मुंबई: कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के लिए कटेंगे 45 हज़ार से ज़्यादा मैंग्रोव, मछुआरों की आजीविका पर संकट

वर्सोवा-भायंदर कोस्टल रोड के लिए कटेंगे 45 हज़ार मैंग्रोव, विकास की राह में मछुआरों की आजीविका और पर्यावरण पर गहराता संकट।
Fishing near mangroves.
मैंग्रोव क्षेत्र(फाइल फोटो)
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मुंबई: मुंबई के वर्सोवा, चारकोप, दहिसर, मालवणी और गोराई में रहने वाले लगभग 400 मछुआरों के लिए मैंग्रोव के पास मछली पकड़ना ही आजीविका का एकमात्र साधन है। लेकिन अब इन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

23 किलोमीटर लंबे वर्सोवा-भायंदर कोस्टल रोड प्रोजेक्ट के लिए 103.6 हेक्टेयर वन भूमि पर फैले 45,675 मैंग्रोव पेड़ों को काटने का काम चल रहा है। इस कटाई ने मछुआरों को गहरी चिंता में डाल दिया है। स्थानीय निवासी पूजन भेंडे निराशा जताते हुए कहते हैं कि जब ये मैंग्रोव खत्म हो जाएंगे, तो उन्हें शायद एक मजदूर के रूप में काम करना पड़ेगा।

द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार, 70 वर्षीय कृष्णहरि साठे और उनकी पत्नी छोटे मछुआरों से मछली खरीदकर बेचते हैं और इसी से अपना घर चलाते हैं। साठे बताते हैं कि मैंग्रोव मछलियों के प्रजनन के मुख्य स्थान हैं और उनका जीवन पूरी तरह से इन्हीं पर निर्भर है।

वर्सोवा से 17 किलोमीटर दूर चारकोप में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने कोस्टल रोड का काम शुरू कर दिया है। यहां की 45 वर्षीय मछुआरिन दीप्ति भंडारी बताती हैं कि उन लोगों ने इस परियोजना पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, बीएमसी के किसी भी अधिकारी ने आजीविका के नुकसान की भरपाई या उनकी चिंताओं को दूर करने के बारे में कोई बात नहीं की।

दूसरी ओर, बीएमसी ने प्रभावित मछुआरों को 6 लाख रुपये तक के मुआवजे का आश्वासन दिया है। इसके बावजूद मछुआरों का स्पष्ट आरोप है कि मैंग्रोव की कटाई को लेकर नगर निगम ने उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया।

मुंबई स्थित एनजीओ 'नैटकनेक्ट' के प्रमुख बी.एन. कुमार का मानना है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए जनता से राय लेना अक्सर सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। अधिकारी व्यावहारिक विकल्पों को लगातार नजरअंदाज करते आ रहे हैं।

कुमार आगे बताते हैं कि इस तरह की परियोजनाएं शहरी नियोजन की गहरी विफलता को दर्शाती हैं। खासकर 'मुंबई क्लाइमेट एक्शन प्लान' जैसी चेतावनियों के बावजूद ऐसा हो रहा है, जिसमें 2050 तक शहर के डूबने के जोखिम की बात कही गई है।

बीते 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया था, जिसमें प्रस्तावित कोस्टल रोड के लिए मैंग्रोव काटने की अनुमति दी गई थी। अधिकारियों द्वारा वनीकरण (रिफॉरेस्टेशन) का आश्वासन दिए जाने के बाद ही इस परियोजना को मंजूरी मिली थी।

हालांकि पर्यावरणविदों ने इस बात पर सवाल उठाए हैं कि क्या मुआवजे के तौर पर किए जाने वाले वृक्षारोपण से मुंबई को कोई फायदा होगा। उनका तर्क है कि वनीकरण के लिए प्रस्तावित इलाके शहर के बाहरी हिस्सों में स्थित हैं।

मुंबई के एनजीओ 'वनशक्ति' के निदेशक स्टालिन डी. ने बीएमसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। इसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के 25 फरवरी के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखाई गई थी।

स्टालिन का कहना है कि एविसेनिया मरीना (Avicennia marina), एक्सकोएकेरिया अगालोचा (Excoecaria agallocha), एविसेनिया ऑफिसिनैलिस (Avicennia officinalis) और राइजोफोरा म्यूक्रोनाटा (Rhizophora mucronata) जैसी मैंग्रोव प्रजातियों को काटा जा रहा है। लेकिन इनकी जगह केवल सेरिओप्स टैगल (Ceriops tagal) के पौधे ही लगाए जा रहे हैं।

बीएमसी के मैंग्रोव सेल के एक अधिकारी ने बताया कि कुछ पौधों के मरने का खतरा रहता है, लेकिन उन्हें बदलने का भी प्रावधान है। अधिकारी के मुताबिक, वे चैनल को गहरा करने का काम कर रहे हैं और अब तक भायंदर में 37,764 पेड़ लगाए जा चुके हैं।

इस अहम प्रोजेक्ट को पूरा करने की समय सीमा दिसंबर 2028 तय की गई है। इसके बनने से वर्सोवा और भायंदर के बीच यात्रा का समय दो घंटे से घटकर महज 15-20 मिनट रह जाने की उम्मीद है। बीएमसी अधिकारियों का कहना है कि इस परियोजना का उद्देश्य ट्रैफिक जाम से निजात दिलाना और लोकल ट्रेनों में भीड़भाड़ कम करना है।

इसके विपरीत, परिवहन विश्लेषक ए.वी. शेनॉय का मानना है कि सड़क से भीड़ तो कम होगी, लेकिन यह केवल एक 'दिखावा' है। ऐसी सड़कें मुख्य रूप से कार और टैक्सी जैसे हाई-स्पीड वाहनों के लिए डिज़ाइन की जाती हैं।

शेनॉय बताते हैं कि इस मार्ग पर दोपहिया, तिपहिया और भारी मालवाहक वाहनों के चलने पर प्रतिबंध रहेगा। यही कारण है कि दक्षिण में बांद्रा को उत्तर में मीरा रोड से जोड़ने वाली 25 किलोमीटर लंबी वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर ट्रैफिक जाम की समस्या पहले की तरह ही बनी रहेगी।

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