'यादव भर्ती' से लेकर 'आरक्षण ऑडिट' तक: यूपी में नौकरियों के विवाद के बीच सपा ने भाजपा पर पलटा नैरेटिव

सपा का 'पीडीए आरक्षण ऑडिट' दांव: 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के 'यादव भर्ती' नैरेटिव का करारा जवाब
Samajwadi Party (SP) national president Akhilesh Yadav
समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव(IANS)
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उत्तर प्रदेश: आरक्षण के अधिकारों को नौकरियों और प्रतिनिधित्व से जोड़कर, समाजवादी पार्टी अपने गैर-यादव ओबीसी आधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। यह वोट बैंक पार्टी से दूर हो गया था और इसे उत्तर प्रदेश में भाजपा को सत्ता में लाने का एक प्रमुख कारक माना जाता है।

उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री संदीप सिंह के लखनऊ स्थित आवास के बाहर सोमवार को भीषण गर्मी में ओबीसी और एससी वर्ग के सैकड़ों अभ्यर्थियों ने पेट के बल रेंगकर विरोध प्रदर्शन किया। समाजवादी पार्टी (सपा) ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले इस प्रदर्शन को अपने 'पीडीए आरक्षण ऑडिट' अभियान से जोड़ते हुए तत्काल एक बड़ा सियासी रूप दे दिया है।

अटकी हुई 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को लेकर हुए इस प्रदर्शन ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव के चल रहे अभियान को नई धार दे दी है। इस पहल के जरिए पार्टी सामाजिक न्याय के मुद्दे पर अपनी पकड़ फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। सपा का लक्ष्य अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) छतरी के नीचे गैर-यादव ओबीसी, अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी), दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करना है।

सालों तक भाजपा ने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली तत्कालीन सपा सरकार पर 'यादव भर्ती' को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि 2012 से 2017 के बीच सरकारी भर्तियों और पोस्टिंग में केवल यादव समुदाय को फायदा पहुंचाया गया। माना जाता है कि इसी नैरेटिव ने भाजपा को गैर-यादव ओबीसी, एमबीसी और गैर-जाटव दलितों को अपने पक्ष में करने में काफी मदद की थी।

अब एक बड़े राजनीतिक पलटवार के रूप में, अखिलेश यादव ने सपा का 'पीडीए आरक्षण ऑडिट' अभियान शुरू कर दिया है। उन्होंने भाजपा सरकार पर आरक्षण नीतियों को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने और पिछड़े समुदायों को नौकरियों में उनके हिस्से से वंचित करने का आरोप लगाया है। इस कदम को 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के सबसे प्रभावी राजनीतिक हमलों को वापस सत्ताधारी पार्टी पर ही मोड़ने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

सपा प्रमुख ने अपनी ऑडिट पुस्तिका में एक अपील प्रकाशित की है। उन्होंने लिखा है कि यह पुस्तिका सबूतों के साथ लाखों पीडीए युवाओं को बताती है कि कैसे यूपी की भाजपा सरकार उनसे, उनके बेटे-बेटियों और बहुओं से आरक्षण का संवैधानिक अधिकार छीन रही है। इसमें दर्शाया गया है कि कैसे बाबा साहब अंबेडकर के समानता के हथियार यानी आरक्षण को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे इस पुस्तिका को उन अपनों के साथ साझा करें जिनका आरक्षण खतरे में है या जो इसे पहले ही खो चुके हैं।

इस पुस्तिका में यह भी दावा किया गया है कि लगातार भाजपा सरकारों के तहत आयोजित 22 भर्ती अभियानों में पीडीए समुदायों के लिए आरक्षित 11,500 से अधिक पदों को कथित तौर पर छीन लिया गया। सपा नेता इस दस्तावेज को भाजपा के 'पिछड़ा विरोधी' और 'सवर्ण समर्थक' दृष्टिकोण का प्रत्यक्ष प्रमाण बता रहे हैं।

साल 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही अखिलेश यादव ने पीडीए पहचान को सपा के केंद्रीय राजनीतिक ढांचे के रूप में आक्रामक तरीके से पेश किया है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि सामाजिक न्याय की राजनीति को सीधे नौकरियों, आरक्षण और प्रतिनिधित्व से जोड़ना इस रणनीति का अगला चरण है।

सपा के वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि इस पुस्तिका को विशेष रूप से भाजपा के उस पुराने आरोप का मुकाबला करने के लिए डिजाइन किया गया है, जिसमें कहा जाता था कि सपा सरकारों ने केवल एक जाति को नौकरियां बांटीं।

एक सपा नेता ने कहा कि भाजपा लगातार उन पर नौकरियों और पोस्टिंग में 'यादव भर्ती' का आरोप लगाती रही, लेकिन वे इन आरोपों को कभी साबित नहीं कर पाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब सपा उचित दस्तावेजों के साथ उनसे सवाल पूछ रही है और यह पुस्तिका राज्य के हर विधानसभा क्षेत्र और हर ओबीसी युवा तक पहुंचेगी। इसका उद्देश्य भाजपा सरकार की ओबीसी विरोधी मानसिकता को उजागर करना है।

सपा नेताओं के अनुसार, भाजपा ने इस धारणा को सफलतापूर्वक हथियार बनाया था कि एमबीसी के लिए बनी नौकरियों पर यादवों ने कब्जा कर लिया है। अब सपा यह पेश करना चाहती है कि आरक्षण के लाभों का वास्तविक क्षरण भाजपा शासन के दौरान ही हुआ है।

एक अन्य पदाधिकारी ने कहा कि 'नौकरी यादव खा जाते हैं' का नैरेटिव लगातार फैलाया गया, लेकिन आज भर्ती के आंकड़े खुद बताते हैं कि भाजपा शासन में पिछड़े समुदायों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।

भाजपा का पलटवार

इस मुद्दे के राजनीतिक महत्व को भांपते हुए भाजपा ने भी अपना ओबीसी आउटरीच अभियान तेज कर दिया है।

हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश कैबिनेट विस्तार के दौरान, छह में से तीन नए मंत्री ओबीसी समुदाय से बनाए गए। इसे 2027 के चुनावों से पहले भाजपा की पिछड़ी जातियों तक पहुंच मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा गया।

इसके तुरंत बाद, योगी आदित्यनाथ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य 'ट्रिपल टेस्ट' आवश्यकता के अनुपालन में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए आरक्षण निर्धारित करने हेतु एक समर्पित ओबीसी आयोग के गठन को मंजूरी दे दी।

सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राम अवतार सिंह की अध्यक्षता वाले इस आयोग को छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है। यह समय सीमा राजनीतिक रूप से विधानसभा चुनावों की तैयारियों के साथ पूरी तरह मेल खाती है।

भाजपा ने आरक्षण और भर्ती पर अखिलेश यादव के आरोपों का मुकाबला करने के लिए अपने ओबीसी और दलित मंत्रियों के साथ-साथ सहयोगी जाति-आधारित पार्टियों के नेताओं को भी मैदान में उतार दिया है।

बुधवार को जब अखिलेश यादव ने 'पीडीए ऑडिट' पर अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस की, तो भाजपा नेताओं और सहयोगियों ने समन्वित रूप से पलटवार शुरू कर दिया।

एनडीए सहयोगी निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने सपा और इंडिया ब्लॉक पर ओबीसी अधिकारों की कीमत पर 'तुष्टीकरण की राजनीति' करने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि अखिलेश यादव मुगलों द्वारा लाए गए धर्म के आधार पर आरक्षण चाहते हैं।

निषाद ने यह भी कहा कि सपा का राजनीतिक पतन पश्चिम बंगाल में टीएमसी जैसा ही होगा। इसके अलावा, उन्होंने फूलन देवी की विरासत का भी जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि सपा ने उन्हें पूरी तरह से दरकिनार कर दिया था।

भाजपा सरकार में एक अन्य प्रमुख ओबीसी चेहरा, मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने आरोप लगाया कि सपा शासन के दौरान भर्ती प्रक्रियाओं में 'चाचा-भतीजा' नेटवर्क द्वारा हेरफेर किया गया था। इसके विपरीत, उन्होंने दावा किया कि आदित्यनाथ सरकार ने लगभग नौ लाख भर्तियां पूरी तरह से पारदर्शी और योग्यता के आधार पर की हैं।

राज्य मंत्री असीम अरुण ने भी पीडीए ऑडिट अभियान पर पलटवार किया। उन्होंने तर्क दिया कि सपा शासन की 'असली ऑडिट रिपोर्ट' 2004 और 2007 के बीच हुई पुलिस भर्ती की कथित अनियमितताओं में पहले से ही दिखाई दे रही है।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि सपा सरकार के तहत उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) के माध्यम से होने वाली भर्तियों में 'एक विशेष जाति' का ही दबदबा कायम था।

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