
नई दिल्ली: राजनीतिक विरोधी भले ही अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) को भारतीय जनता पार्टी का सबसे पक्का समर्थक न मानते हों, लेकिन पश्चिम बंगाल और असम में पार्टी की प्रचंड जीत में इन वंचित समुदायों ने ही सबसे अहम भूमिका निभाई है। इन दोनों राज्यों की आरक्षित सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन उसके शानदार ओवरऑल स्ट्राइक रेट से भी कहीं ज्यादा प्रभावशाली रहा है।
बंगाल में भाजपा ने एसटी वर्ग के लिए आरक्षित सभी 16 सीटों पर अपनी जीत का परचम लहराया है। ये सीटें मुख्य रूप से उत्तर बंगाल और जंगलमहल क्षेत्रों में आती हैं। इन्हीं दोनों इलाकों ने पार्टी को राज्य में अपना पहला मजबूत आधार दिया था और अब ये पूरी तरह से भाजपा के अभेद्य किले में तब्दील हो चुके हैं।
वहीं, राज्य की 68 एससी आरक्षित विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 51 (ठीक 75 प्रतिशत) पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। मतुआ समेत पूरे दलित समुदाय ने जिस तरह से एकजुट होकर भाजपा का साथ दिया, उसके चलते टीएमसी 57 सीटों पर सिमट कर रह गई।
बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा (जिसमें एक सीट पर पुनर्मतदान होना है) में भाजपा ने साल 2021 की 77 सीटों के मुकाबले इस बार 207 सीटों तक की विशाल छलांग लगाई है। यह आंकड़ा पार्टी के व्यापक होते जनाधार को दर्शाता है, लेकिन आरक्षित सीटों पर इसका शानदार प्रदर्शन इन समुदायों के बीच बनी गहरी पैठ को भी स्पष्ट रूप से साबित करता है।
पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि एसआईआर (SIR) को लेकर अपनी आशंकाओं और टीएमसी द्वारा लुभाने की तमाम कोशिशों के बावजूद, मतुआ समुदाय मजबूती से भाजपा के साथ खड़ा रहा। उनका यह कदम पार्टी के प्रति उनके अटूट विश्वास को उजागर करता है।
असम में तो पार्टी के लिए हालात और भी ज्यादा शानदार रहे। विविध पहचानों वाले इस राज्य में, जहां अलग-अलग समूह अक्सर टकराव का कारण बनते हैं, वहां भाजपा ने विभिन्न जातीय समूहों को साधते हुए एक मजबूत गठबंधन तैयार करने में सफलता हासिल की। इसी ठोस रणनीति के दम पर उसने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को पूरी तरह से पछाड़ दिया।
असम की कुल नौ एससी आरक्षित सीटों में से भाजपा ने पांच और उसके सहयोगियों ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ एक सीट आई। इसी तरह, एसटी के लिए आवंटित 19 सीटों में से भाजपा ने 13 पर कब्जा जमाया। बाकी बची छह सीटें उसके दो सहयोगी दलों, बीपीएफ (BPF) और एजीओ (AGO) की झोली में गईं, जबकि कांग्रेस इस वर्ग में पूरी तरह से खाली हाथ रही।
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