
जननायक को 'भारत रत्न' सम्मान से पहले दिया गया 'मरणोपरांत न्याय' इतिहास में दफन हो गया। उन पर लिखे शोधग्रंथ और किताबों में इसका जिक्र तक नहीं! इसे चूक कहें या अनदेखी! जननायक को उनके निधन के सालभर के भीतर नेता विरोधी दल के पद पर पुनर्स्थापित कर 'मरणोपरांत न्याय' लिखने वाले विधानसभा के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान का संक्षिप्त किंतु ऐतिहासिक कार्यकाल भी विलोपित है। लेखकों और शोधार्थियों की नजर इस पर भी नहीं गयी।
ऐसा कैसे हो गया...
जननायक कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ सम्मान से बहुत पहले मिला था,‘मरणोपरांत न्याय’! जब कर्पूरी ठाकुर का निधन हुआ था,तब वह नेता विरोधी दल नहीं थे। विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष शिवचंद्र झा ने उन्हें अवैध तरीके से इस पद से बेदखल कर दिया था। इस असंवैधानिक फैसले को रद्द कर उन्हें नेता विरोधी दल के पद पर पुनर्स्थापित किया था, बिहार विधानसभा के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान ने। और इस फैसले को नाम दिया था,‘मरणोपरांत न्याय’! शिवनंदन पासवान ने इस फैसले के जरिए जननायक का ‘सम्मान’ लौटाया था। यह ऐतिहाससिक फैसला विधानसभा की कार्यवाही में दर्ज है। विधानसभा सचिवालय ने इस फैसले पर ‘मरणोपरांत न्याय’ शीर्षक से एक पुस्तिका भी छापी थी। लेकिन इस पर कभी चर्चा नहीं हुई। विधानसभा के इतिहास के पन्नों में यह फैसला दफन हो गया।
जननायक कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की घोषणा उनकी जन्म शताब्दी (24 जनवरी 2024) के ठीक एक दिन पहले 23 जनवरी 2024 को गयी थी। गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया था। इसे ऐतिहासिक फैसला माना गया। सियासी चर्चाओं में इस पर खूब बात होती है। लेकिन उस फैसले की चर्चा कभी नहीं सुनी,जिसने कर्पूरी ठाकुर को ‘मरणोपरांत न्याय’ दिया था। 24 जनवरी, 2026 को कर्पूरी ठाकुर की 102वीं जयंती है। इस अवसर पर कर्पूरी ठाकुर के जीवन और योगदान पर चर्चा होगी। लेकिन उनके साथ हुए उस अन्याय पर बात नहीं होगी,जो कांग्रेसी हुकूमत ने की थी। और न उन्हें ‘मरणोपरांत न्याय’ देने वाले दलित समाज से आने वाले बिहार विधानसभा के प्रथम उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान के साहस और न्यायिक विवेक पर बात होगी। बिहार विधानसभा के इतिहास के पन्नों में दर्ज 30.1.89 का यह फैसला, कर्पूरी ठाकुर के निधन (17फरवरी, 1988) के करीब बारह महीने बाद लिखा गया था। लेकिन यह फैसला लिखने वाले शिवनंदन पासवान का कार्यकाल विधानसभा के पूर्ववर्त्ती अध्यक्षों की सूची से गायब है। नामावली में उनके नाम का उल्लेख तक नहीं है।
जन नायक कर्पूरी ठाकुर को नेता विराधी दल का दर्जा विधानसभा में उनके दल के विधायकों की पर्याप्त संख्याबल के आधार पर मिला था। जब वे हटाये गये थे ,तब भी विधान सभा के भीतर उनके दल के विधायकों की संख्या पर्याप्त थी। बिहार विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष शिवचंद्र झा ने 11.8.1987 को कर्पूरी ठाकुर को नेता विरोधी दल के पद से हटाया था। विधानसभा सचिवालय ने अगले दिन इसकी सूचना (पत्रांक 1699,दिनांक 13.8.87) जारी की थी।
कर्पूरी ठाकुर ने इस फैसले का जोरदार प्रतिकार किया था। लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी बात नहीं सुनी थी। हाशिए के समाज की आवाज उठाने वाले की आवाज दबा दी गयी थी।
लेकिन बिहार विधानसभा के कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान ने कर्पूरी ठाकुर को नेता विरोधी दल के पद से हटाये जाने के फैसले को निरस्त करते हुए ऐतिहासिक नियमन दिया था।
उन्होंने लिखा, ‘तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा 11.8.87 को श्री कर्पूरी ठाकुर को नेता विरोधी दल के पद से हटाना एवं तत्संबंधी विवरणिका (1699, दिनांक 12 अगस्त 1987) तथ्यों से परे था एवं विधि सम्मत नहीं था।
अतः तत्कालीन अध्यक्ष के उक्त निर्णय को मैं अपने एतद् निर्णय द्वारा रद्द घोषित करता हूं और यह भी घोषणा करता हूं कि माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर अपने मृत्यु पर्यन्त अर्थात 17.2.1988 के प्रातः काल तक बिहार विधान सभा में विरोधी दल के नेता पद पर बने रहे थे।’
विधानसभा सचिवालय ने कार्यकारी अध्यक्ष्र शिवनंदन पासवान के इस निर्णय पर ‘मरणोपरांत न्याय’ शीर्षक से पुस्तिका प्रकाशित की थी। जिसमें श्री पासवान ने लिखा, ‘‘माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व असाधारण था। लोकतंत्र मे उनकी अटूट आस्था थी। 1952 से वे लगातार बिहार विधान सभा के सदस्य थे। इस अवधि में वे एक बार उप मुख्यमंत्री तथा दो बार मुख्यमंत्री के पद पर रह चुके थे। तत्कालीन अध्यक्ष के विवादास्पद निर्णय से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा था।"
30.1.89 को लिखी गयी श्री पासवान की इस टिप्पणी के साथ ‘मरणोपरांत न्याय’ पुस्तिका में उनके फैसले की पूरी पृष्ठभूमि लिखी गयी है...। इस आलेख में नीचे ‘मरणोपरांत न्याय’ हूबहू रख दिया गया है। उसे पढा जा सकता है।
पर, सवाल उठता है कि कर्पूरी ठाकुर को लौटाया गया ‘सम्मान’ और ‘मरणोपरांत न्याय’ दफन कैसे हो गया। मीडिया या एकेडेमिया ने भुला क्यों दिया। एक बात तो समझ में आती है कि सत्ता उनके खिलाफ थी। लेकिन उनलोगों के बारे में क्या कहा जाये जिनलोगों ने कर्पूरी ठाकुर पर शोधग्रंथ लिखे। किताबें लिखी। वह शोधग्रंथ कैसा,वह किताबें कैसी जिसे लिखने वालों को कर्पूरी ठाकुर के साथ हुआ वह ‘अन्याय’ और उनको लौटाया गया ‘सम्मान’ नजर नहीं आया। सामान्य समझ तो यही बताता है कि किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर शोध या किताब लिखने वाला व्यक्ति उस शख्सीयत के समकालीन घटनाक्रम और उनके करीबियों को खोजता है। जानना चाहता है कि उस दौर में क्या कुछ घटित हुआ था। शिवनंदन पासवान उन चुनिंदा लोगों में थे जिनको कर्पूरी ठाकुर का निकट सहयोगी माना जाता है। कर्पूरी ठाकुर के आहृवान पर ही वे प्रशासनिक सेवा से त्यागपत्र देकर राजनीति में आये थे। आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में सकरा से विधायक चुने गये। कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी की सरकार में राजस्व एवं भूमि सुधार राज्य मंत्री बनाये गये। लोकदल के उपाध्यक्ष और पार्टी के मुख्य सचेतक रहे। विधानसभा के उपाध्यक्ष बनाये गये। विधानसभा के कार्यकारी अध्यक्ष रहे। तत्कालीन मुख्यमंत्री डा जगन्नाथ मिश्रा के खिलाफ पाटलीपुत्र अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में घोटाले की लडाई सुप्रीम कोर्ट तक लडी। इस घोटाले की जांच का आदेश भी जनता पार्टी की तत्तकालीन सरकार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने ही दिया था। उस घोटाले के खिलाफ लंबी कानूनी लडाई भी कर्पूरी ठाकुर पर किताब के लेखकों से ओझल रह गयी। उस दौर के महान कहे जाने वाले पत्रकार तक कर्पूरी ठाकुर के साथ हुए ‘अन्याय’ ,उनको ‘मरणोपरांत न्याय’ पर लिखते-बोलते नहीं हैं! तो क्या वह ‘द्विजवादी अन्याय’ था,इसलिए भुला दिया गया! क्या वह ‘गैर द्विज का न्याय’ था ,इसलिए उसकी अनदेखी की गयी!
पर, सवाल तो उनसे भी है जो कर्पूरी ठाकुर की ‘राजनीतिक विरासत’ के दावेदार हैं। इस लंबी अवधि में बिहार की सियासत में सामाजिक न्यायवादी शक्तियां आती-जाती रही है।
बिहार के संसदीय इतिहास का वह सवर्णिम अध्याय शायद गुमनाम रह जाता, अगर शिवनंदन पासवान की 90वीं जयंती पर उनके पत्रों और दस्तावेजों को पलटा नहीं गया होता। शिवप्रभा फाउंडेशन की ओर से 13 जनवरी, 2026 को विधानसभा की एनेक्सी में हुए इस आयोजन से पहले शिवनंदन पासवान के छोटे पुत्र पंकज आनंद और पुत्रवधु शिवानी ठाकुर आनंद ने जब पुरानी फाइलें खंगालनी शुरू की तो दबा हुआ इतिहास सामने आया। चकित कर देने वाला ‘मरणोपरांत न्याय’ भी उद्घाटित हुआ। बहुत कुछ ऐसा सामने आया जिस पर अभी चर्चा करना विषय से भटक जाना होगा। उस पर फिर कभी। बस इतना कहना जरूरी है कि ‘न्याय’ किसी दयावान की खैरात नहीं। अन्याय से लडते-भिडते आगे बढने वाला, न्यायिक विवेक और साहस का धनी व्यक्ति जब उंची कुर्सी पर बैठता है, तो ‘न्याय’ लिखा जाता है। वह अपने खिलाफ होने वाले किसी अन्याय की फिक्र नहीं करता है।
‘मरणोपरांत न्याय’ न्यायिक विवेक और साहस की मिसाल है। नीचे पढिए...जननायक को ‘मरणोपरांत न्याय’ में शिवनंदन पासवान ने क्या कुछ लिखा ...
‘कतिपय माननीय सदस्यों ने, तत्कालीन अध्यक्ष श्री शिवचंद्र झा के द्वारा दिनांक 11.8.1987 को जो आदेश दिया गया था जिसके द्वारा माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर को बिहार विधान सभा के नेता, विरोधी दल के रूप में मान्यता समाप्त की गयी जिसे 12 अगस्त 1987 के विवरणिका में प्रकाशित किया गया, से संबंधित संविधान एवं नियम के उल्लंघन का प्रश्न उठाया है तथा मुझसे उस संविधान एवं नियम के आलोक में पुनर्विचार के लिये आग्रह किया है। यह उल्लेखनीय है कि स्व. कर्पूरी ठाकुर ने भी अपने कई पत्रों के माध्यम से तत्कालीन अध्यक्ष श्री शिवचन्द्र झा से उनके द्वारा दिये गये नियमन पर पुनर्विचार हेतु आग्रह किया था।
उपरोक्त विषय पर निर्णय लेने के पूर्व निम्नलिखित तथ्यों को उद्धृत करना आवश्यक है। 52वां संविधान संशोधन अधिनियम 1985 भारतीय संविधान की 10 वीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया जो दिनांक 1-3-1985 को प्रभावी हुआ।
उक्त संविधान संशोधन के पश्चात् बिहार विधान सभा का गठन हुआ। उसके अनुसार निर्वाची पदाधिकारी द्वारा प्राप्त सूचना के आधार पर सभा अध्यक्ष के आदेश से निर्वाचित सदस्यों की दलगत सूची (रजिस्टर) मार्च 1985 में प्रकाशित की गयी, जिसके अनुसार लोकदल के सदस्यों की संख्या 46 है। उसके पश्चात समय-समय पर अध्यक्ष के आदेश से दलगत सूची प्रकाशित की गयी। सभा अध्यक्ष दवारा विवादास्पद निर्णय के पूर्व अंतिम दलगत सूची जुलाई 1987 में प्रकाशित हुई जिसमें लोकदल के सदस्योंजिए की संख्या 46 बतायी गयी है। लोक सभा द्वारा प्रकाशित "दी जर्नल आफ पालियामेंट्री इन्फोरमेशन में भी लोकदल के सदस्यों की संख्या 46 ही बतायी गयी है। बिहार विधान सभा में लोकदल विधायक दल के सदस्यों की संख्या प्रारंभ मेंवल 46 थी जो कि निर्वाचन आयोग के प्रकाशन में भी अंकित है। किशनपुर उपचुनाव के बाद उक्त दल के सदस्यों की संख्या 47 हो गयी। परंतु कोच उप चुनाव के हार जाने के फलस्वरूप उक्त दल के सदस्यों की संख्या पुनः 46 रह गयी।
सभा अध्यक्ष ने सभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित विवरणिका संख्या 1699 दिनांक 12-8-1987 में श्री कर्पूरी ठाकुर को विरोधी दल के नेता पद से हटाये जाने के निम्नलिखित तीन कारण बताये हैं :
(1) लोकदल ने बिहार विधान सभा में विधायक दल के सदस्यों के रुप में अपनी मान्यता के लिये संवैधानिक कार्रवाई नहीं की है और न उसे औपचारिक रूप से दल के रूप में मान्यता ही मिली है,
(2) मात्र 19 विधायक ही इस दल में हैं जो अपने को लोकदल विधायक दल के रूप में घोषित करते हैं,
(3) दल के नेता ने अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों का अनुपालन नहीं किया है। माननीय कर्पूरी ठाकुर ने सभा अध्यक्ष से उन कागजातों की लिखित रूप से मांग की कि उन सारे कागजातों को उपलब्ध करायें जिसके आधार पर उन्होंने (सभा अध्यक्ष ने) उक्त निर्णय लिया है। उनके मृत्यु -पर्यन्त के सभी अभिलेख जिसके आधार पर तत्कालीन संभा अध्यक्ष ने उपर्युक्त विवादास्पद निर्णय लिया था, उपलब्ध नहीं कराया गया। मात्र तत्कालीन विधान सभा सचिव ने अपने पत्रांक 1793 दिनांक 21-8-1987 द्वारा श्री ठाकुर को सूचित किया कि उनकांद्र पत्र अध्यक्ष महोदय के कार्यालय में संबंधित संचिका के साथ भेज दिया गया है, अध्यक्ष महोदय के आदेशोपरांत तत्काल उन्हें सूचित किया जायेगा।
सभा सचिवालय में उपलब्ध अभिलेखों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने के पश्चात् मैं निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचता हूं : -
(क) तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा श्री कर्पूरी ठाकुर के संबंध में नियमन देने के पूर्व भारतीय संविधान के 52 वां संविधान संशोधन का पालन नहीं किया गया है। यह उल्लेखनीय है कि संविधान के 52वें संशोधन के संदर्भ में निर्णय लेते समय विधायिका के पीठासीन पदाधिकारी का स्वरूप एक अर्द्ध न्यायिक प्राधिकार के रूप में हो जाता है और वैसी स्थिति में न्यायपालिका द्वारा अपनायी जाने वाली प्रक्रिया का अनुसरण करना पीठासीन पदाधिकारी के लिये अनिवार्य है। उपलब्ध अभिलेख से यह भी स्पष्ट है कि जिन पत्रों पर तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा नियमन दिया गया वे तथाकथित आवेदन पत्र संविधान के 52वें संशोधन एवं उनके अन्तर्गत बने नियमों के अनुरूप नहीं थे क्योंकि नियम 6 के अनुसार यह स्पष्ट है कि कोई भी आवेदन पत्र जो सदस्य द्वारा अध्यक्ष को दिया23 जाएगा उसके तथ्य का सत्यापन सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 में अधिसूचित रीति से किया जाएगा। ऐसा न करने पर नियम 7 के मुताबिक वैसे आवेदन पत्रों को अध्यक्ष रद्द कर देगा। उपर्युक्त बातों से यह भी स्पष्ट है कि तथाकथित पत्र अनुकूल नहीं था।
(ख) उक्त नियमन देने के पूर्व श्री कर्पूरी ठाकुर को कोई भी अवसर प्रदान नहीं किया गया जिसके द्वारा वे अपना पक्ष रख सकें और इस तरह तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा दिया गया उक्त नियमन नैसर्गिक न्याय का हनन है। साथ ही संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि नैसर्गिक न्याय नियम सिद्धान्त पर निहित है।
(ग) उक्त नियमन तथ्य से भी परे है क्योंकि तत्कालीन अध्यक्ष बिहार विधान सभा ने दिनांक 4-4-1985 से श्री कर्पूरी ठाकुर को विरोधी दल के नेता के रुप में मान्यता प्रदान की एवं बाद में इसकी घोषणा सभा अध्यक्ष द्वारा सदन में भी की गयी। उक्त आधार पर संसदीय कार्य विभाग, बिहार, पटना से सचिवालय के पत्रांक 503 दिनांक 4-4-1985 के अनुसरण में महालेखाकार, बिहार, पटना को अपने पत्रांक 264 दिनांक 19-4-1985 द्वारा यह लिखा कि बिहार विधान सभा में विपक्ष के सभी दलों की संख्या से अधिक श्री कर्पूरी ठाकुर, स० वि० स० के नेतृत्व वाले दल की संख्या 46 है जो गणपूर्ति के निर्धारित संख्या से अधिक है। 4-4-1985 एवं 11-8-1987 के बीच में ऐसा कोई भी अभिलेख उपलब्ध नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो कि दलगत सूची में कोई परिवर्तन हुआ। ऐसी परिस्थिति में विवरणिका संख्या 1699 दिनांक 12-8-1987 में यह उल्लेख करना कि मात्र 19 विधायक ही लोकदल के विधायक दल के रुप में घोषित है, तथ्यहीन, आधारहीन एवं भ्रामक है।
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर मैं इस निर्णय पर पहुंचता हूं कि तत्कालीन अध्यक्ष द्वारा 11-8-1987 को श्री कर्पूरी ठाकुर को नेता विरोधी दल के पद से हटाना एवं तत्संबंधी विवरणिका (1699 दिनांक 12 अगस्त 1987) तथ्यों से परे था एवं विधि सम्मत नहीं था। अतः तत्कालीन अध्यक्ष के उक्त निर्णय को मैं अपने एतद् निर्णय द्वारा रद्द योषित करता हूं और यह भी घोषणा करता हूं कि माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर अपने मृत्युपर्यन्त दिनांक 17-2-1988 के प्रातः काल तक बिहार विधान सभा में विरोधी दल के नेता पद पर बने रहे थे।
माननीय श्री कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व असाधारण था। लोकतंत्र में उनकी अटूट आस्था थी। 1952 से वे लगातार बिहार विधान सभा के सदस्य थे। इस अवधि में वे एक बार उप मुख्य मंत्री तथा दो बार मुख्यमंत्री के पद पर रह चुके थे। तत्कालीन अध्यक्ष के विवादास्पद निर्णय से उन्हें गहरा सदमा पहुंचा था।
अंत मैं भारत के महामहिम राष्ट्रपति से भी विनम्र निवेदन करना चाहता हूं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत संविधान के 52 वें संशोधन (10वीं अनुसूची) के संबंध में विधायिका के पीठासीन पदाधिकारियों के अधिकार के संबंध में माननीय सर्वोच्य न्यायालय से राय मांगने की कृपा करें क्योंकि यह एक अति लोक महत्व का विषय है जिसको लेकर कई विधायिकाओं के सामने समस्या उत्पन्न हुई है और भविष्य में भी उपस्थित हो सकती है।’
शिवनंदन पासवान, कार्यकारी अध्यक्ष
बिहार विधान सभा
30.1.1989
(बिहार विधान सभा, पटना द्वारा प्रकाशित एवं जयश्री प्रेस (प्रा.) लि.बुद्ध कॉलोनी, पटना द्वारा मुद्रित।)
नोटः बिहार विधानसभा में दिनांक 30.1.1989 को कार्यकारी अध्यक्ष शिवनंदन पासवान द्वारा दिये गये नियमन का मूल पाठ हिन्दी में है जिसका अंग्रेजी अनुवाद भी पुस्तिका में है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.