
भोपाल। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और अजाक्स (AJAKS) के अध्यक्ष संतोष वर्मा के एक बयान के बाद प्रदेश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में हलचल तेज हो गई थी। उनके ब्राह्मण बेटियों से संबंध वाले बयान को लेकर विवाद खड़ा हुआ और अलग-अलग वर्गों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। इसी मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐसा बयान दिया, जिसने समाज के भीतर मौजूद गहरी असमानताओं और मानसिक दीवारों पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया।
दिग्विजय सिंह ने कहा, “जिस संदर्भ में (संतोष वर्मा) उन्होंने अपनी बात कही, उसका उन्होंने स्पष्टीकरण भी दे दिया है। बात यह नहीं है कि उनका बयान क्या है, बात यह है कि आखिर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के भीतर यह भावना क्यों पैदा हो रही है, कहीं न कहीं हमीं लोगों में कमी हो सकती है?”
यह बयान सिर्फ एक अधिकारी के विवादित कथन पर प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि उस सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा था, जिसे लोग अक्सर स्वीकार करने से कतराते हैं- कि आज भी समाज में बराबरी के दावे के बावजूद, दिल और व्यवहार के स्तर पर भेदभाव मौजूद है।
दिग्विजय सिंह के बयान से यह साफ झलकता है कि उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों आज भी दलित-आदिवासी और तथाकथित ऊँची जातियों के बीच रोटी-बेटी का व्यवहार सहज नहीं हो पाया है। उनके बयान से यह समझा जा सकता है, की उन्होंने यह संकेत दिया कि केवल यह कहना काफी नहीं कि भेदभाव दूसरे करते हैं, बल्कि यह भी देखना होगा कि कहीं समाज के भीतर ही कुछ ऐसी कमियाँ तो नहीं, जो इस दूरी को बनाए रखती हैं, जो एससी-एसटी वर्ग में इस तरह की भावना उतपन्न हो रही है।
उनके इस बयान को कई लोग समानता की दिशा में एक साहसिक पहल के रूप में देख रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक नेता ने यह स्वीकार किया हो कि सामाजिक बदलाव सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि समाज की सोच बदलने से आएगा।
द मूकनायक से विस्तार में बातचीत करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता और सामाजिक चिंतक डॉ. विक्रम चौधरी ने कहा, "संतोष वर्मा विवाद पर दिग्विजयसिंह का बयान कि हम में ( अर्थात् अगड़ी जातियों) ही कुछ कमी रह गई होगी इसीलिए दलित आदिवासी ऐसी मनोदशा में है
उन्होंने आगे कहा, इस सन्दर्भ में निम्न बिंदु सामने आते हैं: जिसमें शिक्षा और संपन्नता के बावजूद भी भारत की स्वर्ण जातियों में जातिगत भावना उत्तरोत्तर मजबूत हुई है जबकि आजादी के बाद इसमे शिथिलता की अपेक्षा अधिक थी।
पूरा विश्व अब एक खुले संघ की ओर जा रहा है ऐसे जातिगत आधार अपनी पहचान बनाने का क्या तुक? वैश्विक स्तर पर धर्म की अपनी संपर्क उपयोगिता हो सकती है लेकिन जाति का कोई मूल्य नही है, खुले वैश्विक संघ के सन्दर्भ में अगड़ी जातियों के जातिगत आग्रह के पीछे क्या मनोविज्ञान हो सकता है?
जबकि पिछड़े वर्ग दलित आदिवासियों के समाज में संविधान की भावना के अनुरूप समतामूलक समाज का आग्रह और वैज्ञानिक चिंतन विकसित हुआ है किन्तु अगड़ी जातियों में संविधान की भावना को नही ग्रहण जातिय कट्टरता पनपी है जो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।
इस प्रवृत्ति का संघ परिवार भाजपा अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है अगड़ी जातियों में आयी जातिगत संकुचित मानसिकता को पिछड़ी दलित जातियों को खिलाफ भयंकर कट्टरता में बदल दिया है। इस जातिगत वैमनस्य स्तिथि को अपने जाहिर एजेंडे संविधान विरोधी लक्ष्य को साधने के लिए क्रूरता और बेशर्मी प्रयोग करती है और संविधान को बार बार विवादित बनाती है बदनाम करने से उसके संविधान बदलने का मनुवादी एजेंडे लागू करने मंशा उजागर होती है।
डॉ. चौधरी ने आगे कहा, "राजनीतिक इस्तेमाल और संघ और भाजपा का मनुवादी एजेंडा ने इस सामाजिक दरार को पाटने के बजाय इसे और गहरा किया है। ध्रुवीकरण की राजनीति, जब राजनीतिक दल किसी एक वर्ग की श्रेष्ठता की भावना को सहलाते हैं, तो वह वर्ग कट्टर हो जाता है। 'अगड़ी जातियों की संकुचित मानसिकता' को दलित-पिछड़ों के खिलाफ मोड़कर वोट बैंक की फसल काटी जा रही है।
इस बहाने संविधान पर हमला, संविधान को विवादित बनाना या उसे बदलने की बात करना, दरअसल उसी 'मनुवादी' व्यवस्था की पुनर्स्थापना का प्रयास है जहाँ पदानुक्रम (Hierarchy) आधारित समाज हो, न कि बराबरी आधारित। यह 'क्रूरता और बेशर्मी' का वह दौर है जहाँ संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग भी वर्ग-विशेष के हितों को साधने के लिए किया जा रहा है।
दिग्विजय सिंह का यह कहना कि "हममें ही कुछ कमी रह गई होगी," आत्म-चिंतन की ओर इशारा करता है। जब तक समाज का अग्रणी कहलाने वाला तबका अपनी आंतरिक कमियों और जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार को नहीं त्यागेगा, तब तक एक समतामूलक भारत का निर्माण कठिन है। और पिछड़ा वर्ग दलित-आदिवासियों में विश्वास बहाल होना मुश्किल है।
बरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विश्वपाल सिंह भदौरिया ने द मूकनायक से बातचीत में दिग्विजय सिंह के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दिग्विजय सिंह को हमेशा से ही सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए जाना जाता रहा है। उन्होंने कहा कि उनका हालिया बयान किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि समाज की सोच पर सवाल खड़ा करने वाला है।
विश्वपाल सिंह भदौरिया के अनुसार, दिग्विजय सिंह का यह कहना कि 'कहीं न कहीं हमीं लोगों में कमी हो सकती है' समाज को आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है। यह बयान बताता है कि बराबरी सिर्फ कानून और नीतियों से नहीं आएगी, बल्कि तब आएगी जब समाज अपने भीतर मौजूद भेदभाव को पहचानकर उसे खत्म करने की कोशिश करेगा। उन्होंने कहा कि यह बयान समाज में समानता की ओर एक साफ इशारा है।
इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिग्विजय सिंह से जब पूछा गया कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने पर कोई दलित या आदिवासी मुख्यमंत्री बने, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी, इस पर उन्होंने खुलकर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो उन्हें बेहद प्रसन्नता होगी।
यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि उस सोच का हिस्सा था जिसमें नेतृत्व भी समाज के हर वर्ग से निकलता दिखे। इससे यह संदेश गया कि सत्ता और नेतृत्व पर सिर्फ कुछ वर्गों का ही अधिकार नहीं होना चाहिए।
दिग्विजय सिंह को मध्यप्रदेश की राजनीति में सामाजिक न्याय की बात करने वाले नेताओं में गिना जाता है। जब वे मुख्यमंत्री थे, तब उनकी सरकार ने दलित-आदिवासी समुदाय के लिए कई अहम फैसले किए।
उनके कार्यकाल में लगभग साढ़े तीन लाख दलित-आदिवासियों को भू-अधिकार पट्टे दिए गए थे, जो उस समय तक का एक रिकॉर्ड माना जाता है। जमीन से जुड़े अधिकारों को सामाजिक सम्मान और आत्मनिर्भरता से जोड़ा जाता है, और इस फैसले ने हजारों परिवारों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया।
इसके अलावा एससी-एसटी वर्ग में भरे न जा सके पदों, यानी बैकलॉग को पूरा करने के लिए उनकी सरकार ने ओपन भर्ती के जरिए रोजगार के मौके भी दिए। यह कदम सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बना, जो पीढ़ियों से हाशिए पर थे।
संतोष वर्मा के बयान से शुरू हुई यह बहस अब एक बड़े सवाल में बदल चुकी है, क्या हम सच में समानता के समाज की ओर बढ़ रहे हैं, या सिर्फ उसके नारे लगा रहे हैं?
दिग्विजय सिंह का यह कहना कि “कहीं न कहीं हमीं लोगों में कमी हो सकती है” यह कहना समाज को आईना दिखाने जैसा है। यह स्वीकार करना कि समस्या सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी हो सकती है, बदलाव की पहली शर्त है। आज भी जाति के नाम पर रिश्ते, दोस्ती, शादी और यहां तक कि रोजमर्रा का व्यवहार तय होता है। संविधान बराबरी की बात करता है, लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा अब भी उसी पुराने ढर्रे पर चलता दिखता है।
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