MP: सिंगरौली में धीरोली कोल ब्लॉक के लिए हजारों पेड़ों की कटाई पर मचा सियासी घमासान, कांग्रेस ने बनाई तथ्य अन्वेषण समिति

पार्टी का कहना है कि कोल ब्लॉक आवंटन और उसके संचालन के लिए जिन अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए था, उन्हें पर्याप्त रूप से नहीं निभाया गया।
कांग्रेस ने बनाई तथ्य अन्वेषण समिति
कांग्रेस ने बनाई तथ्य अन्वेषण समिति
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भोपाल। मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के धीरोली कोल ब्लॉक में बड़े पैमाने पर हो रही पेड़ों की कटाई को लेकर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कोल ब्लॉक के विकास कार्यों के नाम पर जिस तेजी से जंगलों को साफ किया जा रहा है, उसे लेकर कांग्रेस ने गंभीर आपत्तियाँ जताई हैं। पर्यावरणीय नुकसान, वन संरक्षण कानूनों के उल्लंघन और स्थानीय समुदायों की अनदेखी के आरोपों के बीच अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) ने एक उच्चस्तरीय तथ्य अन्वेषण समिति गठित कर दी है। यह समिति 11 दिसंबर 2025 को सिंगरौली पहुंचकर पूरे मामले की जमीनी जांच करेगी।

तस्वीर साफ करने सिंगरौली पहुंचेगी तथ्य अन्वेषण समिति

AICC द्वारा गठित इस समिति का नेतृत्व प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी करेंगे। इसके साथ ही कांग्रेस के 12 वरिष्ठ नेता भी समिति का हिस्सा बनाए गए हैं, जिनमें- जीतू पटवारी, उमंग सिंघार, मीनाक्षी नटराजन, अजय सिंह, कमलेश्वर पटेल, हेमंत कटारे, राजेंद्र कुमार सिंह, हिना कावर, विक्रांत भूरिया, ओंकार मरकाम, जयवर्धन सिंह और बाला बच्चन शामिल हैं।

समिति स्थानीय जनप्रतिनिधियों, ग्रामीणों, आदिवासी परिवारों और संबंधित विभागों के अधिकारियों से मुलाकात कर यह पता लगाएगी कि, पेड़ों की वास्तविक कटाई कितनी हुई? क्या पर्यावरणीय अनुमति और वन संरक्षण कानून का पालन किया गया? स्थानीय समुदायों की आपत्तियाँ क्यों नहीं सुनी गईं? क्या कोल ब्लॉक आवंटन और कटाई प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई? जांच के आधार पर समिति अपने निष्कर्ष पार्टी नेतृत्व को सौंपेगी।

यह केवल कोल ब्लॉक नहीं, पर्यावरण पर सीधा हमला: कांग्रेस

कांग्रेस ने सिंगरौली में हो रही कटाई को अनियंत्रित और असामान्य गति से बताया है। पार्टी का कहना है कि हजारों पेड़ों को एक साथ काटा जा रहा है, जिससे पूरे क्षेत्र का पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है।

1. स्थानीय और आदिवासी समुदायों को विश्वास में नहीं लिया गया

कांग्रेस का आरोप है कि पेड़ों की कटाई शुरू करने से पहले ग्रामीणों और आदिवासियों से किसी प्रकार की राय नहीं ली गई।

यह क्षेत्र स्थानीय समुदायों की आजीविका, जलस्रोतों, चराई भूमि और वन संसाधनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। लोगों का कहना है कि बिना किसी पूर्व संवाद और सहमति के की जा रही ऐसी कार्रवाई न केवल उनके जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, बल्कि इसे वे “अन्यायपूर्ण” और “एकतरफा” निर्णय के रूप में देख रहे हैं। समुदायों का मानना है कि इस तरह के कदम उनके परंपरागत अधिकारों और संसाधनों पर सीधा प्रहार हैं, जिन पर उनकी पीढ़ियों से निर्भरता रही है।

2. वन एवं पर्यावरण कानूनों की अनदेखी

पार्टी का कहना है कि कोल ब्लॉक आवंटन और उसके संचालन के लिए जिन अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए था, उन्हें पर्याप्त रूप से नहीं निभाया गया। इसमें सार्वजनिक सुनवाई, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA), पुनर्वनीकरण योजना तैयार करना और जैव विविधता का विस्तृत अध्ययन जैसी महत्वपूर्ण शर्तें शामिल हैं। आरोप है कि इन प्रक्रियाओं को या तो अधूरे तरीके से पूरा किया गया या फिर नजरअंदाज कर दिया गया, जिससे पूरे इलाके के पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

3. मशीनों से पेड़ों को उखाड़ने का आरोप

कांग्रेस ने यह भी दावा किया है कि कटाई पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि भारी मशीनों द्वारा तेजी से पेड़ों को जड़ से उखाड़कर की जा रही है, जो वन संरक्षण अधिनियम का स्पष्ट उल्लंघन है।

4. जल्दबाज़ी में दी गई सरकारी अनुमति

कांग्रेस का कहना है कि घिराली कोल ब्लॉक जिस जंगल क्षेत्र में स्थित है, वह पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील जोन है। ऐसे में अचानक और तेजी से की गई कटाई यह सवाल खड़ा करती है कि क्या सरकार ने अनुमति देने में जल्दबाज़ी की? पार्टी इसे संदिग्ध प्रक्रिया बता रही है।

द मूकनायक से बातचीत में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि सिंगरौली में हो रही पेड़ों की बड़ी कटाई “विकास नहीं, जंगलों पर हमला” है। उन्होंने आरोप लगाया कि हजारों पेड़ मशीनों से उखाड़े जा रहे हैं, जबकि वन एवं पर्यावरण कानूनों की प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।

पटवारी ने कहा, “सरकार ने जल्दबाज़ी में अनुमति देकर स्थानीय आदिवासी समुदायों की राय को नजरअंदाज किया है। हमारी समिति पूरे मामले की जांच कर सच सामने लाएगी।”

स्थानीय लोगों में भी चिंता बढ़ी

पर्यावरण जानकारों का कहना है कि धीरोली क्षेत्र में हो रही अंधाधुंध पेड़ों की कटाई उनके जीवन और पर्यावरण पर गंभीर असर डाल सकती है। उनका मानना है कि जंगल कम होने से नदियों-नालों का जलस्तर प्रभावित होगा, जिससे खेती और पेयजल संकट गहरा सकता है। वन क्षेत्र सिकुड़ने से जंगली जानवरों के मानव बस्तियों में घुसने का खतरा भी बढ़ जाएगा।ग्रामीण बताते हैं कि यदि खनन शुरू हुआ तो धूल, प्रदूषण और संभावित विस्थापन उनकी मुश्किलें और बढ़ा देगा। सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उन्हें किसी भी बैठक में न बुलाया गया और न ही उनकी आपत्तियाँ सुनी गईं, जिससे वे पूरी प्रक्रिया को स्थानीय समुदाय की भागीदारी के बिना थोपे गए निर्णय की तरह देखते हैं।

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