नई दिल्ली: पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। राजनीति में महिलाओं को लेकर की गई उनकी एक विवादित टिप्पणी पर मंगलवार, को बिहार राज्य महिला आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए उन्हें नोटिस जारी किया है।
आयोग ने सांसद को एक कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। इसके साथ ही उनसे यह भी पूछा गया है कि उनके इस बयान के बाद क्यों न लोकसभा अध्यक्ष को उनकी संसद सदस्यता रद्द करने की सिफारिश भेजी जाए।
महिला आयोग द्वारा भेजे गए नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में उन्होंने महिला राजनेताओं के खिलाफ बेहद अमर्यादित बातें कही हैं। आयोग ने कहा है कि इससे महिलाओं के आत्मसम्मान और सामाजिक गरिमा को गहरी ठेस पहुंची है। अपना जवाब दाखिल करने के लिए श्री यादव को तीन दिनों का समय दिया गया है।
इससे पहले मंगलवार को ही लोकसभा में 131वें संविधान (संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा चल रही थी, जो सदन में पारित नहीं हो सका। इसी दौरान पप्पू यादव ने महिलाओं को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला दावा किया।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि राजनीति में 90 प्रतिशत महिलाओं का करियर किसी पुरुष नेता की शरण में जाए बिना शुरू नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि अगर लोकसभा में महिलाओं के सम्मान की बात उठती है तो यह महज एक मजाक बनकर रह जाता है।
पप्पू यादव ने व्यवस्था और समाज पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत में भले ही महिलाओं को देवी कहा जाता हो, लेकिन यहां उन्हें कभी सम्मान नहीं मिलेगा। उन्होंने पूछा कि घरेलू हिंसा के लिए कौन जिम्मेदार है? अमेरिका से लेकर भारत तक महिलाओं को शिकार बनाने की नीयत से कौन देख रहा है?
उन्होंने खुद ही इसका जवाब देते हुए राजनेताओं पर निशाना साधा। सांसद ने कहा कि नेताओं में महिलाओं का शोषण करने की संस्कृति जड़ जमा चुकी है और वे महिलाओं के प्रति गिद्धों की तरह व्यवहार करते हैं।
इस बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी और तुरंत माफी मांगने की मांग की। भाजपा नेता शहजाद पूनावाला ने सोशल मीडिया पर इस बयान को चौंकाने वाला बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पूरा देश 'नारी शक्ति' को बढ़ावा दे रहा है, तब कांग्रेस समर्थित एक सांसद की ऐसी मानसिकता क्या दर्शाती है।
विवाद को बढ़ता देख पप्पू यादव ने बाद में मीडिया के सामने अपनी सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि उनके बयान का मकसद महिलाओं को नीचा दिखाना नहीं था, बल्कि वे राजनीति में पुरुष नेताओं द्वारा महिलाओं के कथित यौन शोषण को उजागर करना चाहते थे।
सांसद ने स्पष्ट किया कि उनकी मंशा केवल जनप्रतिनिधियों के नैतिक आचरण पर चर्चा करने की थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि सदन में उन्होंने जो भी बातें रखीं, वे पूरी तरह से सरकारी आंकड़ों, मीडिया रिपोर्ट्स और इस विषय पर पहले हुई चर्चाओं के संदर्भों पर आधारित थीं।
वहीं दूसरी ओर, संसद में महिला आरक्षण से जुड़े इस विधेयक के गिरने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी एक अहम बयान सामने आया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार महिला आरक्षण के रास्ते में आने वाली हर बाधा को दूर करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि 131वें संविधान संशोधन विधेयक की हार का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि हम हार मान चुके हैं।
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