
भोपाल। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से फैल रही बीमारियों ने भयावह रूप ले लिया है। अब तक इस क्षेत्र में 27 लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग लगातार मौतों के कारण को अलग-अलग बीमारियां बताकर पानी की गुणवत्ता से पल्ला झाड़ता नजर आ रहा है। शुक्रवार को 63 वर्षीय बद्रीप्रसाद की इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि दूषित पानी पीने से वे बीमार पड़े और उनकी जान चली गई, जबकि स्वास्थ्य विभाग ने मौत का कारण किसी अन्य बीमारी को बताया। इस रवैये से नाराज़ परिवार और स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया।
शनिवार को बद्रीप्रसाद के स्वजनों ने भागीरथपुरा पुल के पास शव रखकर करीब डेढ़ घंटे तक चक्काजाम कर दिया। इस दौरान प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। प्रदर्शनकारियों ने क्षेत्र के भाजपा पार्षद कमल वाघेला पर भी लापरवाही के आरोप लगाए और जवाबदेही तय करने की मांग की।
अंतिम संस्कार तक के पैसे नहीं
मृतक बद्रीप्रसाद के बेटे शैलेंद्र ने बताया कि उनके पिता दूषित पानी पीने से बीमार हुए थे। उन्होंने कहा, “हम मजदूरी करके परिवार चलाते हैं। इलाज में जो थोड़ा-बहुत था, वह भी खत्म हो गया। हालत यह है कि अंतिम संस्कार करने तक के लिए पैसे नहीं हैं। प्रशासन ने कोई मदद नहीं की।” शैलेंद्र का आरोप है कि अगर समय रहते पानी की जांच और सप्लाई बंद की जाती, तो शायद उनके पिता की जान बच सकती थी।
चक्काजाम के दौरान राजनीतिक हलचल
चक्काजाम की सूचना मिलने पर मौके पर कांग्रेस के स्थानीय नेता भी पहुंचे और स्वजनों के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल हुए। वहीं कुछ समय बाद भाजपा कार्यकर्ता भी पहुंचे। स्थिति तनावपूर्ण होती दिखी, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के हस्तक्षेप से मामला नियंत्रण में आया।
इसी बीच प्रदेश के वरिष्ठ नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की ओर से दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता परिजनों तक पहुंचाई गई। इसके बाद मौके पर मौजूद एसडीएम निधि वर्मा ने परिवार को आगे भी मदद और जांच का आश्वासन दिया। प्रशासन के आश्वासन और आर्थिक सहायता मिलने के बाद प्रदर्शन समाप्त किया गया और शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि मौतें दूषित पानी से नहीं, बल्कि पहले से मौजूद बीमारियों या अन्य कारणों से हुई हैं। हालांकि स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में लंबे समय से पीने के पानी की पाइपलाइन में गंदा पानी मिल रहा है, जिसकी शिकायतें कई बार की जा चुकी हैं। इसके बावजूद न तो नियमित जांच हुई और न ही वैकल्पिक स्वच्छ पानी की व्यवस्था की गई।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों में उल्टी-दस्त, बुखार और पेट दर्द के मामलों में अचानक बढ़ोतरी हुई है। कई परिवारों के एक से अधिक सदस्य बीमार पड़े हैं। इसके बावजूद प्रशासनिक अमला स्थिति को गंभीरता से नहीं ले रहा।
अस्पतालों में अब भी मरीज भर्ती
भागीरथपुरा क्षेत्र के 10 मरीज अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं। इनमें से एक मरीज वेंटिलेटर पर बताया जा रहा है। डॉक्टरों के अनुसार, कई मरीजों की हालत नाजुक बनी हुई है और उन्हें लगातार निगरानी में रखा गया है। स्थानीय लोगों की मांग है कि जब तक पूरी तरह स्वच्छ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं होती, तब तक टैंकरों के माध्यम से पीने का पानी उपलब्ध कराया जाए।
जिम्मेदारी तय करने की मांग
मामले ने अब प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि समय रहते पाइपलाइन, टंकी और जलस्रोतों की जांच होती, तो इतनी जानें नहीं जातीं। लोगों ने दोषी अधिकारियों और जिम्मेदार एजेंसियों पर कार्रवाई की मांग की है।
साथ ही, मृतकों के परिजनों को मुआवजा, मुफ्त इलाज और प्रभावित क्षेत्र में स्थायी समाधान की मांग तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल आर्थिक सहायता देकर मामला दबाना समाधान नहीं है, बल्कि दूषित पानी की आपूर्ति के स्रोत की पहचान कर उसे तत्काल बंद करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस योजना बनाना जरूरी है।
भागीरथपुरा की घटना ने एक बार फिर शहरी बुनियादी सुविधाओं, खासकर पीने के पानी की सुरक्षा, पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 27 मौतों के बाद भी यदि प्रशासन कारणों पर पर्दा डालता रहा, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि संवेदनहीनता मानी जाएगी।
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