नई दिल्ली: क्षत्रिय करणी सेना और अन्य सवर्ण संगठनों ने 2026 के यूजीसी (UGC) जातिगत भेदभाव मसौदा नियमों के खिलाफ अपना प्रस्तावित प्रदर्शन फिलहाल रद्द कर दिया है। यह फैसला शनिवार 19 सितंबर को देर रात नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद लिया गया। यह समूह यूजीसी के इस ड्राफ्ट को पूरी तरह से वापस लेने की मांग कर रहा है।
रविवार 20 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन सवर्ण संगठनों की एक बड़ी महापंचायत होने वाली थी, जिसे सरकार के आश्वासन के बाद टाल दिया गया है। बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने रात 2 बजे सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि यह बातचीत बेहद सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुई है।
सरकार ने इन समूहों की मांगों का विस्तृत अध्ययन करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा है। नड्डा ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि सरकार उनकी मांगों पर उचित विचार करेगी और तीन हफ्ते बाद प्रतिनिधिमंडल के साथ फिर से बैठक की जाएगी।
क्षत्रिय करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राज शेखावत ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। उन्होंने नड्डा के आवास पर हुई इस मुलाकात को सामूहिक प्रयासों की एक बड़ी उपलब्धि करार दिया। शेखावत ने कहा कि सरकार ने उनकी मांगों को गंभीरता से लिया है और उम्मीद है कि आगामी वार्ताओं से इन विसंगतियों को दूर करने के लिए ठोस फैसले लिए जाएंगे।
यूजीसी मसौदे को लेकर यह पूरा विवाद इस साल जनवरी 2026 से ही गरमाया हुआ है। कॉलेज परिसरों में छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह ड्राफ्ट लाया गया था। दलित और हाशिए के समाज के उन छात्रों के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिन्होंने भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली थी।
आईआईटी बॉम्बे में जातिगत भेदभाव के आरोपों के बीच एक दलित छात्र की आत्महत्या की घटना ने इस मसौदे पर बहस को और तेज कर दिया था। हालांकि, जनवरी में मसौदा जारी होते ही उत्तर भारत के परिसरों में 'सामान्य' वर्ग और सवर्ण संगठनों ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के इस मसौदे पर रोक लगाते हुए मामले का फैसला होने तक 2012 के पुराने दिशा-निर्देशों को ही लागू रखने का आदेश दिया था।
सवर्ण संगठनों की सबसे बड़ी आपत्ति मसौदे में 'जातिगत भेदभाव' की परिभाषा को लेकर है। उनका तर्क है कि इस ड्राफ्ट में भेदभाव को केवल एससी, एसटी या ओबीसी व्यक्तियों के खिलाफ अपराध माना गया है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि यह नियम इस पूर्वाग्रह पर आधारित है कि सामान्य वर्ग या सवर्ण लोग 'स्वाभाविक रूप से शोषक' होते हैं।
हालांकि, सरकार के इस रवैये ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार सवर्ण संगठनों के साथ इतनी नरमी से पेश आ रही है, वहीं दूसरी तरफ देश में आज भी जातीय हिंसा, उत्पीड़न और छुआछूत की घटनाएं लगातार जारी हैं। जमीनी हकीकत यह है कि वंचित समाज को आज भी अपने सम्मान और बुनियादी अधिकारों के लिए रोज एक नई लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे कई बड़े राजनेता लगातार देश में बढ़ते भेदभाव और दलितों-पिछड़ों के खिलाफ हो रहे अन्याय को लेकर मुखर रहे हैं। ऐसे में जब सैकड़ों सालों से शोषित रहे वर्गों की रक्षा के लिए बने कानूनों के खिलाफ कोई संगठन एकजुट होता है, तो स्थिति बेहद चिंताजनक हो जाती है।
अब जिस आसानी से सत्ता पक्ष के शीर्ष नेता (जो खुद सवर्ण समाज से आते हैं) इन विरोधी संगठनों से आधी रात को मुलाकात कर रहे हैं, उसने हाशिए के समाज में एक गहरा डर पैदा कर दिया है। इस राजनीतिक घटनाक्रम से दलित और शोषित वर्ग के भीतर यह शंका पनपने लगी है कि क्या भविष्य में उनके अधिकारों और कानूनी सुरक्षा कवच को भी यूं ही कमजोर कर दिया जाएगा।
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