंबेडकर का नाम लेने वाले विपक्षी समूहों के पास अंबेडकर जैसा साहस दिखना चाहिए जो 26 अक्टूबर 1939 को बॉम्बे विधानसभा में कही गई उनकी इस बात को दोहरा सके कि “वो सिर्फ़ इसलिए अत्याचारी बहुमत की बात नहीं मान लेंगे कि वो देश के नाम पर बोलने का दावा कर रहा है”. लेकिन यह साहस कहां दिखता है ?
सांप्रदायिकता का सेक्युलर राजनीति की सीमा तय करना
विपक्षी समूहों के इस दृष्टिकोण का सबसे नकारात्मक असर मुसलमानों पर पड़ता है क्योंकि वो जिन दलों को वोट देते हैं वो
उस दल के साथ खड़े दिखते हैं जिसे वो वोट नहीं देते. जिससे मुसलमानों में यह धारणा बनती है कि उनकी नुमाइंदगी करने वाला कोई नहीं है. यह उनके सेकेंड क्लास नागरिक हो जाने की धारणा को मजबूत करता है जिसके लिए वो भाजपा के बजाए उन सेक्युलर दलों को ज़िम्मेदार मानते हैं जिन्हें वो वोट देते आए हैं. मसलन, बनारस की मस्जिद के तोड़े जाने की अटकलों पर जब मैंने बनारस के मुसलमानों से बात की तो उनका एक ही जवाब था कि ऐसे मुद्दों पर सभी पार्टियां भाजपायी हो जाती हैं.
यानी पाकिस्तान केंद्रित विमर्श, न सिर्फ भाजपा को अपनी मुस्लिम विरोधी आक्रामकता को बढ़ाने में मदद करता है बल्कि सेक्युलर दलों का भी भाजपाकरण करता है. यह एक दुष्चक्र है. जिसमें फंसे सेक्युलर दलों को दिन पर दिन और ज़्यादा मुस्लिम विरोधी होना ही है. यह प्रक्रिया विपक्षी समूहों से समझौतावादी, डरपोक और दिग्भ्रमित सेक्युलर नेतृत्व पैदा करती है. जो विदेशी मीडिया में छपी भ्रष्टाचार की ख़बरों को तो राष्ट्रीय मुद्दा बनाते हैं लेकिन होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम की तरफ़ से भारत के मुस्लिम विरोधी जनसंहार वाला देश बन जाने के ख़तरे की रिपोर्ट पर चुप्पी साध लेते हैं कि कहीं उन पर विदेशी एजेंसियों के समर्थन में खड़े होने का आरोप न लग जाए. जब सत्ता पक्ष इस बात पर विचार करता है कि मुसलमानों को लिंचिंग और दंगे में मारना उनके समर्थकों को ज़्यादा रोमांचित करेगा या फ़र्ज़ी मुठभेड़ों या पुलिस फ़ायरिंग में मारना तब वो इस पर चिंतन करते हैं कि मुसलमानों को मुसलमान बोलना पोलिटिकली करेक्ट रहेगा या अल्पसंख्यक.
फिर ये डरे हुए नेता किसी मोहम्मद दीपक जैसे अच्छे हिंदू के साथ दिखते हैं और पूरी कोशिश करते हैं कि कहीं से भी वो उस मुस्लिम बूढ़े के साथ न दिख जायें जिसे दीपक ने बचाया था. इस तरह वो सेक्युलर होने की नई परिभाषा गढ़ते हैं जिसका संदेश स्पष्ट होता है कि वो मुसलमानों के साथ सीधे खड़े नहीं होंगे अगर कोई अच्छा हिंदू मुसलमानों के साथ खड़ा होगा तो वो उस अच्छे हिंदू के साथ ज़रूर खड़े हो जाएंगे. यह एक तरह से मुसलमानों पर अच्छे हिंदुओं को अपना रक्षक मानने का नैतिक दबाव बनाने का प्रयास होता है. यह सावरकर के शब्दों में “राजनीति का हिंदुकरण” है. जिसे विपक्षी समूह अंजाम दे रहे हैं. भाजपा सावरकर के जुमले की दूसरी लाइन “हिंदुओं के सैन्यकरण” पर तो काम कर ही रही है.
अगर आज भारत हिंदू राष्ट्र बनने की कगार पर पहुँच गया है तो क्या इसका श्रेय सिर्फ़ भाजपा को देना जायज़ होगा ?
(लेखक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सचिव हैं)
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