RJD में बड़ा बदलाव: तेजस्वी यादव बने राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, इसके क्या होंगे सियासी मायने?

2025 विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद RJD का बड़ा फैसला, लालू यादव ने सौंपी विरासत, लेकिन परिवार में छिड़ गई 'जंग'—पढ़ें पूरी इनसाइड स्टोरी।
Tejaswi Yadav, RJD
तेजस्वी यादव, आरजेडी नेता (Pic- IANS)
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पटना: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी चुनावी गिरावट के बमुश्किल दो महीने बाद, रविवार को एक अहम फैसला लेते हुए तेजस्वी प्रसाद यादव को पार्टी का 'राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष' नियुक्त कर दिया है। 2025 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को मिली करारी शिकस्त—जहां उनकी सीटों की संख्या 2020 के 80 से गिरकर महज 25 रह गई थी—के बाद संगठन में जान फूंकने के लिए यह बड़ा कदम उठाया गया है। इस नियुक्ति के साथ ही तेजस्वी अब पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के बाद संगठन में दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता बन गए हैं।

सर्वसम्मति से हुआ फैसला

तेजस्वी को पदोन्नत करने का निर्णय RJD की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया। इस महत्वपूर्ण बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और पाटलिपुत्र की सांसद मीसा भारती सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे। लालू यादव के बेहद करीबी माने जाने वाले भोला यादव ने तेजस्वी की नियुक्ति का प्रस्ताव रखा, जिसे बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लिया गया।

36 वर्षीय तेजस्वी यादव बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) की भूमिका निभाते रहेंगे, लेकिन अपनी नई जिम्मेदारी के तहत अब वे पार्टी के संगठनात्मक मामलों की कमान भी संभालेंगे। गौरतलब है कि स्वास्थ्य कारणों से लालू प्रसाद अब सक्रिय राजनीति में पहले की तरह समय नहीं दे पा रहे हैं। करीब 15 साल पहले राजनीति में कदम रखने वाले तेजस्वी को पहली बार संगठन के भीतर कोई औपचारिक पद सौंपा गया है।

तेजस्वी बोले- 'जिम्मेदारी पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा'

इस नई जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए तेजस्वी ने कहा कि पार्टी ने उन पर जो भरोसा जताया है, उससे वे अभिभूत हैं। उन्होंने कहा, "मैं करीब 15 सालों से राजनीति में हूं, लेकिन अब तक मेरे पास संगठन का कोई पद नहीं था। मुझे जो यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है, मैं उस पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा।"

बैठक में एक संक्षिप्त संबोधन के दौरान, लालू प्रसाद ने पार्टी नेताओं से अपने छोटे बेटे के साथ मजबूती से खड़े रहने की अपील की। उन्होंने कहा, "तेजस्वी बहुत कड़ी मेहनत कर रहे हैं। आप सभी का उन्हें समर्थन देने के लिए धन्यवाद। कृपया आगे भी उनका साथ देते रहें।"

'बीती ताहि बिसार दे...'

2025 के विधानसभा चुनाव में मिली हार का जिक्र करते हुए तेजस्वी ने वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी की बात दोहराई। उन्होंने कहा, "बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले (जो बीत गया उसे भूल जाओ और आगे की सोचो)।" उन्होंने ऐलान किया कि 2 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र के बाद वे सभी जिलों का दौरा करेंगे। इस दौरान वे हारने वाले उम्मीदवारों और पार्टी नेताओं से मिलकर उनकी चिंताओं को सुनेंगे। उन्होंने अपनी बात एक उम्मीद के साथ खत्म की: "हम होंगे कामयाब।"

तेजस्वी के सामने कठिन चुनौतियां

कार्यकर्ताओं में जोश भरने के अलावा, तेजस्वी की सबसे बड़ी परीक्षा महागठबंधन को टूटने से बचाने की होगी। RJD की मुख्य सहयोगी कांग्रेस के भीतर से असंतोष के स्वर अब साफ सुनाई देने लगे हैं। बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद खान ने खुले तौर पर आलाकमान से RJD के साथ गठबंधन तोड़ने की वकालत की है। उनका तर्क है कि इस गठबंधन ने राज्य में कांग्रेस के विकास को सीमित कर दिया है।

बतौर राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, तेजस्वी पर अब कांग्रेस नेतृत्व को साथ बनाए रखने की जिम्मेदारी होगी। साथ ही, उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विकासशील इंसान पार्टी (VIP) और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी (IIP) जैसे छोटे सहयोगी दल भी विपक्ष के साथ मजबूती से जुड़े रहें।

इसके अलावा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ RJD की रणनीति को फिर से तैयार करना एक बड़ी चुनौती होगी। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का यह नैरेटिव कि 'नीतीश कुमार का प्रशासन पर नियंत्रण नहीं रहा', पिछले चुनाव में जनता को लुभाने में नाकाम रहा। पार्टी के नेता दबी जुबान में यह मानते हैं कि तेजस्वी को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए लीक से हटकर कोई नई और ठोस राजनीतिक रणनीति बनानी होगी।

साथ ही, पार्टी पर लगे "M-Y (मुस्लिम-यादव)" के ठप्पे को हटाना भी बेहद जरूरी हो गया है। सिकुड़ते जनाधार के बीच, नेतृत्व पर अब ऐसी राजनीति करने का दबाव है जिसमें उनका मुख्य यादव वोट बैंक, अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और अनुसूचित जाति (SC) के प्रति भी स्वीकार्य और उदार दिखे।

परिवार में उभरी कलह

तेजस्वी की ताजपोशी ने परिवार के भीतर की दरारों को भी उजागर कर दिया है, जो हाल के वर्षों में कभी-कभार सतह पर आती रही हैं। विरोध का पहला स्वर लालू की दूसरी बेटी रोहिणी आचार्य की ओर से आया, जो पिछले साल के विधानसभा चुनावों से पहले से ही पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रही हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक पोस्ट में रोहिणी ने अपने भाई की पदोन्नति को अपने पिता के संदर्भ में "सियासत के शिखर पुरुष के गौरवशाली पारी का अंत" बताया। उन्होंने तंज कसते हुए तेजस्वी को "शहजादा" बनने की बधाई दी।

रोहिणी की ये टिप्पणियां उस भाई-बहन की प्रतिद्वंद्विता को रेखांकित करती हैं जो पिछले साल चुनावों के दौरान सुर्खियों में थी। जहां तेजस्वी निर्विवाद रूप से RJD के राजनीतिक उत्तराधिकारी बनकर उभरे हैं, वहीं रोहिणी—जिन्हें कभी सारण में संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा था—का आरोप है कि पार्टी के अंदरूनी लोगों ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया है और उनके पिता की विरासत को कमजोर कर रहे हैं।

इसके विपरीत, मीसा भारती ने इस पारिवारिक कलह को तूल न देते हुए स्थिति को संभालने की कोशिश की। उन्होंने कहा, "मैंने नहीं पढ़ा कि उन्होंने (रोहिणी ने) क्या कहा है। मैं तेजस्वी को शुभकामनाएं देती हूं। यह अच्छी बात है कि पार्टी के पास अब राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष दोनों हैं। तेजस्वी पार्टी को मजबूत करने के लिए अब नई ऊर्जा के साथ काम करेंगे।"

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