
बचपन से ही भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, दुर्गा भाभी, जतिन दा, राजगुरु, सुखदेव और सूर्य सेन जैसे क्रांतिकारी मेरे नायक रहे हैं। उम्र के साथ-साथ उनके प्रति मेरा आकर्षण कम होने के बजाय और गहरा होता गया। उनके जीवन, उनके साहस, उनके विद्रोह और देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने की उनकी अदम्य इच्छाशक्ति में मुझे हमेशा एक असाधारण आकर्षण दिखाई दिया।
शायद इसी आकर्षण के चलते महात्मा गांधी कभी मेरे उतने प्रिय नहीं रहे। उनके विचार, उनका संघर्ष और उनका रास्ता मुझे कभी उस तरह रोमांचित नहीं कर पाए, जिस तरह भगत सिंह और उनके साथियों की क्रांतिकारी गाथाएँ करती थीं। मेरे लिए क्रांति का अर्थ था अन्याय के विरुद्ध निर्भीक होकर खड़े होना, सत्ता को चुनौती देना और अपने विचारों के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहना।
लेकिन जीवन में एक दिन ऐसा आया, जब मेरे भीतर वर्षों से बनी यह धारणा अचानक एक नए सवाल से टकरा गई।
जब संसद में कुछ युवाओं ने सरकार के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज कराने के लिए धुएँ वाले बम फेंके, तो मेरे भीतर का पुराना क्रांतिकारी प्रेम जाग उठा। मैं भावनाओं में बहकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखने लगा। मेरी सहज प्रतिक्रिया थी कि इन युवाओं को क्षमा कर दिया जाना चाहिए, उन्हें रिहा कर देना चाहिए। आखिर, क्या किसी भारतीय लोकतंत्र में भगत सिंह को अपना आदर्श मानने और सत्ता के विरुद्ध विरोध दर्ज कराने के लिए किसी भारतीय को अपराधी बना देना चाहिए?
मैं लगभग अपनी पोस्ट लिख चुका था। मेरे शब्दों में आक्रोश था, सहानुभूति थी और उन युवाओं के प्रति एक गहरी आत्मीयता थी।
तभी अचानक मेरे भीतर एक दूसरी आवाज़ उठी।
मुझे त्रिपुरा की हिंसा पर तैयार की गई अपनी तथ्य-जाँच रिपोर्ट याद आ गई। उस रिपोर्ट के बाद मेरे हिस्से में जो कुछ आया था, वह केवल असहमति या आलोचना नहीं थी। मेरे विरुद्ध यूएपीए के तहत नोटिस जारी हुआ था। एकाएक मुझे वह पूरा अनुभव याद आने लगा—कानूनी प्रक्रिया का भय, अनिश्चितता, मानसिक दबाव और वह अंतहीन आशंका कि अपने विचारों के लिए आवाज़ उठाने के बाद आगे क्या-क्या झेलना पड़ सकता है।
मेरी उँगलियाँ रुक गईं।
मैंने अपनी लिखी हुई पोस्ट को फिर से पढ़ा। मेरे सामने वे युवा थे, जिनके प्रति मेरे मन में सहानुभूति थी। लेकिन अब उनके साथ-साथ मुझे अपना परिवार, अपनी जिम्मेदारियाँ, अपना जीवन और उस पूरी कानूनी प्रक्रिया की भयावह स्मृतियाँ भी दिखाई देने लगीं।
और मैंने वह पोस्ट प्रकाशित नहीं की।
उस दिन पहली बार मैंने अपने भीतर एक ऐसा सच स्वीकार किया, जिससे शायद मैं अब तक बचता आया था। मैं अपने नायकों की तरह साहसी नहीं हूँ। मैं उनके जैसा जोखिम उठाने का दावा नहीं कर सकता। मैं अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की आकांक्षा तो रखता हूँ, लेकिन हर बार उस आकांक्षा की कीमत चुकाने का साहस मुझमें नहीं होता।
यह स्वीकार करना मेरे लिए आसान नहीं था।
मैंने वर्षों तक भगत सिंह और उनके साथियों को अपने आदर्शों की कसौटी बनाया था। लेकिन उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि उनके असाधारण साहस और बलिदान को श्रद्धा से देखना एक बात है और स्वयं वैसा जीवन जी पाना बिल्कुल दूसरी।
वे असाधारण मनुष्य थे। उनका साहस, उनका आत्मविश्वास और अपने विश्वासों के लिए मृत्यु तक को स्वीकार कर लेने की उनकी क्षमता सामान्य मानवीय सीमाओं से कहीं आगे दिखाई देती है। मैं उनसे प्रेम कर सकता हूँ, उनके विचारों से प्रेरणा ले सकता हूँ, उनके बलिदान के आगे नतमस्तक हो सकता हूँ, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि मैं स्वयं भी वैसा बन सकूँ।
और शायद यहीं से गांधी मेरे लिए नए अर्थों में प्रासंगिक होने लगे।
मैंने महसूस किया कि गांधी केवल उन लोगों के नेता नहीं थे, जो निडर होकर सत्ता से टकरा सकते थे। वे उन साधारण मनुष्यों के लिए भी एक रास्ता लेकर आए थे, जिनके भीतर अन्याय के विरुद्ध आक्रोश तो है, लेकिन जिनके पास असाधारण साहस, बलिदान की क्षमता या सब कुछ दाँव पर लगा देने की शक्ति नहीं है।
गांधी का रास्ता मुझे पहली बार एक ऐसे रास्ते की तरह दिखाई दिया, जिस पर चलते हुए एक सामान्य मनुष्य भी अपने आत्मसम्मान को बचा सकता है, अपनी असहमति दर्ज करा सकता है और अपनी सीमाओं के बावजूद समाज के लिए कुछ कर सकता है।
मुझे लगा कि हर व्यक्ति भगत सिंह नहीं हो सकता। हर कोई फाँसी के फंदे को चूमने का साहस नहीं जुटा सकता। हर कोई अपने जीवन को किसी बड़े उद्देश्य के लिए पूरी तरह समर्पित नहीं कर सकता। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि ऐसे साधारण मनुष्यों के लिए न्याय, प्रतिरोध और परिवर्तन की लड़ाई में कोई जगह ही नहीं है?
नहीं।
शायद गांधी का महत्व ही इसी में है कि उन्होंने संघर्ष को केवल असाधारण साहस और सर्वोच्च बलिदान की कसौटी पर नहीं रखा। उन्होंने साधारण मनुष्य के भीतर छिपी नैतिक शक्ति को पहचाना और उसे संगठित प्रतिरोध का माध्यम दिया। उन्होंने मुझे यह समझने का अवसर दिया कि साहस का एक रूप वह भी है, जिसमें मनुष्य अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए भी अन्याय के सामने पूरी तरह समर्पण नहीं करता।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे अपने भीतर एक अजीब-सा विरोधाभास दिखाई देता है। मेरे हृदय में आज भी भगत सिंह, आज़ाद, नेताजी, दुर्गा भाभी, राजगुरु, सुखदेव और सूर्य सेन के लिए वही अगाध प्रेम और सम्मान है। उनकी तस्वीरें, उनके विचार और उनके बलिदान आज भी मेरे भीतर विद्रोह की वही आग जगाते हैं।
लेकिन जब मुझे अपने जीवन का रास्ता चुनना होता है, तो मैं गांधी की ओर देखता हूँ।
क्योंकि मुझे अब यह समझ में आने लगा है कि किसी नायक से प्रेम करना और उसकी तरह जीवन जी पाना एक ही बात नहीं है। और यह भी कि किसी महान उद्देश्य के लिए संघर्ष करने का अधिकार केवल असाधारण लोगों का नहीं है। साधारण मनुष्यों की अपनी कमजोरियों, आशंकाओं और जिम्मेदारियों के बीच भी प्रतिरोध की एक दुनिया संभव है।
भगत सिंह मुझे उस ऊँचाई का एहसास कराते हैं, जहाँ तक पहुँचने की मेरी आकांक्षा है। गांधी मुझे वह रास्ता दिखाते हैं, जिस पर चलते हुए मैं अपनी मानवीय सीमाओं के साथ भी कुछ दूर जा सकता हूँ।
इसलिए, बापू, आज मैं आपसे एक अलग तरह का रिश्ता महसूस करता हूँ।
मैं आपको इसलिए नहीं चुनता कि मेरे भीतर भगत सिंह के प्रति प्रेम कम हो गया है। बल्कि इसलिए कि मैंने अपनी कमजोरियों को पहचान लिया है। मैं जानता हूँ कि मेरे भीतर वह असाधारण निडरता नहीं है, जिसकी मिसाल मेरे क्रांतिकारी नायकों ने कायम की। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी यह कमजोरी मुझे अन्याय के प्रति उदासीन रहने का अधिकार नहीं देती।
मुझे एक ऐसे रास्ते की जरूरत है, जहाँ मैं अपनी सीमाओं के बावजूद अपने विवेक के साथ खड़ा रह सकूँ। जहाँ मैं बिना किसी महानायक होने का भ्रम पाले, अपनी छोटी-छोटी कोशिशों से न्याय और गरिमा की लड़ाई में योगदान दे सकूँ।
और उस रास्ते पर मुझे आप दिखाई देते हैं।
भगत सिंह मेरे भीतर विद्रोह की आकांक्षा जगाते हैं, लेकिन गांधी मुझे उस आकांक्षा के साथ जीना सिखाते हैं।
बापू, मैं भगत सिंह से प्रेम करता हूँ। उनके साथियों से प्रेम करता हूँ। उनके साहस और बलिदान के आगे मेरा सिर हमेशा झुका रहेगा। लेकिन अंततः, अपनी साधारण मानवीय कमजोरियों के साथ, मैं आपके रास्ते पर चलने की कोशिश करना चाहता हूँ।
आप मुझे यह भरोसा देते हैं कि महान होने की आकांक्षा रखे बिना भी एक मनुष्य गरिमा के साथ जी सकता है, अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठा सकता है और दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश कर सकता है।
शायद मेरे जैसे करोड़ों साधारण मनुष्यों के लिए आपका सबसे बड़ा योगदान यही है।
बापू, मैं भगत सिंह का प्रशंसक हूँ, लेकिन अपने जीवन का रास्ता आपसे सीखना चाहता हूँ।
मेरी श्रद्धा स्वीकार कीजिए।
लंबे समय तक जीवित रहे वह विचार, जो मनुष्य को अन्याय के सामने झुकने नहीं देता।
लंबे समय तक जीवित रहें बापू।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
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