उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासी हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक दल अब ब्राह्मण समुदाय को अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। इसी कड़ी में अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) भी इस रेस में शामिल हो गई है।
आजमगढ़ में सुभासपा का महा-आयोजन
ब्राह्मणों तक अपनी पहुँच मजबूत करने के लिए सुभासपा ने एक बड़े जनसंपर्क अभियान का ऐलान किया है। पार्टी ने रविवार, 22 फरवरी को आजमगढ़ में होने वाली अपनी 'सामाजिक समरसता महारैली' के लिए 10,000 से अधिक "प्रमुख और प्रबुद्ध ब्राह्मणों" को विशेष तौर पर आमंत्रित किया है।
सुभासपा के राष्ट्रीय महासचिव अरविंद राजभर द्वारा 19 फरवरी को भेजे गए आमंत्रण के अनुसार, यह रैली अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र के जनता इंटर कॉलेज मैदान में होगी। इस आयोजन के जरिए पार्टी प्रमुख और यूपी के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर पूर्वांचल में अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन करेंगे।
पार्टी का दावा है कि इस रैली में विभिन्न समुदायों के एक लाख से ज्यादा लोग हिस्सा लेंगे। ब्राह्मणों के अलावा इस आयोजन में क्षत्रिय, चौहान, नाई, निषाद और अन्य पिछड़े व वंचित वर्गों के लोग भी जुटेंगे। इस रैली को सामाजिक सौहार्द और बड़े पैमाने पर सामाजिक एकजुटता के संदेश के रूप में पेश किया जा रहा है।
सवर्णों के बीच पैठ बनाने की कोशिश
यह एक दिलचस्प कदम है क्योंकि सुभासपा का मुख्य वोट बैंक पूर्वांचल का अति पिछड़ा ओबीसी वर्ग रहा है। सूत्रों की मानें तो 10,000 से अधिक प्रभावशाली ब्राह्मणों की मौजूदगी इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण है, जो पूर्वी यूपी के सवर्णों के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इस दौरान पार्टी की युवा इकाई 'राष्ट्रीय सुहेलदेव सेना' के हजारों कार्यकर्ता भी अपने संगठन की ताकत और अनुशासन का प्रदर्शन करने के लिए मौजूद रहेंगे। सुभासपा के नेताओं को पूरा भरोसा है कि इस भारी भीड़ के जरिए पूर्वांचल में एनडीए (NDA) का दबदबा और मजबूत होगा।
भाजपा के भीतर भी गरमाई ब्राह्मण राजनीति
राज्य में पिछले कुछ समय से ब्राह्मण राजनीति काफी चर्चा में है, जिसकी झलक खुद सत्ताधारी भाजपा के भीतर भी देखने को मिल रही है। इसका एक स्पष्ट उदाहरण गुरुवार को लखनऊ में मिला, जब उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने अपने आवास पर 101 'बटुक ब्राह्मणों' (वेदों के युवा संस्कृत विद्वान) को सम्मानित किया। इस दौरान उन्होंने माघ मेले में एक ब्राह्मण की चोटी खींचे जाने की कथित घटना को 'महा पाप' करार दिया था।
शंकराचार्य और सरकार के बीच तनाव
ये तमाम राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आ रहे हैं जब उत्तराखंड के ज्योतिर्मठ के 'शंकराचार्य' स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और भाजपा (तथा आदित्यनाथ सरकार) के बीच तनाव की स्थिति देखने को मिली है।
गौरतलब है कि जनवरी में मौनी अमावस्या के मौके पर त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान करने से स्थानीय प्रशासन द्वारा कथित तौर पर रोके जाने के बाद, स्वामी सरस्वती ने प्रयागराज में 11 दिनों तक धरना दिया था। उन्होंने 'सनातन धर्म के अपमान' का आरोप लगाते हुए भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा था। इस विवाद को शांत करने के लिए उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सहित भाजपा नेताओं ने काफी प्रयास किए, जबकि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) ने खुलकर साधु का समर्थन किया था।
2027 के लिए सभी दलों का पूरा जोर
आगामी चुनावों को देखते हुए भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दल विभिन्न जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों और दलितों का समर्थन हासिल करने की जद्दोजहद में लगे हैं।
हाल ही के दिनों में कुछ अन्य विवादों ने भी सवर्ण समुदायों की नाराजगी बढ़ाई है। अब रोक दिए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के जातिगत भेदभाव नियमों को लेकर राज्य भर में भारी विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसके अलावा, मनोज बाजपेयी की फिल्म 'घूसखोर पंडित' के शीर्षक पर भी भारी विवाद हुआ, जिससे ब्राह्मण समुदाय में काफी आक्रोश फैल गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए फिल्म के निर्देशक के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया था।
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