'कानून की आड़ में संघ की घुसपैठ': पेसा और वन अधिकार पर बनी नई टास्क फोर्स पर आदिवासी कार्यकर्ताओं ने उठाए गंभीर सवाल

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पेसा (PESA) तथा वन अधिकार कानून को लागू करने के लिए बनाई गई नई टास्क फोर्स पर कांग्रेस और आदिवासी कार्यकर्ताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसे वे वैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर संघ परिवार की घुसपैठ का जरिया बता रहे हैं।
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छत्तीसगढ़ और MP में PESA-वन अधिकार कानून की टास्क फोर्स पर भारी बवाल। कांग्रेस और कार्यकर्ताओं ने लगाया RSS से जुड़े संगठनों की घुसपैठ का आरोप।(Ai Image)
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नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ में इस साल मई में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 और पेसा (PESA) कानून 1996 को तेजी से लागू करने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया गया है। लेकिन अब इस कदम ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दल कांग्रेस का आरोप है कि इस नई व्यवस्था के जरिए आदिवासी बहुल इलाकों में इन कानूनों को लागू करने की आड़ में संघ परिवार से जुड़े संगठनों की भूमिका को संस्थागत रूप दिया जा रहा है।

उनका यह भी कहना है कि इससे कानूनों के तहत बनी वैधानिक संस्थाओं का महत्व पूरी तरह कम हो जाएगा।

छत्तीसगढ़ सरकार ने 6 मई को इस विशेष टास्क फोर्स की अधिसूचना जारी की थी। इस संरचना में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली 18 सदस्यीय शीर्ष संस्था और राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली 12 सदस्यीय कार्यान्वयन समिति शामिल है।

इस टीम का मुख्य काम एफआरए के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के दावों की समीक्षा करना, संभावित क्षेत्रों को चिह्नित करना और पेसा से जुड़े मामलों के लिए रणनीति तैयार करने में जिला प्रशासन की मदद करना है।

वन अधिकारों के लिए काम करने वाले नागरिक समाज समूह 'कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी' (सीएसडी) ने इस पूरे मामले पर गंभीर चिंता जताई है। संस्था का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार का यह कदम पूरी तरह से मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नवंबर 2024 में बनाए गए उस मॉडल पर आधारित है, जिसे वहां पेसा और एफआरए लागू करने के लिए लाया गया था।

समूह ने यह आशंका भी जताई है कि जल्द ही ओडिशा में भी इसी तरह की टास्क फोर्स का गठन किया जा सकता है।

सीएसडी का स्पष्ट आरोप है कि इन टास्क फोर्स के गठन का असल मकसद अखिल भारतीय वनवासी कल्याण परिषद (एबीवीकेए) और जनजाति सुरक्षा मंच (जेएसएम) जैसे संघ परिवार से जुड़े संगठनों के प्रतिनिधियों को सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा बनाना है।

इस संवेदनशील मुद्दे पर जब छत्तीसगढ़ के वन मंत्री केदार कश्यप से बात करने की कोशिश की गई, तो उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।

दिलचस्प बात यह है कि 24 मई को नई दिल्ली में एबीवीकेए और जेएसएम द्वारा आयोजित एक जनसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हिस्सा लिया था। उस दौरान उन्होंने मध्य प्रदेश के 'पेसा मॉडल' की जमकर तारीफ करते हुए इसे सबसे बेहतरीन (गोल्ड स्टैंडर्ड) बताया था।

उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि देश भर में भाजपा शासित राज्य इसी राह पर चलने की तैयारी कर रहे हैं। इसी कार्यक्रम में इन संगठनों ने एक प्रमुख मांग रखी थी कि पेसा के तहत ग्राम सभाओं में केवल उन्हीं आदिवासी ग्रामीणों को शामिल किया जाए, जिन्होंने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया है।

छत्तीसगढ़ के वन अधिकार कार्यकर्ता आलोक शुक्ला ने एक मीडिया रिपोर्ट में बताया कि इस तरह की टास्क फोर्स का ढांचा उन मूल कानूनों का ही उल्लंघन करता है, जिन्हें लागू करने का दावा किया जा रहा है। उन्होंने समझाया कि पेसा और एफआरए जैसे कानूनों का असली मकसद जमीनी स्तर पर आदिवासी स्वशासन को मजबूत करना है।

इन कानूनों के तहत पहले से ही ग्राम सभा, वन अधिकार समिति, उप-मंडलीय, जिला स्तरीय और राज्य स्तरीय निगरानी समितियां जैसी वैधानिक संस्थाएं मौजूद हैं। शुक्ला के मुताबिक, इन मौजूदा संस्थाओं को मजबूत करने के बजाय सरकार इसके बाहर एक समानांतर व्यवस्था खड़ी कर रही है।

इस विवाद में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने भी सरकार पर तीखा हमला बोला है। मंगलवार, 2 जून 2026 को उन्होंने कहा कि यह नई टास्क फोर्स इन दोनों कानूनों के मूल लोकतांत्रिक ढांचे को खत्म कर रही है।

उन्होंने एबीवीकेए को इस पूरे खेल के पीछे की मुख्य ताकत करार दिया। सोशल मीडिया पर जारी अपने बयान में रमेश ने आरोप लगाया कि कार्यकारी जिम्मेदारियों वाली ऐसी टास्क फोर्स के जरिए इन कानूनों की मूल भावना के साथ जानबूझकर खिलवाड़ किया जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि इसका सीधा फायदा खनन कंपनियों को होगा, जो वन क्षेत्रों में पारिस्थितिक चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करेंगी और इनमें सबसे प्रमुख 'मोडानी साम्राज्य' होगा।

मध्य प्रदेश में सीएसडी से जुड़े एक अन्य अधिकार कार्यकर्ता विजयभाई ने इस मुद्दे के एक अलग पहलू पर रोशनी डाली। उनका कहना है कि पेसा और एफआरए असल में शासन से जुड़े प्रावधान हैं। लेकिन ऐसी संरचनाएं बनाकर सरकार इन्हें व्यक्तिगत लाभार्थियों वाली किसी सरकारी योजना की तरह पेश करने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने दावा किया कि पिछले डेढ़ साल में मध्य प्रदेश की टास्क फोर्स एफआरए के कार्यान्वयन से जुड़ी किसी भी प्रणालीगत समस्या को सुलझाने में पूरी तरह नाकाम रही है।

यह पहली बार नहीं है जब ऐसा विवाद उठा है। पिछले साल भी जब केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने अपने बड़े 'DAJGUA' कार्यक्रम के तहत हर राज्य में 'एफआरए सेल' स्थापित करने की कोशिश की थी, तब भी भारी विरोध हुआ था।

उस समय कार्यकर्ताओं ने इन प्रकोष्ठों को गैर-वैधानिक निकाय बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। नतीजतन, केंद्र सरकार को अपनी योजना रद्द करनी पड़ी थी और इसकी जगह सामान्य पर्यवेक्षी निकाय बनाने का फैसला लेना पड़ा था।

विजयभाई ने स्पष्ट किया कि कानूनों को लागू करने में मदद के लिए संस्थाएं बनाने के उदाहरण पहले भी मौजूद रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ में काम कर रहे मौजूदा प्रकोष्ठों का हवाला देते हुए बताया कि ये निकाय केवल सिफारिश करने वाले समूहों के रूप में काम करते हैं। विवाद की मुख्य वजह नई टास्क फोर्स को सीधे तौर पर कार्यान्वयन की शक्तियां सौंपना है, जो कि मौजूदा कानूनी ढांचे के खिलाफ जाता है।

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