MLC चुनाव में अखिलेश का बीजेपी के बागियों के सहारे सवर्णों को साधने का बड़ा सियासी दांव, क्या होंगे सफल?

एमएलसी चुनाव में समाजवादी पार्टी का नया सियासी समीकरण: बीजेपी के बागियों पर दांव लगाकर अखिलेश यादव ने 'पीडीए' फॉर्मूले में सवर्णों को दी तरजीह।
अखिलेश यादव, पूर्व मुख्यमंत्री, यूपी
अखिलेश यादव, पूर्व मुख्यमंत्री, यूपी
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लखनऊ: विधान परिषद (एमएलसी) चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने एक बेहद चौंकाने वाला राजनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने अपनी पार्टी के घोषित उम्मीदवारों को हटाकर बीजेपी के बागियों और टिकट के दावेदारों पर दांव लगाया है। ऊपरी तौर पर यह बीजेपी को असहज करने की एक सामान्य चाल लग सकती है, लेकिन इसके पीछे की रणनीति काफी गहरी है।

इस अहम फैसले के जरिए सपा अपने 'पीडीए' (PDA) गठबंधन को एक ऐसे सर्वसमावेशी सामाजिक मंच के रूप में पेश करना चाहती है, जिसमें सवर्णों के लिए भी पूरी जगह और सम्मान है।

इसी कड़ी में शनिवार को सपा प्रमुख ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से अपने घोषित उम्मीदवार कमलेश यादव का टिकट काट दिया। उनकी जगह बीजेपी के बागी नेता संजयन त्रिपाठी को चुनावी मैदान में उतारा गया है।

ठीक इसी तरह, आगरा स्नातक सीट से सपा प्रत्याशी प्रकाश चंद्र गुप्ता को भी हटाकर आकाश अग्रवाल को टिकट थमा दिया गया। आकाश अग्रवाल पहले बीजेपी से टिकट की आस लगाए बैठे थे। सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि इस कदम से विरोधी खेमे को एक साथ कई मोर्चों पर चोट पहुंचाई जा सकेगी।

संजयन त्रिपाठी और आकाश अग्रवाल को सीधे पार्टी से जोड़ने के पीछे का मुख्य उद्देश्य बीजेपी के उस नरेटिव की हवा निकालना है, जिसमें वह सपा के 'पीडीए' फॉर्मूले पर लगातार सवाल उठाती रही है। बीजेपी का आरोप रहा है कि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों पर केंद्रित यह पीडीए फॉर्मूला केवल जातीय बंटवारे की राजनीति है, जिसमें सवर्णों का कोई स्थान नहीं है।

बीजेपी के इसी सीधे हमले का जवाब देते हुए अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया था कि पीडीए में 'पी' और 'डी' का मतलब पंडित और सवर्ण समाज भी है।

सपा की चुनावी रणनीति तैयार करने वाले एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने इस दांव को स्पष्ट करते हुए कहा कि एक ओबीसी समुदाय के नेता (कमलेश यादव) द्वारा खाली की गई सीट पर ब्राह्मण समाज के संजयन त्रिपाठी को टिकट दिया गया है। उनका कहना है कि यह बड़ा फैसला उन सभी 'पीड़ित' लोगों के प्रति सपा की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो बीजेपी की नीतियों से परेशान होकर किनारे कर दिए गए हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रकाश चंद्र गुप्ता की जगह आकाश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाने से एक बेहद सकारात्मक राजनीतिक संदेश गया है। इसके जरिए पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि उन सवर्ण समुदायों का भी सपा में पूरा स्वागत है, जो पारंपरिक रूप से चुनावों में उसका कोर वोटर नहीं माने जाते हैं।

संजयन त्रिपाठी की समाजवादी पार्टी में एंट्री की पटकथा दरअसल सोशल मीडिया पर वायरल हुए उनके कुछ भावुक वीडियो से लिखी गई। इन वीडियो में वह अपनी एसयूवी के बोनट से बीजेपी का झंडा उतारते हुए नजर आए थे। उस दौरान उन्होंने याद दिलाया था कि कैसे उन्होंने सालों तक निस्वार्थ भाव से बीजेपी की सेवा की। उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि लगातार उपेक्षा का शिकार होने के बाद अब उनके समर्थक चाहते हैं कि वह अपने हक के लिए कोई कड़ा स्टैंड लें।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संजयन त्रिपाठी की अहमियत इसलिए भी ज्यादा बढ़ गई क्योंकि वह गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से दावेदारी कर रहे थे। यह वही इलाका है जहां अखिलेश यादव ने बीजेपी सरकार पर ब्राह्मणों को जानबूझकर निशाना बनाने का गंभीर आरोप लगाया था।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सीधा राजनीतिक वार करते हुए अखिलेश ने चुनावी रैलियों में एक बेहद चर्चित तंज कसा था कि "उन्हें हाते नहीं भाते, तिलक नहीं लुभाते।"

जानकारों के मुताबिक, अखिलेश यादव का 'हाता' वाला यह बयान सीधे तौर पर गोरखपुर के प्रसिद्ध तिवारी हाता की ओर इशारा था, जो प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरे हरिशंकर तिवारी का ऐतिहासिक निवास स्थान रहा है।

गौरतलब है कि साल 2021 में हरिशंकर तिवारी के बड़े बेटे व पूर्व सांसद भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी और उनके छोटे बेटे व चिल्लूपार से तत्कालीन बीजेपी विधायक विनय शंकर तिवारी ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया था। उस वक्त उनके साथ ब्राह्मण समुदाय के कई अन्य प्रभावशाली नेता भी सपा में शामिल हुए थे।

बाद में अप्रैल 2025 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बैंक धोखाधड़ी के एक मामले को लेकर विनय शंकर तिवारी से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की कार्रवाई को अंजाम दिया था।

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